राष्ट्वाद और आतंकवाद बनाम एक ही विचारधारा का दुरूपयोग
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

***सौमित्र राय***

पेशे से ज्‍योतिष मेरे एक अभिन्‍न मित्र ने हाल में एक अनौपचारिक बातचीत में दावा किया कि अगर मोदी सरकार आगे एक साल और चल गई तो उसका स्‍थायित्‍व और मजबूत हो जाएगा. हालांकि, बीते डेढ़ साल के एनडीए राज में मेरा और मेरे जैसे कई लोगों का अनुभव कुछ भिन्‍न तरह का है. मोदी सरकार को लेकर मीडिया की धारणा भी शायद अब बदल रही है. जेएनयू विवाद के दौरान एक राष्‍ट्रीय टीवी चैनल ने तो बाकायदा एक सर्वेक्षण चला दिया, जिसमें 35 फीसदी लोगों ने ही चुनाव घोषणा पत्र में किए गए एनडीए के वादों के पूरा होने की उम्‍मीद जताई है. यह निराशा मुझे अक्‍सर अपनी यात्राओं में विभिन्‍न राज्‍यों के परिचित-अपरिचित लोगों की बातचीत में नजर आती है. लोग पूछते हैं, देश को भ्रष्‍टाचार मुक्‍त करने, विदेशों में जमा काला धन वापस लाने और महंगाई कम करने के वादों का क्‍या हुआ ? मोदी राज में देश आगे बढ़ने के बजाय कभी खान-पान पर पाबंदी तो कहीं गांधी-आंबेडकर पर हक जताने और कहीं राष्‍ट्रवाद के नाम पर कट्टरवादी हिंदू विचारधारा को थोपने की कोशिशों से दशकों पीछे जाता दिखाई दे रहा है.

मैंने पहले भी अपने लेख में कहा है कि केंद्र की मौजूदा एनडीए सरकार अपनी नाकामियों को राष्‍ट्रवाद की आड़ में छिपाने की कोशिश कर रही है. कॉर्पोरेट की गुलामी में गले तक फंस चुके मीडिया घरानों का सरकार को अच्‍छा समर्थन मिल रहा है. दिल्‍ली के जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय का ताजा विवाद इसका जीवंत दृष्‍टांत कहा जा सकता है. दिलचस्‍प बात यह है कि देश के गृह मंत्री ने तथ्‍यों को बिना जांच-परखे यह बयान दे दिया कि यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्‍यक्ष कन्‍हैया कुमार ने छात्रों की सभा में देशविरोधी बयान दिया है. इसके बाद नंबर आता है दिल्‍ली पुलिस का, जिन्‍होंने भी केवल टीवी रिपोर्टों के आधार पर कन्‍हैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. बाद में वही टीवी रिपोर्टें झूठी निकलीं. इस पूरे विवाद में शुरू से विश्‍वविद्यालय प्रशासन से लेकर छात्र संगठनों का बार-बार यही कहना रहा कि कन्‍हैया ने ऐसी कोई बात नहीं कही है, जो भारत देश की संप्रभुता, आइन और एकता-अखंडता को तोड़ने वाली हो. लेकिन, सत्‍ता और वैचारिक श्रेष्‍ठता को ताकत के दम पर साबित करने की जिद पाले बैठी सरकार और उसकी एजेंसियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी. न केवल गृह मंत्री बल्‍कि भाजपाई व सहयोगी दलों के मुख्‍यमंत्रियों, नेताओं, कार्यकर्ताओं ने भी वही ‘सरकारी भाषा’ में बयान दिए, जो सत्‍ता तंत्र को हमेशा भाता रहा है.

राष्‍ट्रवाद और आतंकवाद दो ऐसे शब्‍द हैं, जिनका दुनियाभर में दुरुपयोग होता रहा है. बदकिस्‍मति से दोनों शब्‍द एक ही विचारधारा के लोगों ने रचे हैं. वैश्‍विक स्‍तर पर दोनों शब्‍दों की कोई ठोस परिभाषा नहीं है. इसलिए आम जनता को गुमराह करने, उन्‍की आंखों में धूल झोंकने के लिए सरकारें मनमाफिक स्‍तर पर इन शब्‍दों को परिभाषित करती हैं. सभी यह चाहती हैं कि अवाम हर हाल में देश की नीतियों का समर्थन करे, फिर चाहे वे गलत ही क्‍यों न हों. सरकार के काम का आंखें मूंदकर समर्थन करना ही असली ‘राष्‍ट्रवाद’ है. इस अमानवीय और अनैतिक विचारधारा के जुनून ने सही और गलत की पहचान करने की लोगों की ताकत को कम कर दिया है. इसी बात का फायदा दुनिया के विभिन्‍न देशों में अवसरवादी और शोषक ताकतें उठा रही हैं. कन्‍हैया असल में इनका विरोध कर रहे थे. ठीक उसी तरह जैसे ‘खदानों’, बांधों और उद्योगों के लिए जोर-जबर्दस्‍ती जमीन हड़पने का आदिवासी विरोध करते हैं. दो सौ साल के अंग्रेजी राज और आज के राज में समानता यही है कि दोनों को विरोध के सुर नहीं सुहाते और मौलिक अधिकारों, समानता, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, पोषण, आजीविका और आवास के अधिकारों की मांग करने वाले उन्‍हें ‘नक्‍सली’, ‘देशद्रोही’ और आतंकवादी नजर आते हैं. बस्‍तर में ऐसे ‘विद्रोहियों’ के परिवारों की महिलाओं, मासूम बालिकाओं के साथ बलात्‍कार और पुरुषों को फर्जी मुठभेड़ में गोली मार देने के दर्जनों मामले सामने आए हैं. ऐसे घृणित कारनामों के पीछे केवल वैचारिक मत भिन्‍नता आधार नहीं हो सकता, बल्‍कि यह एक उन्‍माद है. झूठी नस्‍लीय, धार्मिक, जातीय श्रेष्‍ठता का उन्‍माद, जो इंसान को जानवर से भी बदतर बना देता है.

दिल्‍ली की पटियाला हाउस कोर्ट में कन्‍हैया की पेशी के वक्‍त वकीलों के हमले में यह पशुता साफ नजर आई. इस घटना से आंखें फेरने वाले ‘राष्‍ट्रवादियों’ और टीवी चैनलों में कैमरे के सामने बेनकाब हुए दोषियों पर कार्रवाई न करने वाले पुलिस-प्रशासन और सत्‍ताधीशों के व्‍यवहार को भी निस्‍संदेह उतना ही पशुतापूर्ण माना जाना चाहिए. असल में पाकिस्‍तान में तालिबान को जाहिल कट्टरपंथियों की फौज बताने वालों को जीवन में एक बार अपने गिरेबां में झांककर देख लेना चाहिए कि संविधान में धार्मिक स्‍वतंत्रता और बराबरी की मांग करने के एवज में देश से खदेड़ दिए गए अब्‍दुस समद और मलाला यूसुफजई में उन्‍हें किन भारतीयों का अक्‍स दिखता है. भारत में भी ‘राष्‍ट्रवदियों’ का कुनबा उतना ही जाहिल और कट्टरपंथी, निर्मम और अमानवीय है. मुझे समझ नहीं आता कि मोदी सरकार किस विकास की बात करती है ? समाज को शिक्षित किए बिना, देश में उच्‍च शिक्षा की गुणवत्‍ता को बुलंदी पर पहुंचाए बिना, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्‍साहित किए बिना विकास कैसे संभव है ? अमेरिका में 1960 के दशक से पहले विश्‍वविद्यालयों के कामकाज में सरकार का बड़ा हस्‍तक्षेप रहा करता था. लेकिन वियतनाम की जंग में करारी हार के बाद समान अधिकारों के लिए छात्रों के आंदोलन ने बेड़ियों को तोड़ दिया. नतीजा यह रहा कि वहां के विश्‍वविद्यालयों में आविष्‍कारों की बाढ़ लग गई. लेकिन भारत सरकार इससे सबक नहीं सीखना चाहती, क्‍योंकि उसे डर है कि जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय जैसी बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में बौद्धिक विरोध और असहमति सरकार के चेहरे से नकाब उतार सकती है. बौद्धिक विमर्श ‘राष्‍ट्रवाद का मुखौटा’ ओढ़े कुनबे की जहालत का पर्दाफ़ाश कर सकती है. यही वजह है कि दुनिया के सबसे बेहतरीन विश्‍वविद्यालयों में एक भी मुस्‍लिम देशों में नहीं हैं. अलबत्‍ता हमारे यहां कॉर्पोरेट घरानों के ‘फाइव स्‍टार’ विश्‍वविद्यालय जरूर हैं, जिनमें छात्रों को शोषणकारी बाजारवादी व्‍यवस्‍था से कदमताल करने की शिक्षा दी जाती है, सवाल पूछने, असहमति जताने की नहीं.

