मातृशक्ति की जय हो: भारत-पाक रिश्तों की बर्फ तो पिघलेगी...
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

 कुमार राकेश

25 दिसम्बर विश्व इतिहास में एक अविस्मरणीय तारीख है. इस पावन तारीख को महान संत ईसामसीह के अलावा अलावा विश्व के लोकप्रिय राजनेता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का भी जन्म हुआ था.

अब भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों के मद्देनजर भी 25 दिसम्बर 2015 एक ऐतिहासिक तारीख बन गयी है. उसे कोई नहीं भुला सकता. भुलाना भी नही चाहिए. इसी तारीख को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की भी एक ऐतिहासिक मुलाकात हुयी. पहल की थी श्री मोदी ने. हालाँकि उस मुलाकात को लेकर विश्व पटल से लेकर भारत की जमीं पर कई राजनेताओं की भवें तो तनी तो कईयों के हाथों के तोते उड़ गए. लेकिन जो हुआ,वो बहुत अच्छा हुआ और अब उससे भी अच्छा होगा. चाहे मानवता के दुश्मन कुछ भी कर ले.

यदि हम भारत-पाक रिश्ते को बेहतरी के परिपेक्ष्य में देखे तो 2015 और 1999 में काफी समानताये हैं. पर 2015 की भूमिका में थोडा फर्क है. 1999 में भाजपा के ही अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे और आज उसी दल के नरेन्द्र भाई मोदी प्रधानमंत्री है ,परन्तु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री उस वक़्त भी नवाज़ शरीफ थे और आज भी नवाज़ शरीफ हैं. भारत की स्थितियां तो बदली है परन्तु पाकिस्तान  के आंतरिक हालातों में कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा. सिवाय 25 दिसम्बर 2015 के. 1999 में अटल जी की लाहौर बस यात्रा थी तो आज की स्थिति में नरेद्र मोदी की भावनात्मक यात्रा. जिसमे नवाज़ शरीफ की माता जी मोहतरमा शमीम अख्तर का भी आशीर्वाद शामिल था. पर उन अलगाववादी ताकतों ने अपने देश की उस माँ की आवाज़ को भी अनसुनी कर दी और 3 जनवरी को अपनी कायरतापूर्ण औकात दिखा दी, भारत के पठानकोट में. जिस कुकृत्य के लिए विश्व का इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा.

पठानकोट की घटना ने एक बार फिर विश्व राजनीति में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की समग्र शांति मुहिम को  झटका देने की कोशिश की है. हालंकि ये झटका कुछ 1999 जैसा ही है. उस वक़्त भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ थे, आज भी वही हैं. उस वक़्त भी भाजपा का शासन था. इस वक़्त भी. बस एक फर्क है. वो फर्क कारगिल और पठानकोट का है. उस समय भारत के प्रधानमंत्री विश्व के लोकप्रिय जन नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे. आज विश्व नेता बनने को अग्रसर नरेंद्र मोदी हैं. भारत-पाक के परस्पर बेहतर रिश्तों के मद्देनजर तब भी कयास लगाये गए थे और आज भी उहापोह की स्थिति है,परन्तु इस बार की पहल कुछ अनूठी है,वो है मातृशक्ति का प्रभाव.

जानकारी के अनुसार –पाकिस्तान में आज युवा पीढ़ी आतंकवाद और अलगाववाद से अपना पीछा छुड़ाना चाहती है,कुछ कठमुल्लों समूहों की वजह से कई प्रकार की परेशानियाँ है. उस मसले पर उनके सेना के अंदर और बाहर घमासान शुरू हो गया है. ट्रिपल A वाली स्थिति अब नहीं है. उस तीन A में कभी अल्लाह, आर्मी और अमेरिका शामिल था. आज स्थितियां काफी बदल गयी हैं. ये सबको पता है कि आने वाले दिनों में युद्ध से किसी का भला होने वाला नहीं है. इस परिपेक्ष्य में भारत की नीति पहले भी स्पष्ट थी और आज भी है. खासकर पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार देश की एक माँ की शांति पहल को भी नाकारा जाना एक शर्मनाक घटना बताई जा रही है. क्या इसे कहा जाये कि पाकिस्तान में मातृशक्ति की कोई इज्ज़त नहीं है.

