अलविदा ! अनुपम भाई
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

कोई साढ़े चार महीने पहले मैंने इसी स्थान पर भाई अनुपम मिश्र को सलाम किया था। उनकी अदभुत कृति - आज भी खरे हैं तालाब के लिए। आज सुबह अनुपम भाई हम सबको छोड़ कर अपनी उस यात्रा पर चले गए, जहाँ से लौट कर कोई नहीं आता। उन्नीस सौ पचहत्तर के आस पास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। उस समय उनकी पर्यावरण वाली किताबें नहीं आईं थीं। उन दिनों चंबल घाटी डाकुओं के खौफ से थर्राती थी। डाकू मोहरसिंह और डाकू माधो सिंह जैसे गिरोह राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सरकारों के लिए मुसीबत बन गए थे। तब लोगों को विनोबा भावे के डाकू समर्पण अभियान की याद आई थी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण दूसरे डाकू आत्मसमर्पण अभियान के सूत्रधार बने थे। लेकिन इस की तैयारियाँ तो महीनों पहले शुरू हो गई थीं। चंबल के खुंखार डाकू गिरोहों से संपर्क करने और उन्हें हथियार डालने के लिए तीन लोगों ने परदे के पीछे बड़ी भूमिका निभाई थी। ये थे - प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण कुमार गर्ग। इन लोगों ने महीनों तक बीहड़ों की खाक़ छानी, बिना किसी सुरक्षा  के डाकू गिरोहों की मांद में पहुंचे और उन्हें समर्पण के लिए मनाया। यह समर्पण अभियान आज भी चंबल घाटी का सबसे क़ामयाब अभियान माना जाता है। इसके बाद इन तीनों ने एक किताब लिखी - चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में। यह इस अभियान का इकलौता प्रामाणिक दस्तावेज़ है। इसी के कुछ समय बाद मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। तबसे अनुपम भाई ने मुझे अपना स्नेहभाजन बना लिया। 

अनुपम भाई हमेशा खामोशी से अपना काम करते रहे। कभी प्रचार की भूख उनके अंदर नहीं जगी। सर्वोदयी और गांधीवादी अनुपम भाई के जाने से इस देश ने एक बेजोड़ चिंतक ,विचारक,लेखक और पर्यावरण विद खो दिया है। सलाम और अलविदा अनुपम भाई। 

पुनश्च; अनुपम भाई की किताब आज भी खरे हैं तालाब के बारे में मैंने पाँच अगस्त को यह नोट लिखा था। आप सब के लिए फिर प्रस्तुत है। 

किताब जो करिश्मा है

इन दिनों पढ़ने की आदत कम हो रही  है| लेकिन फिर भी कुछ रौशनदान ऐसे हैं जो आशा बंधाते हैं। अनुपम मिश्र ऐसे ही गांधीवादी हैं। गर्भनाल में नीलम कुलश्रेष्ठ का लेख पढ़ा तो आँखें भर आईं। अनुपम ने अपनी एक किताब से हिंदुस्तान में जो करिश्मा कर डाला है, वो बेमिसाल है। सोचता हूँ कि आज भारत में किसी लेखक की किसी किताब की हज़ार डेढ़ हज़ार प्रतियां बिक जातीं हैं तो वो आसमान में उड़ने लगता है। लेकिन जिस किताब को अनुपम भाई ने रचा है, वो तो अदभुत है। दस साल तक देश भर में घूमे, सारे देश के तालाबों का अध्ययन किया, उनकी बदहाली देखी, हमारी संस्कृति से उसका रिश्ता समझा और फिर उनकी कलम से निकली अनमोल कृति - आज भी खरे हैं तालाब। सन 1993 में यह किताब छप कर पाठकों के हाथों में आई। मैंने इसे 1994 में पढ़ा। एक बार। दो बार। तीन बार। न जाने कितने बार। न यह बेस्ट सेलर श्रेणी में थी, न इसमें घटिया अश्लील भाषा थी और न चटखारे लेकर लिखी गई किसी की अंतरंग कहानियाँ। यह किताब एक सुबूत है कि गंभीर सरोकारों और पर्यावरण जैसे विषय पर आप समाज की चिंताओं के साथ खड़े हों तो समाज भी आपको सर पर बिठाता है। इस किंवदंती की एक झलक। 

