भारत कांग्रेस मुक्त होगा या कांग्रेस राहुल मुक्त ?
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

*कुमार राकेश*

क्या देश सचमुच में कांग्रेस मुक्त हो जायेगा या कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से मुक्त हो जायेगा?ये दोनों सवाल आज की तारीख में देश में आम चर्चा का विषय है.

सेना के शौर्य और बहादुरी को को दलाली जैसे शब्द से परिभाषित करना क्या दर्शाता है.देश की अति प्राचीन पार्टी कांग्रेस को क्या हो गया है? क्या पार्टी के चिन्तक सठिया गए है या कांग्रेस के अन्दर कुछ स्वनामधन्य नेता पार्टी को नेस्तनाबूद करना चाहते है.शायद इसीलिए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि वह राहुल गाँधी के बातो को गंभीरता पूर्वक नहीं लेते और न ही कोई विश्लेषण करते है.

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंवादियों को मार गिराने का काम जो भारतीय सेना ने किया,उसका पूरे विश्व में सराहना की गयी है और की जा रही है.उस कार्य को सेना की भाषा में सर्जिकल स्ट्राइक कहा गया है.वो भी आतंकवाद के खिलाफ.इससे पाकिस्तान के दहशत का आलम है.पाकिस्तान में उस देश की आज़ादी से अब तक अल्लाह,आर्मी के नाम पर अपनी राजनीतिक दूकान चलाने वाले सभी सियासतदारो की हवा खराब बताई जा रही है.जबकि भारत में कुछ नेता पाकिस्तान की तरफदारी करते देखे जा रहे हैं. उनमे से सर्वश्रेष्ठ कांग्रेस के राहुल गाँधी और उनके अनुयायी दिग्विजय सिंह और संजय निरुपम जैसे नेता हैं.उन नेताओ के बयानों ने मरते, तड़पते,अपने दर्द से बिलबिलाते और भारतीय सेना की कहर  से कराहते पाकिस्तान को ऑक्सीजन प्रदान करने की कोशिश है.जो बार बार निंदनीय है.

सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पहले करीब 70 साल के नौजवान नेता और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने देश की धरा और धारा के खिलाफ बोला.फिर शिव सेना से कांग्रेस में अपना ठौर जमाये संजय निरुपम ने तो हद ही कर दी.सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग लिया.संजय एक पत्रकार भी रहे हैं,उन्हें सेना और उनकी कार्य पद्धति के बारे में ज्ञान होना चाहिए,शायद उन्हें राष्ट्रवाद की परिभाषा भी आती होगी.लेकिन हो सकता है कांग्रेस की नयी दोस्ती और संगत से वे अपने निहित स्वार्थों की वजह से राष्ट्रवाद और उनके मर्म को भूल गए होंगे,तभी उन्होंने सिर्फ प्रचार पाने के लिए एक नया हथकंडा निकला और उसे खाली-पिली खूब घुमाया.लेकिन उनकी नयी पार्टी के राजकुमार राहुल गाँधी ने तो अति कर दी.

राहुल गाँधी ने अपने बयान में कहा था कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी “खून की दलाली” कर रहे है.पर ये हैरत करने वाली बात है कि राहुल क्या बोलते है या उनसे क्या बुलवाया जाता है.शायद वह अपने बड़े दिमाग का बिलकुल इस्तेमाल नहीं करते.तभी इस तरह का बेतुका बयान देकर पूरे विश्व में अपनी भद पिटवा रहे हैं.क्या किसी भी राजनीतिक दल को विरोध के लिए इस सीमा तक जाना चाहिए?क्या ये जायज़ है,क्या ऐसा राष्ट्रहित में है?ऐसा क्यों?,ये वही राहुल गाँधी है जो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को सराहना की थी.उससे पूरे देश में एक राष्ट्रवाद का संदेश गया था.अचानक अपने कहे हुए से पलटने का क्या औचित्य है,जो किसी के लिए सही नहीं कहा जा सकता.

