सिंधु जल समझौता तोड़ने के क्या होगें मायने
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संदीप झा 

नई दिल्ली : उड़ी आतंकी हमले के बाद से देश में लगातार पाकिस्तान के साथ 1960 में किए गए सिंधु जल समझौते को तोड़ने की मांग चारो तरफ से उठने लगी है। भारत पाकिस्तान मामलों के जानकार भी इस एक विकल्प पर विचार करने के संकेत देते दिखते हैं। इसी क्रम में सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल संसाधन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, विदेश सचिव एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ इस संधि की समीक्षा के लिए एक बैठक भी बुलाई। ज़ाहिर है सिंधु के पानी को लेकर 56 साल पहले हुई संधि तोड़ने के संकेत भर से पाकिस्तान की करतूतों से नाराज भारतीय उत्साहित हैं तो लेकिन इस संधि को तोड़ने के क्या मायने होंगे पाकिस्तान के लिए और भारत को इस फैसले के बाद किस तरह की चुनौतियों से होना पड़ेगा दो चार ?  

जानकार इस समझौते को इतिहास की इस सबसे उदारजल संधि बताते हैं। जाहिर है इसके खत्म होने से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाकर इसका संकेत दे भी चुके हैं।

सिंधु के अलावा संधि में दर्ज चिनाब और झेलम पाकिस्तान के लिए लाइफ लाइन की तरह है। पाकिस्तान के दो तिहाई हिस्से में सिंधु और उसकी सहायक नदियां बहती हैं। इस तरह उसका करीब 65 फीसदी हिस्सा इनके किनारे है। इन नदियों का पानी रोका जाता है तो पाकिस्तान की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। पाकिस्तान ने इस पर बांध बनाए हैं, जहां बिजली उत्पादन से जुड़े कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। संधि टूटने पर ये ठप्प पड़ सकते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए पाकिस्तान को पानी के लिए भारी खर्च करना पड़ेगा। इससे उस पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। यानी पहले से 163 बिलियन डॉलर यानी 17 खरब रुपए के कर्ज में डूबे पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। यही कारण है कि पाकिस्तान की करतूतों से नाराज भारतीय, संधि तोड़ देने के इशारे भर से ही उत्साहित हैं।

1948 में बंटवारे के कुछ महीने बाद भारत ने पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी देना बंद कर दिया था। पाकिस्तान के वर्षों तक गिड़गिड़ाने के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाक राष्ट्रपति अयूब खान ने पानी को लेकर एक संधि पर हस्ताक्षर किए। इसमें तय हुआ कि सिंधु नदी बेसिन में बहने वाली 6 नदियों को पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बांटा जाएगा। पूर्वी हिस्से में बहने वाली सतलज, रावी और व्यास के पानी पर भारत का पूरा अधिकार होगा। वहीं पश्चिमी हिस्से में बह रही सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी का भारत सीमित इस्तेमाल कर सकेगा। संधि के मुताबिक भारत इन नदियों के पानी का कुल 20 प्रतिशत पानी ही रोक सकता है। वह चाहे तो इन नदियों पर बांध बना सकता है, लेकिन उसे रन ऑफ द रिवर प्रोजेक्ट ही बनाने होंगे, जिनके तहत पानी को रोका नहीं जाता। ऐसे में पाकिस्तान के हिस्से में इन नदियों का 167.2 अरब घन मीटर पानी सालाना जाता है। यही वजह है कि इसे इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा भी कहा जाता है।

अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (आईडब्ल्यूएमआई) और टाटा जल नीति कार्यक्रम द्वारा 2005 में इस संधि पर प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भी इसे भंग करने की जरूरत का उल्लेख है। इंडस वाटर ट्रीटी: स्क्रैप्ड ऑर अब्रोगेटेडशीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार संधि जम्मू-कश्मीर को सालाना लगभग 6500 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचा रही है। इसलिए कि इससे घाटी में खेती तथा बिजली पैदा करने की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इन नदियों के पानी का इस्तेमाल किया जाए तो घाटी में 20000 मेगावाट बिजली का अतिरिक्त उत्पादन हो सकता है। दरअसल संधि की वजह से बगलीहार परियोजना के लिए एक-एक इंच भूमि इस्तेमाल करने की इजाजत के लिए भारत को भारी मशक्कत करनी पड़ी है, जबकि किशन-गंगा, वूलर बैराज और तुल-बुल परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।

जल संधि के तहत भारत की यह जिम्मेदारी भी है कि वह सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों पर बनाई जाने वाली किसी भी बिजली परियोजना के बारे में पूरी जानकारी पाकिस्तान को दे। इसके अलावा नदियों से कितना पानी पाकिस्तान की तरफ बहता है, उसके बारे में भी जानकारी हर महीने दी जाती है। दोनों देशों ने एक जल आयोग बनाया है, जिसकी हर साल बैठक होती है। इसमें संधि के बारे में दोनों देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है और आपसी शिकायतें दूर करने की कोशिश की जाती है।

सिंधु दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसकी लंबाई 3180 किलोमीटर से अधिक है, यानी ये गंगा से 655 किलोमीटर बड़ी है। सहायक नदी चिनाब, झेलम, सतलज, राबी और व्यास के साथ इसका संगम पाकिस्तान में होता है। सिंधु नदी बेसिन करीब साढ़े ग्यारह लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। मतलब उत्तर प्रदेश जैसे 4 राज्य इसमें समा सकते हैं। सिंधु और सतलज नदी का उद्गम चीन में है, जबकि बाकी चार नदियां भारत से ही निकलती हैं। सभी नदियों के साथ मिलते हुए विराट सिंधु नदी कराची के पास अरब सागर में गिरती है।

इस समझौते को तोड़ने और उसका असर पैदा करने के लिए भारत को भी तत्काल कई काम करने होंगे। सिंधु, चिनाब व झेलम के पानी को रोकने के लिए भारत को बांध और कई नहरें बनानी होंगी, जिसके लिए पैसे और वक्त की जरूरत होगी। हालांकि बांध बनने के बाद नदी के आसपास के रिहायशी इलाकों के लिए डूब का खतरा खड़ा हो सकता है।

चीन से भी कई नदियां भारत में आती हैं। आने वाले दिनों में चीन संधि तोड़ने को मुद्दा बनाते हुए भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। पड़ोसी देश बांग्लादेश व नेपाल के साथ भारत की नदी जल संधियां हैं। ऐसे में इन पर भी इसका असर पड़ सकता है।

संधि तोड़ी तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि भी प्रभावित होगी। अगर भारत अब पानी रोकता है तो पाकिस्तान को हर मंच पर भारत के खिलाफ बोलने का एक मौका मिलेगा और वह इसे मानवाधिकारों से जोड़ेगा। भारत को इन्हीं तीन बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।

 

लिहाज़ा इस तरह के किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले भारत सरकार को इन तमाम संभावनाओं और चुनौतियों से निपटने की पुख्ता रणनीति बनानी होगी।