जय जय जयललिता
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

जयललिता के जीवन में बचपन से, रुपहले पर्दे की चकाचौन्ध से लेकर राजनैतिक उथल-पुथल  हावी रही किन्तु वे अकेली ही थीं और अंत तक अकेली रहीं । उन्होंने एक बार कहा था - मेरा एक तिहाई जीवन माँ से प्रभावित है, एक तिहाई एमजीआर से व एक तिहाई मेरा अपना है ।

लाखों फैन्स, कार्यकर्ताओं की चहेती ने जब अंतिम सांस ली होगी तब वह जानती थी कि लोग किस तरह उनकी भक्ति करते हैं । उनका यही आत्मविश्वास यही गर्व उनके जीवन पर प्रभावी रहा ।

पंद्रह वर्षीय होनहार खूबसूरत बालिका को जब रुपहले पर्दे पर आने का प्रस्ताव मिला तब वह ना न कर सकी । अगली ही फिल्म में सुपर स्टार एमजीआर के साथ काम करने का मौका मिला जो एक स्वप्न था उसके लिए । इस तरह  दक्षिण भारत को एक खूबसूरत लोकप्रिय नायिका मिली । नायक ने अपने साथ कदम ताल मिला कर उस कमसिन बाला का फिल्मों से आगे बढ़ कर राजनीति से परिचय करवाया । 

राजनीति का यह सफऱ अनेक उतार- चढ़ाव के साथ ज़िन्दगी के साथ 5 दिसंबर की रात को थम गया । 

अक्खड़, ज़िद्दी, बददिमाग, तानाशाह, मूडी जैसे अनेक संबोधन थे उनके लिए किन्तु उनकी लोकप्रियता में कभी कोई कमी नहीं रही । "पुरातची तलाईवी" शब्द सही ही था उनके लिए । जीवन में दो अपमान वे कभी न भूल पायीं, मार्च 89 में तमिलनाडु विधानसभा में डीएमके द्वारा अपनी साड़ी के आँचल का गिरना व एमजीआर की मृत्यु पर उनके परिजनों व पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया उनका तिरस्कार ।

2002 में करूणानिधि को जब अर्द्ध रात्रि नींद से उठा कर गिरफ्तार किया गया तब यह उनके आँचल के अपमान का बदला माना गया । एमजीआर की पत्नी जानकी से ज़बरदस्त टकराव के बाद जब वे 91 में पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी तब उन्हें एमजीआर के शव के सिरहाने 2 दिन खड़े रहने के बावजूद शवयात्रा में शामिल न होने देने वाला दिन याद आया । ये वही लोग थे जो उन्हें धक्का दे रहे थे, अपमानित कर रहे थे और आज उनकी जय-जयकार कर रहे थे । 

फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली सौम्य, शालीन व् अति सुंदर जयललिता ने एमजीआर को इस तरह लुभाया कि वे उनके संरक्षक बन गए । राजनीति के सारे दाँव पेंच उन्होंने एमजीआर से सीखे किन्तु राजनीति में अक्सर शिष्य गुरु पर भारी पड़ जाता है, यही हुआ । एमजीआर की बीमारी के दौरान स्वयं को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर वे एमजीआर से इतनी दूर हो गईं कि उन्हें उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल होने नहीं दिया गया । 

कभी निर्देशक के इशारों पर चलने वाली जयललिता ने राजनीति में नेताओं को अपनी ऊँगली पर नचाया । उनका एकाकीपन अक्सर उनका समाज से प्रतिशोध जैसा दृष्टिकोण प्रतीत हुआ ।

लाखों प्रशंसकों से घिरी खूबसूरत बाला अंदर से कभी-कभी कहीं बेहद खाली लगती ।

पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके कम वयस के आत्मविश्वास से भरपूर चेहरे व् व्यक्तित्व में कठोरता आ गयी । उनके निर्णय उनके स्वयं के होते थे, उन्हें किसी का दखल बर्दाश्त न था । तेज आवाज़ की वे आदी नहीं थीं ।

मंत्रिमंडल के मंत्रियों तक से वे कम मिलतीं जुलतीं थीं । उन परभ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी नियुक्ति अवैध करार देने पर पद भी छोड़ना पड़ा किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी । वे न्यायालय से राहत मिलने पर दोबारा सत्ता में आईं । उन्हें लोगों की भक्ति, उनके द्वारा स्वयं की चरण वंदना बहुत भाती थी । वे इसे अपनी उपलब्धि मानती थीं ।

