कुपोषण का कलंक
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कुपोषण शब्द ही अटपटा सा है न बोलने में अच्छा लगता है और न ही सुनने में । कुपोषण अगर देखा जाय तो कमी का पर्याय है यह किसी भी क्षेत्र में हो सकता है हम जिस क्षेत्र की बात करना चाह रहे है ज्यादातर कुपोषण का प्रयोग वहीं होता है भारत में कुपोषण एक बड़ी समस्या है अगर ध्यान से देखा जाय तो तो जब हमे 1947 में आजादी की ख़ुशी मिली थी तो ठीक उसी समय उसी के साथ सबसे बड़ी समस्या देश को मिली और वो थी कुपोषण । जिन स्थितियों में हम आजाद हुए थे वो शायद कुपोषण की चरम स्थिति थी । आजाद भारत की पहली सरकार से लेकर आज तक की सरकार ने इस समस्या के हल को अभूतपूर्व काम किया है मगर ये भी सच है जितना प्रयास इन  सरकारो द्वारा किया गया उस हिसाब से सफलता आज भी नही मिली । कारण साफ है प्रयास सही रास्ते से नही हुआ कुपोषण केवल एक क्षेत्र में नही है यही कुपोषण हमारे शिक्षा में है यही कुपोषण की समस्या हमारे गरीबी के कारण में है। आजादी के समय देश की 70 % से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार थी जिस को दूर करने का प्रयास किया गया और जो आज तक जारी है मगर आज भी ये समस्या विकराल रूप धारण किये हुए है अगर इसके कारण में जाया जाय तो सबसे पहला कारण गरीबी आती है पर यही पूरा कारण हो ऐसा सच नही है इसके दूसरे तरफ इस कुपोषण की समस्या में अशिक्षित होना ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है और वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक इच्छाशक्ति। भारत के परिदृश्य में देखा जाय तो कुपोषण की समस्या  में गरीबी के साथ अशिक्षा का महत्वपूर्ण रोल है आज हम विकास करते हुए बहुत आगे निकल चुके है पृथ्वी से चाँद और मंगल ग्रह तक पहुच गए है कृत्रिम गर्भाधान से बच्चे पैदा करने लगे है आवाज से आदेश देकर कई प्रकार की मशीने संचालित करने लगे है और आर्थिक स्थिति में भी दूसरे देशो को बढ़ चढ़ कर सहायता करने लगे है मतलब अब काफी आगे निकल कर आ गए है पर कुपोषण के शिकार आज भी है उसके कई कारण है मगर मूलतः दो ही कारण है एक गरीबी तो दूसरी उससे बड़ी जो दिखाई पड़ती है वो है अज्ञानता । संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है. दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है. 

भारत में कुपोषण से लड़ने में प्रमुख भूमिका निभा रही यूनिसेफ और उसके साथ मिलकर काम करने वाली संस्था आई डब्लू ऍफ़ ( India word foundation ) ने सराहनीय काम किया है जिसे आज भी विभिन्न प्रोग्राम के तहत एक सच्ची रुपरेखा के साथ पूरी निष्ठां से कर रही है यूनिसेफ के साथ मिलकर आई डब्लू ऍफ़ (India word foundation  ) ने भारत के विभिन्न क्षेत्र में जाकर झुग्गी झोपडी की बस्तियों में बच्चों के कुपोषण को दूर करते हुए उन्हें शिक्षित करने का काम भी किया है यूनिसेफ जो की अति अनुभव युक्त संस्थान है व्ही आई डब्लू ऍफ़ में विभिन्न क्षेत्रों के काफी अनुभव युक्त ब्यक्तियों का सहयोग मिल रहा है जिसके परिणाम स्वरूप दोनों संस्थाओ के सयुक्त प्रयास से भारत में कुपोषण नामक कलंक को मिटाने में काफी हद तक सफलता मिल रही है आई डब्लू ऍफ़ की कार्यशैली जो की अन्य संस्थाओ से अलग है जो की प्रशंसनीय है आई डब्लू ऍफ़ कुपोषण राहत कार्य में फौरी जरूरी कार्यवाही तो करती है और उसके साथ ही यह संस्थान उसके होने वाले कारणों को दूर करने के प्रोग्राम भी चला रही है यूनिसेफ के साथ मिलकर आज तक लगभग 100 जगहों पर कार्यक्रम चलाकर कई हजार बच्चों को  कुपोषण से दूर करने का प्रयास किया है

