स्वार्थ व अहम से ऊपर उठ कर सोचें पुरुष।
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

रोली पाठक 

अक्सर देखा गया है कि महिलाओं के अधिकार व्  सुरक्षा के लिये स्वयं महिलाओं को ही आवाज़ बुलंद करनी पड़ती है किंतु पहली बार उप्र के चुनाव की राजनीति से प्रेरित हो कर ही सही "तीन तलाक़" को 'यूज़करने के मुद्दे पर देशवासियों की नज़र गयी व् हर धर्म के लोगों ने खुल कर इस चर्चा में भाग लिया जो शायद मुस्लिम समुदाय के पुरुषों को नागवार भी गुज़राजिसके चलते ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट में यह हलफनामा दाख़िल किया कि - मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके,बल्कि यह इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ क़ुरान से लिया गया हैअतः इसमें फेरबदल संभव ही नहीं । बोर्ड ने तीन तलाक़ की वकालत करते हुए इसे वाज़िब करार दिया । हलफनामे में कहा गया कि तलाक़शादी व् देखरेख अलग-अलग धर्म में अलग-अलग तरह से वर्णित व् मान्य हैंएक धर्म को आधार बना कर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं दे सकता ।

मुस्लिम समुदाय पूरी तरह पुरुष प्रधान माना जाता हैजहाँ महिलाओं को बहुत कम अधिकार हैं । ऐसे में तीन तलाक़ के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं का आवाज़ उठाना एक क्रान्तिकारी परिवर्तन का द्योतक है । हालाँकि यह सही है कि किसी भी धर्म के अंदरूनी मामले में दखलंदाज़ी का अधिकार किसी को नहीं किन्तु इस बेहद संजीदा व् संवेदनशील मुद्दे को लेकर महिलाओं ने आवाज़ बुलंद की क्योंकि यह मामला उनके वज़ूद से उनके सम्मानसुरक्षा व उनके अस्तित्व से जुड़ा हुआ है । किस तरह उसका जीवनसाथी बगैर उसकी रज़ामन्दी के मात्र तीन अलफ़ाज़ कह कर उससे नाता तोड़ ले !

पश्चिम बंगाल की इशरत जहां को उसके पति ने दुबई से फोन पर तीन बार तलाक़ कहा और अपने वर्षों पुराने सम्बन्ध ख़त्म कर दिए । कई बार गुस्से मेंभावात्मक संवेग के चलते पुरुषों ने तीन बार तलाक़ कह कर विवाह विच्छेद किया है । ऐसे में महिलाओं को अपने हक़ के लिए लड़ना वाज़िब है ।

80 के दशक में शाहबानो ने गुज़ारा भत्ता के लिए आवाज़ उठाई थीउस समय भी कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम पुरुष समुदाय ने जम कर बगावत की थी किन्तु संसद में कानून पारित हुआ और शाहबानो की जीत हुई ।

गौरतलब है कि उस वक़्त मंत्रिमंडल में समाज कल्याण राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस कानून की ख़िलाफ़त करते हुये मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था । इसका यही अर्थ है कि 30 वर्ष पूर्व महिलाओं की जो स्थिती थी वह आज भी है

वे आज भी पूर्णतः पुरुषों के फैसलों पर निर्भर हैं । विधि आयोग ने बहु विवाहतीन तलाक़ की व्यवस्थाहिन्दू महिलाओं का संपत्ति में अधिकार व् ईसाईयों के तलाक़ के मुद्दे पर भी राय मांगी है किंतु तीन तलाक व्यवस्था ने सर्वाधिक तूल पकड़ा क्योंकि मुस्लिम महिलाएं इस व्यवस्था से बेहद असुरक्षित हैंवे स्वयं इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं ।

कोई भी धर्म या समुदाय महिलाओं का इस तरह शोषण नहीं कर सकतान ही किसी भी धर्म में यह कहा गया है कि उनका इस सीमा तक दमन किया जाये कि उनकी गृहस्थी उजड़ जाये व् ज़िन्दगी और भविष्यअंधकारमय हो जाये ।

महज खुद के फायदे व् स्वार्थ के लिये कोई पुरुष अपनी पत्नी को इस अधिकार से कैसे वंचित रख सकता है। नकारात्मक कट्टरता किसी भी सामाजिक विचार या बंधन के लिए उचित नहीं। ऐसे में पुरुष समुदाय को पुनर्विचार की आवश्यकता है क्योंकि इससे उनकी बेटियोंबहनों व् माँ का भविष्य भी जुड़ा है ।

आज मुस्लिम समुदाय की महिलाएं हर क्षेत्र में नाम कमा रही हैंचाहे वह शिक्षा हो या खेल जगतफिल्म जगत हो या व्यापार । ऐसी दकियानूसी सोच को ख़त्म कर कुछ व्यक्तिगत मामलों में तो महिलाएं अपने अधिकारों की दावेदार हैं हीं । पुरुषों की खुली सोच महिलाओं के प्रति उन्हें सम्मान दिला सकती है, बदलते आधुनिक परिवेश में परिवर्तन जीवन को सुगम बना सकता है । हर पुरुष को आत्ममंथन की आवश्यकता है कि क्यों न उनकी पत्नी उनके साथ स्वयं को सुरक्षित व् सहज महसूस करे।

(लेखिका भोपाल स्थित स्वतंत्र चिंतक, टिप्पणीकार हैं एवं सामाजिक संगठन 'साकार' की संस्थापक हैं।)

 

रोली पाठक