अमेरिका चुनाव–क्लिन्टन हो या ट्रम्प,भारत की जय जय !
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

 

कुमार राकेश

मेरिका में भारतीय हर क्षेत्र में सक्रिय है और कई कंपनियों में तो दबंग की भूमिका में है। पर वो दबंग अंदाज़ न तो बिहारी वाला नहीं है,न ही सलमान खान टाइप फ़िल्मों वाला। वो अंदाज़ एक ठेठ अमेरिकी वाला है। जिन्हें आज भी स्वयं के भारतवंशी होने पर गर्व है। यदि हम अमेरिका की 50 बड़ी कंपनियों के नेतृत्व को देखे तो ज्यादातर कंपनियों पर भारतीय अमेरिकी अपना झंडा बुलंद कर रहे हैं। इस बार 8 नवम्बर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय अमेरिकी की भूमिका महत्वपूर्ण होने वाली है।

अमेरिका चुनाव को लेकर पिछले एक सप्ताह में मेरी 30 से ज्यादा लोगो से बातचीत हई है। वे अमेरिका के दस विभिन्न प्रान्तों में रहते हैं। जिनमे से ज्यादातर रिपब्लिकन राज्य कहलाते हैं। उनमे कुछ मूल अमेरिकी है तो कुछ भारतवंशी अमेरिकी। बातचीत का मुख्य मुद्दा अमेरिकी चुनाव था। उन लोगो में से कुछ रिपब्लिकन है तो कुछ डेमोक्रेट। कुछ स्वंतंत्र भी। अमेरिका में एक परंपरा है कि आप पार्टी आधार पर स्वयं को एक वोटर के तौर पर निबंधित करवा सकते है या फिर स्वंतंत्र भी रह सकते हैं।

उस बातचीत में एक हैरतंगेज तथ्य है। एक निबंधित रिपब्लिकन वोटर ने मेरे से कहा-मै तो हूँ,एक रिपब्लिकन,लेकिन वोट तो मैडम हिलेरी क्लिंटन को ही दूंगा। इससे अमेरिका चुनाव के नब्ज़ को पहचाना जा सकता है। पिछले अप्रैल-मई 2016 में मैं भी अमेरिका के दौरे पर था। कई राज्यों का भ्रमण भी  किया। उस दरम्यान भी मुझे यही लगा था कि अमेरिका के स्वाभाव के अनुसार मैडम हिलेरी क्लिंटन को ही बढ़त मिल सकती है। वह एक एक सक्षम महिला नेता है,जो अमेरिका जैसे देश को सशक्त नेतृत्व प्रदान कर सकती है। उस दरम्यान मेरी कई अमेरिकी नागरिको से जो बातचीत हुयी थी,उसका लब्बोलुआब यही है कि मैडम क्लिंटन जैसा कोई नहीं।

हालांकि पिछले दिनों किये गए कुछ सर्वे से राजनीतिक समीकरण कुछ गडबडाए से लग रहे हैं। मेरीलैंड राज्य के वरिष्ठ डेमोक्रेट और हिलेरी क्लिंटन के प्रचार के लिए समर्पित डॉ राजन नटराजन का दावा है कि कुछ भी हो। मैडम क्लिंटन ही अमेरिका की राष्ट्रपति बनेगी। डॉ नटराजन का इसके पीछे अपने तर्क और समीकरण हैं। डॉ नटराजन भारतीय अमेरिकी है जो मेरीलैंड ट्रांसपोर्ट कारपोरशन के प्रमुख रह चुके हैं।

अब तक के चुनाव प्रचार को देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सारे पत्ते खोल लिए हैं। भारत वंशी अमेरिकी से लेकर सभी प्रवासियों के लिए बड़े बड़े वादे कर लिए। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि श्री ट्रम्प ने आज तक जो भो बोला,उसको पलटने में देर नहीं लगायी। यहाँ तक कि जब श्री ट्रम्प और मैडम क्लिटन का टीवी पर मुख्य मुकाबला हुआ तो ट्रम्प की पोल पूरी तरह खुल गयी। चाहे वो महिला से जुड़े मसले हो या अमेरिका के समग्र विकास से।

आज तक के अमरीकी चुनाव समीकरणों को देखा जाये तो लगता है कि ट्रम्प को मुसलमानों का वोट नहीं मिलने वाला। गौरतलब है कि अमेरिका की राजनीति,व्यापार,शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र के कई फ्रंट पर मुसलमान समाज का दबदबा है। कहा जा रहा है कि ट्रम्प के मुस्लिम विरोध का सीधा राजनीतिक लाभ मैडम क्लिंटन को ही मिलने जा रहा है।

यदि दोनों उम्मीदवारों की तुलना करे तो मैडम क्लिंटन कई मामलो में ट्रम्प से आगे हैं,लेकिन हाल में क्लिंटन के लिए अवैध फण्ड और एफ़बीआई की जांच का मसला चिंता वाला है। हालाँकि ज्यादातर लोगो का मानना है कि उससे वोट प्रतिशत में कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। कुछ इसी तरह के आरोप पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के खिलाफ भी लगाये गए थे,फिर भी वह चुनाव जीत गए थे।