राजस्थान और मध्य प्रदेश में किए गए सर्वेक्षणों में पाया गया कि देश के सबसे गरीब इलाकों में आज भी बच्चे भुखमरी के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र ने भारत में जो आंकड़े पाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर से कई गुना ज्यादा हैं. संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति को "चिंताजनक" बताया है भारत का उदाहरण ले जहां कुपोषण उसके पड़ोसी अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसियों जैसे बांगलादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक की यह उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है। कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता हैं। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 महीने से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप दृष्टि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और 15 पाइंट तक आईक्यू का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चे घटी हुई सीखने की क्षमता के कारण खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते। 

  • कुपोषण जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 माह से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है।
  • 6 माह से 3 वर्ष की उम्र में बच्चे के लिए मॉ का दूध पर्याप्त नहीं होता।
  • बच्चा खुद खा पाने या मांग पाने में असमर्थ होता है। उसको बार-बार नरम भोजन की जरूरत होती है जो उसे कोई वयस्क ही खिला सकता है।
  • माताओं को अजीविका कमाने के साथ-साथ और भी कई घरेलू काम करने पड़ते हैं जैसे-पकाना, पानी लाना, सफाई करना आदि। उनमें इतनी ऊर्जा या समय नहीं बचता कि वह बच्चे को बार-बार खिला सके। परिवार में भी अन्य वयस्क इसे सिर्फ मॉ की जिम्मेदारी समझते हैं।
  • बचपन में कुपोषित बच्चे को बाद में सुधार की संभावना बहुत कम होती है। मध्यान्ह भोजन, छात्रवृत्ति, बाल श्रमिकों के लिए विशेष स्कूल आदि सहायक तो है किन्तु पहले 6 वर्षों के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते।

कुपोषण मुख्यत: 6 रूपों में नजर आता है जो क्रमश: - 

  • जन्म के समय कम वजन, 2. बचपन में बाधित विकास, 3. अल्प रक्तता, 4. विटामिन ए की कमी, 5. आयोडिन कमी संबंधित बिमारियां, 6. मोटापा। बच्चों में कुपोषण मुख्यत: दो प्रकार का होता है :
  • सूखे वाला कुपोषण, सूजन वाला कुपोषण
  • कुपोषण के सूचक
  • बच्चे की उम्र एंव ऊंचाई के अनुरूप उसका वजन कम होना।
  • उसके हाथ-पैर पतले और कमजोर होना और पेट बढ़ा होना।
  • बच्चे को बार-बार संक्रमण होना और बीमार होना।

500 लाख से ज्यादा ऐसे परिवार हैं जो अति गरीब की श्रेणी में आते हैं। इसका मतलब यह है कि आधी आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है। यह सिध्द हो चुका है कि पर्याप्त भोजन नहीं मिलने पर शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और वह शीघ्र ही बीमारियों की चपेट में आ जाता है। जन्म के समय ढाई किलो से कम वजन होने पर बच्चे के बहुत कम उम्र में मरने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है। जबकि जहां कुपोषण ज्यादा होता है वहां खसरा से होने वाली मौतों की दर सामान्य से चार सौ गुना ज्यादा होती है।

3 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा किये गये अध्ययन से पता चलता है कि मध्यप्रदेश भारत में कुपोषण का सबसे ज्यादा शिकार राज्य है और यहां बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत क्षीण हो चुकी है। कुपोषित बच्चों पर दस्त का प्रकोप सामान्य से 4 गुना अधिक होता है। खून की कमी की शिकार औंरतों में मातृत्व कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियां निर्धारित न हो और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता न दी जाए तो कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।

