कांग्रेस का दुश्मन कांग्रेस?
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कुमार राकेश 

आने वाले दिनों में क्या होगा कांग्रेस का ? ये एक महत्वपूर्ण सवाल है,देश के लिए और उस 131 साल प्राचीन पार्टी के लिए भी.ये बात दीगर है कि आज की कांग्रेस,1885 वाली कांग्रेस तो बिलकुल नहीं है.

हाल में चार राज्यों में कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी और देश में किस्म किस्म की कहानियां सुनने को मिल रही है.जिसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बताया जाए तो इसमे कोई गुरेज नहीं.पार्टी के अन्दर ही घमासान मचा हुआ है जबकि एक शांति होनी चाहिए थी,प्रगति के लिए.

विधान सभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बावजूद कुछ ऐसे नेताओ को राज्य सभा का टिकट दिया गया,जिनके ऊपर 2014 का लोक सभा चुनाव हरवाने का आरोप लगाया गया था.अब वो फिर से नेता बना दिए गए.उसकी खास वजह पार्टी में बने दो ध्रुवों में संतुलन साधने की महारथ.दो ध्रुवों का मतलब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और युवा कहे जाने वाले 46 वर्षीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी.

राज्य सभा के नेताओ में पूर्व मंत्रियों में चिदंबरम,कपिल सिबल,जयराम रमेश को प्राथमिकता के आधार पर राज्य सभा का उम्मीदवार बनाया गया.ये सब के सब दोनों दरबार (सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ) में सम्यक भाव से हाजिरी लगाते रहे हैं.दुसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पार्टी का मतलब अब सोनिया गाँधी नहीं रहा.इसी द्वैत भाव की वजह से उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता को दूसरी बार वायदे के बावजूद विधान परिषद् की टिकट से वंचित किया गया.

 2014 में लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के मुख्य कारणों में ये ही तीनो महारथी जिम्मेवार बताये गए थे.लगता है कि दो साल बाद उनके सारे पाप धुल गए और वे पार्टी के खेवनहार बन गए.इससे पार्टी के अन्दर और बाहर एक सीधा सन्देश गया है कि पार्टी में ईमानदार और समर्पित लोगो की कोई कद्र नहीं है और न ही कभी होगी.

कांग्रेस के परिपेक्ष्य में राज्यवार पार्टी की स्थितियों का विश्लेषण करने पर लगता है कि पार्टी के सर्वे सर्वा को पार्टी के स्वास्थ्य की चिंता ही नहीं है .

बिहार में कांग्रेस की स्थिति देखने के बाद बड़ी दया आती है.बिहार में कांग्रेस को लेकर जो हुआ,जो कभी पंडित नेहरु,इंदिरा गाँधी ,राजीव गाँधी ,सीताराम केसरी,नरसिम्हा राव के ज़माने में भी नहीं हुआ.वो आज के सोनिया और राहुल गाँधी के ज़माने में हुआ.इससे पार्टी की सोच और नीयत का पता लगाया जा सकता है.

वैसे बिहार में राजस्थान के नेता डॉ सी पी जोशी ने काफी मेहनत की थी.महज सत्ता के लिए पार्टी के पुराने रीति-रिवाज़,परम्पराओ,नैतिकता आदि को ताक पर रखा गया था.पार्टी के जन्म काल से अब तक के सभी दुश्मनों को गले लगाया गया.चारा घोटाले के आरोपी लालू यादव और पिछले 50 वर्षों से पानी पी पीकर कांग्रेस को कोसने वाले नीतीश कुमार के सामने समर्पण किया गया.इस वजह से पार्टी में थोड़ी जान तो आई दिखती है लेकिन नीति और सिधांत का कबाड़ा हो चूका है.

शायद इस तःथाकथित विजय स्थिति के लिए डॉ जोशी पार्टी से अपने राज्य सभा सीट की आस लगाये बैठे थे,पर शायद उनकी किस्मत ठीक नहीं थी ,जो 2009 में रही .2009 में पहली बार लोक सभा चुनाव जीतने के बाद वो केंद्र में सभी परम्पराओ को परे हटाकर काबिना मंत्री बना दिया गया था .इन तमाम मशक्कतों के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगाने वाले डॉ जोशी को  राज्य सभा का टिकट नहीं दिया गया.इससे वे तनाव की स्थिति में है.

पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस ने यही गड़बड़िया की.पहले से सीटें तो बढ़ी,पर वाम दलों के साथ चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस विचार धारा की मूल वाहिका ममता बनर्जी से आजन्म दुश्मनी मोल ले लिया गया.आने वाले दिनों में कांग्रेस अब वह नीचे ही जाएगी.केरल में तो कांग्रेस पहले से कई गलतियाँ कर चुकी थी.उस प्रदेश में युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश चेन्नीथाला जैसे नेताओ को कई बार नीचे दिखाया गया.और तो और भ्रष्ट ओमान चंडी को तमाम विरोधों के बावजूद नहीं हटाया गया.तमिलनाडु में पुराने साथी द्रमुक के साथ गठजोड़ काम नहीं आया जबकि पुडुचेरी को पुराने नेता वी नारायणसामी ने बचा लिया.यदि वहां पर नारायणसामी नहीं होते तो उस छोटे से प्रदेश में कांग्रेस कभी नहीं आती.

तमाम पहलुओं की छानबीन से पता चलता है कि कांग्रेस की दुश्मन सिर्फ कांग्रेस है.आज की तारीख में कांग्रेस दो धडों में बंट गयी है.एक सोनिया कांग्रेस ,दूसरी राहुल कांग्रेस.इसलिए बडबोले दिग्विजय सिंह जैसे नेताओ की भी बोलती बंद है.कई पुराने और समर्पित नेताओं की राहुल गाँधी एंड कम्पनी से बाट लगा कर रख दी है .अब एक नयी मुहिम चली है राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनवाने का.पर मेरा मानना है कि ये सब इतना जल्दी संभव नहीं है.फिर भी देखना है पार्टी का ऊंट अब किस करवट बैठता है ,क्योकि हर तरफ पार्टी के लिए कोई शुभ सन्देश नहीं है,वैसे भी लोक सभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी है और पार्टी को भाजपा द्वारा अभी कई बड़े बड़े प्रहार झेलने होगे.क्योकि राज्य सभा में डॉ सुब्रमनियन स्वामी जैसे महारथी पूरी तैयारी के साथ मैदान में आ गए है,जिनसे कई राजनेता यु ही घबराते है.

मौजूदा स्थिति में पार्टी को देखने-समझने के बाद ऐसा लग रहा है कि आने वाले दिनों में ये दोनों माता और पुत्र ही पार्टी में रह जायेंगे अपने कुछ चापलूस किस्म के नेताओ के साथ और बाकी मूक दर्शक.

इस क्रम में शायद राज्य सभा के पूर्व सांसद राजनाथ सिंह सूर्य की कही बात सच नहीं हो जाये कि विदेशी मूल के व्यक्ति द्वारा शुरू की गयी ये ऐतिहासिक पार्टी मौजूदा स्थिति में  एक विदेशी मूल के व्यक्ति द्वारा रसातल में चला जाये .**

*कुमार राकेश*