दोनों की तुलना की जाये तो डोनाल्ड ट्रम्प के खरबपति व्यापारी है। राजनीति में बिलकुल नए है। हाल में महिलाओ के खिलाफ टिप्पणियों से वे बैक फूट पर हैं, गौरतलब है ट्रम्प के खिलाफ अब तक 12 महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाये है। ट्रम्प के बारे में कहा जा रहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बन जाते है तो अमेरिका की वैदेशिक नीति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। ट्रम्प को अमेरिकी शासन का भी कोई अनुभव नहीं है। जबकि हिलेरी क्लिंटन अमेरिका की प्रथम महिला के अलावा राष्ट्रपति ओबामा के पहले कार्यकाल में सफल विदेश मंत्री रह चुकी है। मैडम क्लिंटन की जीत से अमेरिका में एक नया इतिहास बनेगा-महिला राष्ट्रपति का।

अमेरिका में आज तक जो भी राष्ट्रपति चुनाव हुए हैं, उन सबसे भिन्न हो गया है ट्रम्प बनाम क्लिंटन का चुनाव प्रचार। इस प्रचार में वे तमाम हथकंडे अपनाए गए,जो कि भारत में भी अपनाये जाते रहे हैं। जैसे जाति,धर्म ,वर्ग,श्रेणी और झूठ बोलकर अपने मतदाताओं को आकर्षित करना।

ये चुनाव पिछले 1996 के बाद बिलकुल अलग सा हो गया है। हालाँकि जब 2008 में श्री ओबामा राष्ट्रपति बने थे,तब अमेरिका की कमजोर और ढुलमुल आर्थिक नीति को एक चुनावी मुद्दा बनाया था। यदि उस आर्थिक स्थितियों का तुलनात्मक तौर पर विश्लेषण किया जाये तो उस फ्रंट पर ओबामा प्रशासन पूरी तरह सफल नहीं रहा। शायद इसलिए इस बार का चुनाव आम जरुरी मसलो से परे हटकर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप पर आकर टिक गया। इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि कही ये एक प्रकार से सुनियोजित प्रचार शैली तो नहीं।

अमेरिका का ये चुनाव इस बार अति रोचक बन गया है। चुनाव के 5 दिन बचे है ,लेकिन एक उहापोह की स्थिति दिख रही है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। फिर भी अपने कुछ अमेरिकी पत्रकारों और मित्रो की माने तो हिलेरी क्लिंटन,डोनाल्ड ट्रम्प से आगे निकल सकती है।

अमेरिकी राष्ट्रपति को लेकर किये दो बड़े सर्वे में डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन आगे बताई गयी हैं। भले ही मत प्रतिशत का अंतर काफी कम हो।

अमेरिका के चुनाव के भारत के परिपेक्ष्य में देखा जाये तो भारतीय जनता के एक खास समूह से डोनाल्ड ट्रम्प को समर्थन देने की बात कही गयी थी। उससे प्रभावित होकर अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े हिन्दू समिति के शलभ कुमार ने नई दिल्ली में भी एक बड़ा प्रेस कांफ्रेंस कर डाला। पर पते की बात ये रही की मुसलमान विरोध की बातें कर सुर्खिया बटोरने वाले डोनाल्ड ट्रम्प के इस समर्थक का भारत में आयोजक एक मुसलमान बुद्धिजीवी था। इससे ट्रम्प के विचारो और कार्यों में असमानता स्पष्ट झलकती है। संभवतः मुसलमान विरोध के तेवर की वजह से ही भारत में कुछ घटक दल और संस्थाएं डोनाल्ड ट्रम्प के प्रति सहानुभूति दिखाने लग गए थे। लेकिन फैसले के इस अंतिम बेला में ट्रम्प एक दम शांत से हो गए लगते हैं।

अमेरिका चुनाव और भारत के रिश्तों की जहाँ तक बात है ,उससे भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ने  वाला,हां एक बात जरुर हो सकता है कि यदि मैडम क्लिंटन जीत जाती है तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की ट्यूनिंग ओबामा शैली में चलती रहेगी। परस्पर सम्बन्धो की प्रक्रिया में भारत और अमेरिका जैसे दोनों महाशक्तियों को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। भले ही भारत के हिन्दू सिर्फ मुस्लिम विरोध के नाम पर डोनाल्ड ट्रम्प के नाम का डंका भारत और अमेरिका के कई शहरों में पीट रहे हों।

यदि हम भारतीय परिपेक्ष्य में अमेरिका की दोनों बड़ी पार्टियों का तुलनात्मक विश्लेषण करे तो डेमोक्रेट भारत की कांग्रेस की तरह अमेरिका की सबसे पुरानी पार्टी है,रिपब्लिकन उसी गंगोत्री से निकली हुए एक तरह से नयी पार्टी है ,जिसने इस बार अपनी नीतियों के अनुरूप उम्मीदवार खड़ी नहीं कर सकी। जबकि इसके पहले इसी रिपब्लिकन पार्टी ने कई विश्व चर्चित राष्ट्रपति अमेरिका को दिए।

अब देखना है कि आगामी 8 नवम्बर का ऐतिहासिक दिवस अमेरिका को किस प्रकार की गति प्रदान करता है । पर जो भी होगा ,वो भारत के लिए हर हाल में बेहतर होगा।

 

 कुमार राकेश