राहुल गाँधी का एक बयान ये हो सकता था कि भाजपा सेना के शौर्य और कर्मो से अपना राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है,जो नहीं होना चाहिए.भाजपा यदि ऐसा करती है तो वो गलत है.लेकिन खून की दलाली की बात से क्या मतलब निकलता है.क्या राहुल और उनके सिपह्सालार इस बयान का देश हित में कोई मायने बता सकते है. लगता है कि कांग्रेस के अन्दर खाने राहुल गाँधी के खिलाफ कोई गहरी साज़िश रची गयी है.जिसका शिकार बेचारे राहुल हो रहे है.इस बयान के पहले भी राहुल के कई बयानों से हंगामा मचा और राहुल की काफी किरकिरी हई.फिर भी उनकी सोच और स्थिति में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा.

कांग्रेस के कुछ खेवनहारो की बात माने तो लगता है कि एक सुनियोजित साज़िश के तहत राहुल को पार्टी से किनारा किये जाने पर कई प्रकार से काम चालू है. पार्टी को बचाने के नाम पर ऐन वक़्त और शुभ मुहूर्त में एक बचे मोहरे प्रियंका गाँधी को सामने लाया जा सकता है.उस मुहिम पर कई नेता अंदरखाने सक्रिय है.क्योकि सोनिया गाँधी अपने पुत्र मोह वश प्रियंका के पक्ष में कभी नहीं रही.जबकि प्रियंका,राहुल के मुकाबले कई गुना बेहतर बताई जा रही हैं.इससे कांग्रेस का राहुल मुक्त होना साफ़ दिख रहा है.

कांग्रेस पार्टी के अन्दर पहले दो ध्रुव थे,अब चार ध्रुव बन गए है.आज की स्थिति में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी कई कारणों से बेबस और विवश है,उनकी विवशता से पार्टी में संग्राम मचा हुआ है.जो नियंत्रित होता नहीं दिखा रहा है.इसलिए मुझे इस बात की आशंका है कि आने वाले दिनों में भारत कही कांग्रेस मुक्त न हो जाये,जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी दावा है और स्वप्न भी.

देश में ये बात अब सभी राजनीतिक दलों को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा कि विरोध का क्या  मतलब है. विरोध की सीमा क्या.किसके लिए विरोध.देश में सत्ता और विपक्ष का टकराव जायज़ है और न्यायोचित भी.जो कि एक जीवंत लोकतंत्र के लिए अति आवश्यक हैं.कांग्रेस एक विपक्षी दल है.इसलिए उन्हें ये तय करना होगा कि एक विपक्ष होने के नाते कैसा विरोध करे. मुद्देगत विरोध का सदैव स्वागत है और होना चाहिए.पर ऐसा लग रहा है वो नहीं हो पा रहा है.

एक सवाल ये भी है कि देश बड़ी या पार्टी.लेकिन लगता है कि कोंग्रेस के कुछ नेताओ को सत्ता का ऐसा नशा है,जो अभी तक नहीं उतर सका है.सबको पता है मोदी सरकार के करीब 28 महीने पूरे हो गए.

मेरा मानना है देश से बड़ा कोई नहीं.राष्ट्र से बड़ा कोई धर्म ,जाति ,पार्टी नहीं.नहीं हो सकता और न कभी होना चाहिए.जब देश नहीं तो आप और हम कहाँ होंगे.आपकी पहचान देश से है.शायद तभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि राहुल गाँधी के कोंग्रेस के मूल विचार में कोई बड़ा खोट है ,कोई बड़ी गड़बड़ी है.इसलिए राहुल को राष्ट्र धर्म की बातें पल्ले नहीं पड़ती. 

आज की स्थिति में आतंकवाद एक अहम अंतर्राष्ट्रीय मसला है.एशिया के कई भागों के अलावा यूरोप,अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के कई देश आतंकी और उनके कुकृत्यों से बेहाल हैं.हाल में पेरिस और बेल्जियम की घटना से पूरा यूरोप अन्दर से सहमा हुआ है.आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान और मुस्लिम समुदाय पूरी तरह से संदेह के घेरे में है**

*कुमार राकेश