मुंहबोले भांजे सुधाकरण के विवाह में पानी की तरह पैसा बहाने पर उन्हें कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा किन्तु उनकी फैन फॉलोइंग अलग ही रही । दिन में जो लोग उनकी मृत्यु की झूठी खबर आते ही गुस्से से बेकाबू हो गए थे, रात में उस खबर की पुष्टि होने पर ज़ार-ज़ार रो रहे थे, आधी रात को सड़कों पर जन सैलाब उमड़ पड़ा, हज़ारों समर्थक, कार्यकर्त्ता व् उनके भक्तों ने शोकस्वरूप अपना सिर मुंडवा लिया । यह उनका जादू ही है जो सिर चढ़ कर बोल रहा है ।

जनमानस की नब्ज़ वे बखूबी पकड़ लेती थीं, मंगलसूत्र बाँटना, बालिकाओं की शिक्षा व विवाह के लिए योजनाओं का सफल क्रियान्वयन उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण रहे ।

उनके तुगलकी निर्णय उनके अपने होते थे, चाहे वह हड़ताल पर जाने वाले 2 लाख सरकारी कर्मचारियों को निकालने का हो या मंदिर में पशु बलि बंद करवाने का, किसानों की मुफ्त बिजली बंद करवाने का हो या महिलाओं को मुफ्त मिक्सर-ग्राइंडर बंटवाने का । 

वे किसी की नहीं सुनती थीं ।

कभी कांग्रेस से हाथ मिलाया कभी भाजपा के करीब आईं ।

जीवन में ठहराव की सदैव कमी रही किन्तु उनके जाने के बाद जन मानस की उमड़ती भावना, संवेग व उनके प्रति भक्ति ही उनकी असली पूंजी है ।

उनके कार्यकाल में खामियां रहीं तो उपलब्धियां भी रहीं ।

92 में "क्रेडल बेबी स्कीम" के अंतर्गत अनाथ व् बेसहारा बालिकाओं को सहारा मिला । महिला पुलिस थाने खोले गए । "अम्मा किचन" सर्वाधिक लोकप्रिय व् सफल रहा जिसे अन्य राज्य भी अपनाना चाहते हैं ।

यूँ ही कोई लोकप्रिय नहीं हो जाता,उस लोकप्रियता व आम जनता के समर्थन के पीछे अच्छे कार्य होते हैं । उन्होंने अपनी इच्छानुसार जीवन जिया । वे बेहद खुले विचारों की महिला थीं । स्वयं पर किसी की हुकूमत उन्हें बर्दाश्त न थी । 

दबंग किरदार के साथ नारी सुलभ कोमलता सदैव उनके व्यक्तित्व से जुड़ी रही, उनका पहनावा उनके शौक उनकी विवादित ज्वेलरी, साड़ियाँ और सैंडल्स ने उन्हें सुर्खियों में रखा ।

जयललिता के अंतिम संस्कार में शामिल लोगों व शीर्षस्थ नेताओं का हुजूम उनकी लोकप्रियता बता रहा था । 

उन्होंने अपना जीवन किसी फिल्म की कहानी के किरदार की तरह जिया, एक सुन्दर नायिका का राजनीति में पदार्पण एवं एकाकी जीवन लोगों में आकर्षण व कौतूहल का विषय सदैव बना रहा ।

अंत समय में वे उसी व्यक्ति के बाजू में दफनायी गयीं जिनका अंतिम संस्कार में वे लाख चाहने पर भी शामिल न हो सकीं थीं । 

जीवन पर्यन्त उन्होंने जो चाहा वह मिला, मृत्यु के पश्चात् भी वे निश्चित ही एमजीआर के निकट सुकून की नींद में सो रहीं होंगी, यही आशा है ।

बोल्ड एन्ड ब्यूटीफुल महिला जयललिता जी के निधन पर उन्हें भावभीनी श्रीद्धांजलि ।

 

(लेखिका भोपाल स्थित स्वतंत्र चिंतक, टिप्पणीकार हैं एवं सामाजिक संगठन 'साकार' की संस्थापक हैं।)

 रोली पाठक