मुझे याद आता है रूस के निवेश बैंक रेनेसॉ कैपिटल का 5 साल पहले आया एक सर्वेक्षण, जो 150 देशों में लोकतंत्र और आर्थिक विकास के बीच अंर्तसंबंधों को आंकने के लिए किया गया था. इस सर्वेक्षण में इन देशों के

60 साल के इतिहास को खंगालने पर पाया गया कि प्रति व्‍यक्‍ति सकल घरेलू उत्‍पाद के 10 हजार डॉलर से अधिक होने के बाद लोकतंत्र का बाजा बज जाता है. कहीं न कहीं भारत सरकार, वैश्‍विक बाजार और हमारा समाज यही चाहता है और इसी दिशा में बढ़ भी रहा है. कोशिश यही है कि हमारे विश्‍वविद्यालय सायबर कुली तैयार करें.  हमारे छात्र नवाचार और आविष्‍कारों की दुनिया से परे हटकर एक विचारधारा के गुलाम बन जाएं और कट्टरवादी सोच को अपना लें. असहमति जताने वालों को ‘सिक्‍यूलर’, ‘देशद्रोही’, वामपंथी जैसे अपमानजनक शब्‍दों से पुकारें, सोशल मीडिया पर उनकी अभिव्‍यक्‍ति पर बेशर्मी से गालियां दें, जान से मारने की धमकी दें. फर्जी वीडियो बनाएं, असली तस्‍वीरों को तोड़-मरोड़कर पेश करें और इतिहास को जाने-समझे बिना गलत बयानी करें. देश की राजनीति का एक धड़ा पहले ही ‘वैचारिक गुलाम’ है. यह चाहता है कि देश की बहुसंख्‍यक कौम भी उनके बताए रास्‍ते पर ही चल पड़े.

कन्‍हैया इससे असहमत हैं. मेरे जैसे हजारों-लाखों लोग भी होंगे. सवाल यह है कि हम सभी की असहमतियों और अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता की गारंटी कौन देगा ? यह काम सरकार को करना चाहिए, लेकिन संविधान की शपथ लेकर सत्‍ता में बैठे लोग जब इसे देशद्रोह बताने लगते हैं तो यकीनन रास्‍ता आंदोलन की ओर मुड़ जाता है. इस दशक में अवाम ने दो बड़े आंदोलन देखे हैं. लेकिन इस बार इसकी बागडोर देश के बौद्धिक और ऊर्जावान वर्ग के हाथों में है. यही हम सभी की उम्‍मीद है. इसलिए, क्‍योंकि समानता और अधिकारों की बहाली की मांग करना कहीं भी देशद्रोह नहीं है.