हालांकि पठानकोट के बावजूद भारत अपनी शांति और अहिंसा की नीतियों पर अटल है. ये हमारी पूँजी है. ये हमारी नीति है. इतिहास गवाह है पाकिस्तान से अभी तक शांति की कोई पहल नहीं की गयी है, जबकि भारत सदैव शांति और मैत्री को लेकर तत्पर और जागरूक रहा है और रहेगा.

इसी मसले के क्रम में  भारत सरकार आज भी 15 जनवरी 2016 की विदेश सचिव स्तर की वार्ता को लेकर आशान्वित है. परन्तु पाकिस्तान को भी पठानकोट के आरोपियों और जिम्मेदार अपराधियों के खिलाफ कारवाई करनी होगी . क्योकि अब आतंकवाद की लेकर किसी भी देश की दोहरी नीति नहीं चल सकती और अब न चलेगी. भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और मशहूर लेखक विकास स्वरुप का कहना है कि भारत सरकार शांति व् मैत्री वार्ता के लिए सदैव तैयार है और रहेगा. लेकिन आज की स्थिति में गेंद पाकिस्तान के पाले में है ,उन्हें उन दोषियों के खिलाफ कारवाई करनी चाहिए तभी हमारी आने वाली किसी भी वार्ता का कोई मायने होगा. भारत आशान्वित है कि पाकिस्तान उन दोषी लोगो के खिलाफ कारवाई करेगा. भारत ने उस मसले को लेकर सारे सबूत भी पाकिस्तान को सौंप दिए हैं.

कभी भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित पूर्व विदेश मंत्री और आज नवाज़ शरीफ सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सरताज अज़ीज़ का भी भारत के प्रति रवैया काफी दोस्ताना हो गया है, जो कि उनकी कार्यशैली में भी दिखाई दे रहा है. इसे एक बेहतर कदम कहा जा सकता है.

आज की तारीख में भारत-पाक दोस्ती में श्री सरताज अज़ीज़ एक अहम कड़ी बताये जा रहे हैं. श्री अजीज 1999 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री थे. अपने दिल्ली दौरे में उन्होंने एक प्रेस वार्ता की थी,उसमे मैंने भी भारत-पाक सीमा अतिक्रमण को लेकर सवाल किया था. जिस पर उनके दिए गए जवाब से उस प्रेस वार्ता में ठहाको की ध्वनि सुनायी थी. सवाल था- सीमा पर अति चौकसी होते हुए पाक सैनिक भारत की सीमा में कैसे और क्यों आ जाते है. तो उनका जवाब था, बर्फ पिघलने की वजह से सीमा रेखा का पता नहीं चल पाता. जबकि सबको पता है की सीमा को कई प्रकार से चिन्हित किया गया है.

खैर, आज की तमाम हालातों और परिस्थितियीं के मद्देनजर ऐसा लग रहा है कि श्री अज़ीज़ साहब दोनों देशों के बीच कोई सीमा नहीं रहने देंगे,काश ऐसा जल्दी हो जाये तो हम संयुक्त तौर पर विश्व में एक अनूठी ताक़त बन सकते हैं.

आतंकवाद के खिलाफ लडाई में कौन श्रेष्ठ है, कौन गुरु है. ये सबको  पता है. पाकिस्तान के उन स्वार्थी तत्वों को भी अब पता चलने लगा है कि अब उनके सम्पूर्ण खात्मे का वक़्त आ गया है. विश्व इतिहास गवाह है कि ऐसे तत्वों का अवसान अवश्यम्भावी है. ओसामा बिन लादेन एक ताज़ा तरीन ज्वलंत उदाहरण है हम सबके सामने. लेकिन उन अलगाववादी विचार वालो का क्या करेंगे,जो मानवता के दुश्मन हैं. विश्व की मानवता उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगी .