सुरक्षा का सवाल और मोदी का अप्रत्याशित कदम
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

 मुकेश भूषण

भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के पिछले दिनों अप्रत्याशित हृदय परिवर्तन वाली भाव-भंगिमाओं के बाद यह डर सताने लगा था कि पाकिस्तान के 'नॉन स्टेट एक्टर', जिसमें अघोषित तौर पर सेना भी शामिल है, का अगला कदम क्या और कितना खतरनाक होगा? इसका जवाब शनिवार को भारत के सीमावर्ती पठानकोट स्थित एयरफोर्स स्टेशन पर आतंकी हमले से मिल गया. स्वाभाविक तौर पर यह माना जा रहा है कि इस हमले का उद्देश्य दोनों देशो के बीच संबंध सुधारने के लिए तय वार्ताओं को पटरी से उतारना है. इससे पहले के शांति प्रयासों और आतंकी हमलों के विश्लेषणों के आधार पर ऐसी ही धारणा बनती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचानक पाकिस्तान यात्रा के बाद आतंकी स्कूल चलानेवाले जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद की बौखलाहट से भी यही अंदेशा था कि जल्द ही कुछ ऐसा हो सकता है जो दोनों देशों के शांति प्रयासों को बाधित करने के लिए संभव है. भारतीय खुफिया एजेंसियां ऐसे हमले की आशंका जता चुकी थीं और इसके मद्देनजर अलर्ट भी जारी कर दिया गया था. बावजूद इसके आतंकी हमला करने में सफल रहे और इसमें हमारे सात जवान शहीद हो गए. हालांकि हमारे जवानों की शहादत ने एयरफोर्स बेस को नुकसान पहुंचाने के आतंकियों के टारगेट को विफल कर दिया, फिर भी यह गंभीर चिंता की बात है कि अपने हथियारों और गोला-बारूद के साथ वे भारतीय सीमा में प्रवेश करते हुए करीब तीस किलोमीटर अंदर तक घुसने और अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल रहे. हम यह समझ सकते हैं कि पाकिस्तान रेंजर्स की मदद के बगैर ऐसा होना संभव नहीं है. पर हमारी चिंता इसलिए ज्यादा होनी चाहिए कि ऐसा होना भारतीय भूमि से मदद के बगैर भी कठिन दिखता है. तो क्या पंजाब में एक बार फिर आतंकियों के मददगार पैदा हो गए हैं? पिछले दिनों पंजाब के राजनीतिक घटनाक्रमों में जिस तरह पूर्व आतंकियों की घुसपैठ नजर आई है, उससे यह आशंका प्रबल होती जा रही है कि इस राज्य में कुछ ऐसा असामान्य हो रहा है जिसे समय रहते नहीं निबटा गया तो आगे और भी बुरी खबरें आ सकती हैं. जम्मू-कश्मीर से लगी पाकिस्तान सीमा घुसपैठ के लिए अबतक मुफीद रही है. यदि पंजाब से लगी सीमा भी घुसपैठियों को अनुकूल लगने लगे तो उसके परिणाम की कल्पना की जा सकती है. एक टीवी चैनल पर बहस में सीमा सुरक्षा बल के एडीजी पीके मिश्रा की यह स्वीकारोक्ति कि बीएसएफ को धुसपैठ रोकने के लिए जितनी और जैसी ट्रेनिंग की जरूरत है नहीं मिल रही है, हमें और चिंतित करती है. एक पुलिस अधीक्षक के अपहरण के बाद जरूरी सतर्कता में लापरवाही भी कटघरे में है, जिसके कारण आतंकियों को उनके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सकता था. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे हमलों के बाद पाकिस्तान पर आरोप मढ़ देना काफी है या हमें अपनी सुरक्षा अभेद्य बनाने के लिए भी जरूरी कदम उठाना चाहिए?

पठानकोट हमले के बाद स्वाभाविक तौर पर मोदी सरकार अपने हालिया 'गुडविल जेस्चर' के कारण विपक्ष के निशाने पर है. इसलिए नहीं कि विपक्ष शांति प्रक्रिया के खिलाफ है बल्कि, इसलिए कि सत्ताशीन एनडीए के लिए पाकिस्तान हमेशा एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसका इस्तेमाल उसने पिछली यूपीए सरकारों को कटघरे में खड़ा करने के लिए ही किया है. पिछली सरकारों के शांति प्रयासों के औचित्य और उनके नतीजों को लेकर भाजपा काफी आक्रामक रही है. दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की गैर-भाजपाई कोशिशों को भाजपा ने हमेशा गैरजरूरी और असामयिक ही माना था. उसने पहले ऐसे किसी मौके को हाथ से नहीं जाने दिया, जिसमें आतंकी वारदात के बावजूद शांति वार्ताओं को आगे बढाने के प्रयास किए गए. यह कहना गलत नहीं होगा कि इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल करते हुए ही भाजपा सत्ता में आई है. तब कांग्रेस अक्सर भाजपा से यह कहती रही कि दोनों देशों के कूटनीतिक मामलों को राजनीति से दूर रखें. अब यही बात भाजपा को कहनी पड़ रही है. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावलेकर ने रविवार को ही यह कहा कि आतंकी हमले के कारण शाति वार्ता को रोकना ठीक नहीं है. उन्होंने कांग्रेस पर मामले के राजनीतिकरण का आरोप लगाया है. 'जो दूसरों के लिए गढ्ढे खोदते हैं वे एक दिन खुद उसमें गिर सकते हैं.' भाजपा नेताओं को इन दिनों सपने में ऐसे गढ्ढे जरूर नजर आ रहे होंगे जिसे खोदते समय उन्होंने इसबात का ध्यान नहीं रखा कि कभी सत्ता में आने के बाद उनके लिए भी वैसी समस्या हो सकती है. कांग्रेस ने संसद के पिछले सत्रों को जिस तरह बर्बाद किया वह अक्सर यूपीए सरकार के उन दिनों की याद दिलानेवाला था जब यही काम विपक्ष के रूप में पूरे दमखम के साथ भाजपा यह कहकर करती थी कि यह उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है . दरअसल, इतिहास में इसबात का उल्लेख जरूर किया जाएगा कि भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी ही वह अंतिम नेता थे जिन्होंने विपक्ष में होते हुए भी पार्टी के लाभ से ज्यादा संसद की गरिमा का ख्याल रखा. सक्रिय राजनीति से उनके हटने के बाद संसदीय परंपराओ की मर्यादा और उसके महत्व को ताक पर रखकर भाजपा ने राजनीति की. अब यही काम कांग्रेस कर रही है. वैसे भी कांग्रेस को विपक्ष में रहने का ज्यादा अनुभव नहीं है. ऊपर से राहुल गांधी के अपरिपक्व नेतृत्व से संसद की गरिमा का ख्याल रखने की उम्मीद बेमानी है जो कांग्रेस को भी दिशा देने में अममर्थ हैं. इसलिए संभावना यही ज्यादा है कि पठानकोट हमले ने कांग्रेस सहित विपक्ष को एक और मौका दे दिया है जिससे वह भविष्य में भी संसद का कामकाज ठप कर सके. जबकि, देश की सुरक्षा एक ऐसा मुद्दा होना चाहिए जिसे राजनीति से अलग रखा जा सके. यह तभी संभव है जब न सिर्फ सत्ताधारी बल्कि विपक्षी पार्टियां भी इस बारे में एकमत हों कि घरेलू राजनीति को इससे अलग रखा जाए. इतिहास इस बात का गवाह है कि मोदी के नेतृत्व में वर्तमान भाजपा के उदय के साथ-साथ घरेलू राजनीति में विदेश नीति का तड़का लगाने के लगातार प्रयास किए गए हैं. पिछले आम चुनाव में तो मनमोहन सिंह की विदेश नीति, खासकर पाकिस्तान से भारत के संबंधों को, एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया गया था. मोदी और उनके सहयोगी चुनाव प्रचार के दौरान अक्सर पाकिस्तान को मुद्दा बनाते रहे थे. ऐसा करते समय तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत हमला करने से भी परहेज नहीं किया गया. अब जब मोदी खुद प्रधानमंत्री हैं, विपक्ष तो क्या अपनी पार्टी को भी विश्वास में लेने की उन्हें जरूरत शायद ही महसूस हो रही है. इसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान का उनका हालिया 'सरप्राइज विजिट' है, जिसके 'प्लांड सरप्राइज' होने के तमाम संकेत मिल रहे हैं.