सन् 1975 में यह मानते हुए कि कुपोषण और सतत बरकार रहने वाली भुखमरी की स्थिति को मिटाये बिना स्वास्थ्य सत उत्पादक और समता मूलक समाज स्थापित नहीं किया जा सकता है, समेकित बाल विकास परियोजना शुरू की गई। तब एक व्यापक नजरिये को आधार बनाकर आंगनवाड़ी कार्यक्रम की शुरूआत की गई थी। एक लंबे दौर तक इस कार्यक्रम को दोयम दर्जे का महत्व दिया जाता रहा है। 31 साल गुजर गये किन्तु बचपन की भुखमरी को समाप्त‍ नहीं किया जा सका। एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है. रिपोर्ट में लिखा गया है, "भारत में अनुसूचित जनजाति (28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है." वहीं महाराष्ट्र में राज्य सरकार कुपोषण कम करने के लिए कई कदम उठा रही है, पर साथ ही उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि दलित और आदिवासी इलाकों में अभी भी सफलता नहीं मिल पाई है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बच्चों को खाना ना मिलने के साथ साथ, देश में खाने की बर्बादी का ब्योरा भी दिया गया है. भारत में फाइट हंगर फाउंडेशन और एसीएफ इंडिया ने मिल कर "जनरेशनल न्यूट्रिशन प्रोग्राम" की शुरुआत की है इस प्रोग्राम के बारे में कहा कि कुपोषण को "चिकित्सकीय आपात स्थिति" के रूप में देखने की जरूरत है. साथ ही इस दिशा में बेहतर नीतियों के बनाए जाने और इसके लिए बजट दिए जाने की भी पैरवी की. नई दिल्ली में हुई कॉन्फ्रेंस में सरकार से जरूर मिल पाई है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बच्चों को खाना ना मिलने के साथ साथ, देश में खाने की बर्बादी का ब्योरा भी दिया गया है.

कुपोषण इस प्रकार एक जटिल समस्या है। घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हम ब्राजील से सीख सकते हैं जहां भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में जहां गरीबों के कल्याण को नजर अंदाज किया जाता है, खाद्य असरुक्षा बढ़ने के आसार नजर आते हैं। हम किस प्रकार सरकार के निर्णय को स्वीकार कर सकते है जब वह लाखों टन अनाज पशु आहार के लिए निर्यात करती है और महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कुपोषण से मौतों की मूक दर्शक बनी रहती है। आज के समय में किसानों को खाद्यान्न से हटकर नगदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के कारण खाद्य संकट और गहरा सकता है और देश को फिर से खाद्यान्नों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। हाल ही में जनवितरण प्रणाली को समाप्त करने के सरकार के प्रयास इस ओर इशारा करते हैं।

भारत में समेकित बाल विकास सेवा एक मात्र कार्यक्रम है जो सीधे कुपोषण निवारण के लिये जिम्मेदार है। यह आंगनवाड़ियों के एक विस्तृत नेटवर्क द्वारा संचालित होता है जिसमें पूरक पोषण, स्कूल पूर्व शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बच्चों, गर्भवति एवं धात्री महिलाओं और कुपोषित बालिकाओं तक पहुंचाना अपेक्षित है। किन्तु आंगनवाड़ियों की प्रभाविता कई कारणों से बाधित होती है। केन्द्रों की अपर्याप्त संख्या, कम मानदेय प्राप्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये झूलाघर की अनउपलब्धता जैसी समस्यायें धरातल पर नजर आती है। वृहद स्तर पर राजनैतिक इच्छा शक्ति और बजट प्रावधान में कम प्राथमिकता इसे प्रभावित करती है। वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 3000 करोड़ रूपयों का प्रावधान सकल घरेलू उत्पाद का 1/10वां हिस्सा भी नहीं हैं। यह तथ्य और स्पष्ट होता है जब हम इसकी तुलना रक्षा के लिये किये गये आवंटन से करते हैं। यदि संसद में बच्चों के लिए उठाये जाने वाले प्रश्नों को देखे तो तो यह दोनों सदनों में उठाये गए प्रश्नों का मात्र 3 प्रतिशत होता है। आश्चर्य की बात नहीं है-बच्चें मतदाता नहीं होते! आज के समय में कुपोषण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। यहां तक की विश्व बैंक ने इसकी तुलना ''ब्लेक डेथ'' नामक महामारी से की है। जिसने 18 वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। कुपोषण को क्यों इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैं? विश्व बैंक जैसी संस्थायें क्यों इसके प्रति इतनी चिंतित है? सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है और हममें से अधिकतर सोचते हैं कि यह चिकित्सा का विषय है। वास्तव में कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनैतिक कारणों का परिणाम है। जब भूख और गरीबी राजनैतिक एजेडा की प्राथमिकता नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण सतह पर उभरता है। भारत का उदाहरण ले जहां कुपोषण उसके पड़ोसी अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसीयों जैसे बांगलादेश और नेपाल से भी अधिक है। 

कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियां निर्धारित न हो और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता न दी जाए तो कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।

***अनिल मिश्र***