*अब तक गांधी शान्ति प्रतिष्ठान दो लाख से ज़्यादा प्रतियां बेच चुका है। क़रीब 18 साल तक हर साल एक लाख रूपए कमाने के बाद अब प्रतिष्ठान ने मुनाफे और कॉपीराइट से मुक्त कर दिया है क्यों कि माँग इतनी है कि आपूर्ति संभव नहीं। इसलिए पिछले पांच साल में अनगिनत प्रकाशकों ने इसे छापा है। जानकारी के मुताबिक इस तरह क़रीब दस लाख प्रतियां बिकीं हैं। 

*नेशनल बुक ट्रस्ट और अन्य आठ प्रकाशन समूहों ने इसे आठ भाषाओं में अनुवाद कर प्रकाशित किया है। 

* इस किताब का ब्रेल लिपि अनुवाद उपलब्ध है। आठ भाषाओं और ब्रेल के क़रीब 40 संस्करण बाज़ार में आ चुके हैं। 

* इक्कीस आकाशवाणी केंद्रों ने इसे पूरा प्रसारित किया है। एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं। अनेक बार। 

* उर्दू में यह एक ग्रन्थ की शक़्ल में आया। इसे संपादक शब्बीर क़ादरी ने प्रकाशित किया है। 

* निरुपमा अधिकारी ने इसे बांग्लाभाषा में अनुवाद किया। बांगला में तो लोग इस पर टूट पड़े। 

* सुहासिनी मुले ने इस किताब पर एक फिल्म नेचर टुडे बनाई। क़रीब एक दर्ज़न डाक्यूमेंट्री इस पर बन चुकीं हैं। 

* दिल्ली विश्वविद्यालय ने अच्छी हिंदी के पाठ्यक्रम में इस किताब के अंश प्रकाशित किए हैं।  

* मध्यप्रदेश सरकार ने इस किताब की 25 हज़ार किताबों का ऑर्डर किया। गांधी शान्ति प्रतिष्ठान इतनी संख्या में जब नहीं दे पाया तो सरकार ने अपने प्रेस में छपा कर किताबें गांव गांव बंटवाई। 

* भारत ज्ञान विज्ञान परिषद् ने भी यही किया। इसकी 25 हज़ार प्रतियां खुद छपवाईं। 

* जिसे हम सक्सेस स्टोरी कहते हैं - इस किताब के आगे सारी सक्सेस स्टोरीज़ दम तोड़ जाती हैं। गुजरात, राजस्थान,मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक और न जाने कितने राज्यों के हज़ारों गाँवों में किताब से प्रेरणा लेकर अनगिनत तालाब और छोटी छोटी नदियाँ ज़िंदा की गईं। गुजरात में सैकड़ों गाँवों में अनुपम भाई की मौजूदगी में ये काम हुए। जब ढोल धमाकों के साथ अनुपम भाई का स्वागत होता तो बेचारे अनुपम भाई सकुचाते एक कौने में बैठ जाते। चिपको आंदोलन और राजेन्द्र सिंह के जल आंदोलन के वो स्तंभ रहे हैं। 

* आज जब हर किताब में कॉपी राइट एक्ट के तहत सर्वाधिकार सुरक्षित मुद्रित होता है तो अनुपम भाई कहते हैं - इसका कोई कॉपी राइट नहीं है। इसका कोई भी इस्तेमाल कर सकता है। स्रोत दें तो अच्छा लगेगा। बताइए आप क्या गांधी या बिनोबा भावे का कोई 2016 का संस्करण नहीं देख रहे हैं। अनुपम हमारे असली भारत रत्न हैं। 

सलाम ! अनुपम भाई

 

 

राजेश बादल