बहरहाल, अब देश इस बात की प्रतीक्षा में है कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का अगला कदम क्या होगा? वह स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से पोषित हैं और ऐसी पार्टी की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जिसे राष्ट्रवाद को हिदूवाद का पर्यायवाची मानने के लिए जाना जाता है. मोदी स्वयं को हिंदू राष्ट्रवादी के रूप में विज्ञापित कराना पसंद करते रहे हैं. इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि हाल के वर्षों में कांग्रेस से उसके राष्ट्रवादी पहचान को छीनकर हिंदूवादी पार्टी भाजपा ने अपने साथ चस्पा कर लिया है. अब भाजपा के विरोध का मतलब हिंदुओं का विरोध और सरकार के विरोध का अर्थ राष्ट्र का विरोध समझाने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं. देश के एक वर्ग को तो यह समझा भी दिया गया है और वही भाजपा का आधार वोटबैंक है. ऐसे माहौल में उस देश के साथ संबध बेहतर करने के प्रयास को उचित ठहराना मोदी के लिए एक कठिन चुनौती होगी जिसकी कारगुजारियों के कारण पठानकोट में हमारे सात जवान शहीद हो गए. कथित हिंदू राष्ट्रवादी सोच तो यही कहती रही है कि जबतक पाकिस्तान यह महसूस नहीं कराता कि वह सुधर रहा है, तबतक उसके साथ संबंध सुधारने के प्रयास नहीं किए जाने चाहिए. यह सोच तो एक कदम आगे बढकर यह भी कहती रही है कि न सुधरने की स्थिति में पाकिस्तान को सुधार देना चाहिए. तो प्रधानमंत्री अब क्या करेंगे? क्या संबंध सुधारने के लिए तय वार्ताओं को रोक देंगे या पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कोई वैसा ही अप्रत्याशित कदम उठाएंगे जैसा उन्होंने प्रधानमंत्री शरीफ की पोती की शादी में शरीक होने के लिए लाहौर जाकर किया था?  या वह बहुलतावादी राष्ट्र राज्य के लोकतांत्रिक मुखिया के रूप में आतंकवादियों और पाकिस्तान के 'नॉन स्टेट ऐक्टर'  के मसूबों पर पानी फेरते हुए पाकिस्तान की कमजोर लोकतांत्रिक सरकार को मजबूत बनाते हुए शांतिवार्ताओं को जारी रखेंगे? जाहिर है कि यदि वह पहला विकल्प चुनते हैं तो उस विचारधारा को आगे बढा़ते हुए प्रतीत होंगे जो आरएसएस का आधार है और यदि दूसरे विकल्प को चुनते हैं तो अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुके हुए नजर आएंगे. वैसे, एक तीसरा विकल्प वार्ताओं को कुछ समय के लिए टालकर फिर से शुरू करने का हो सकता है. यदि ऐसा होता है तो यह सभी पक्षों को मुगालते में रखनेवाला और कहीं नहीं पहुंचनेवाला होगा. कांग्रेस अबतक यही रास्ता अख्तियार करती रही है. इसीलिए आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान संबध सुधारने के तमाम प्रयास कदमताल साबित हुए हैं, जिसमें चलने की आवाज तो दूर-दूर तक सुनी जाती है पर हम जहां के तहां खड़े रहते हैं. यदि मोदी तीसरा विकल्प अपनाते हैं तो वे कांग्रेस के पदचिह्नों पर ही चलेंगे. इसतरह कांग्रेसमुक्त भारत का उनका एक प्रमुख चुनावी नारा एक बार फिर कांग्रेस का स्थान ग्रहण करने के लिए लगाया जानेवाला नारा ही साबित होगा. भारत-पाकिस्तान रिश्तों के मद्देनजर मोदी का भावी कदम दरअसल दक्षिणपंथी विचारधारा के अंतरविरोधों को और उजागर करनेवाला हो सकता है. देखना महत्वपूर्ण है कि मोदी इन अंतरविरोधों को उजागर करने का जोखिम उठाते हुए किस तरह शांतिप्रिय अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी छवि विकसित कर पाते हैं? मोदी अभी जहां खड़े हैं वहां एक तरफ शांति के नोबेल पुरस्कार की 'माया' है तो दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्रवाद के 'राम'. और उनके ठीक सामने वह रास्ता है जिसपर चलना उस कहावत को चरितार्थ करना है कि 'माया मिली न राम'. इसी सप्ताह यह तय हो जाएगा कि मोदी किस रास्ते पर चलने का माद्दा रखते हैं.