समाजवादी गठबंधन और मुसलमान
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

डॉक्टर मुजफ्फर हुसैन गजाली


मुस्लिम मतदाता जो समाजवादी पार्टी का मजबूत वोट बैंक माना जाता है वह मुजफ्फरनगर औरदूसरे सांप्रदायिक दंगों की वजह से बुरी तरह नाराज था। इसका फायदा बहुजन समाज पार्टी को मिलने की उम्मीद थी। मायावती अपनी सभाओं में दंगे और कमजोर कानून प्रशासन पर सपा सरकार को घेर रही थीं। उनका कहना था कि बसपा सरकार के रहते यूपी में कोई दंगा नहीं हुआ। वह राज्य को जंगलराज से मुक्ति दिलाएं जाएगा। मायावती की नज़र मुस्लिम वोटों पर है। लेकिन मुसलमानों को लेकर उनका रवैया भी अच्छा नहीं रहा है। सबसे ज्यादा मुस्लिम लड़के आतंकवाद के आरोप में उनके शासनकाल में गिरफ्तार हुए। दूसरी ओर भाजपा अपनी परिवर्तनरैलियों में सपा और बसपा दोनों को निशाना बना रही थी। खुद नरेंद्र मोदी रैलियों में कह चुके हैं कि बुआऔर भतीजे ने मिलकर यूपी को बर्बाद किया है। चौदह साल से भाजपा बनवास पर नहीं बल्कि यूपी का विकास बनवासपर है।
ऐसी स्थिति में यह आवश्यक था कि समाजवादी पार्टी कुछ ऐसा करे जिससे स्थिति इसके पक्ष में निर्माता सहायक हों या चुनाव में सत्‍तविरोधी लहरकाकम से कम नुकसान हो। चाचा भतीजे के बीच झगड़े को इसके लिए उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया। मुलायम सिंह ने इस नौटंकी में अहम भूमिका निभाई। झगड़े को लम्बा खींच कर उसे पार्टी से लेकर परिवार तककी समस्या बना दिया। इसके नतीजे में जनता का ध्यान सरकार की कमियों से हटकर पारिवारिक विवाद पर केंद्रित हो गया। जो कार्यकर्ता पार्टी से दूर हुए थे वह अखिलेश के आसपास एकत्र हुए। उन्हें अखिलेश यादव के साथ रहने में अपना भविष्य दिखने लगा। आम लोगों में अखिलेश को लेकर सहानुभूति पैदा हो गई। मुलायम सिंह ने इसका फायदा उठाकर अखिलेश के रास्ते में रोड़ा बनने वालों को किनारे कर दिया और पूरी पार्टीको अखिलेश यादव के हवाले कर दिया।साइकिल का निशान उन्हें देकर चुनाव आयोग ने इस पर मुहर लगा दी । इसके साथ मुलायम सिंह ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसने की चिंता से मुक्ति पा ली। इसी के डर से वह केंद्र सरकारों का चाहे न चाहे साथ देते रहे हैं। जानकार इस पूरी प्रक्रिया को सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण मानते हैं।

इस पारिवारिकझगड़े के द्वारा यह दिखाने की कोशिश कीगई कि वह गुंडों, भ्रष्टाचारियों और माफियाओं को पसंद नहीं करते। उनसे दूरी बना कर रखना चाहते हैं। पिता और चाचा से इसी बात को लेकर उनका असली झगड़ा है। लेकिन अखिलेश यादव ने उम्मीदवारों की सूची जारी करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा। उनकी सूची में कई ऐसे नाम शामिल हैं जिनका अच्छा खासा आपराधिक रिकॉर्ड है।दरअसल इस परिवार संघर्ष के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। भ्रष्टाचारियों,गुण्डों, बाहुबलियों, माफियाओं को बढ़ावा देने, खराब कानून प्रशासन, भूमि माफियाओं को फायदा पहुंचाने, गैरकानूनी कब्जों, भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के तत्वावधान दंगों और सांप्रदायिकता पर लगाम न लगाने से आम लोगों में नाराज़गीथी।इससंघर्ष के जरिए अखिलेश यादव युवा, शिक्षित, आधुनिक दुनिया से परिचित, मजबूत इरादों वाले विकास पुरुषनेता के रूप में उभरे हैं। शायद इस कहानी काकलाईमैक्स अखिलेश यादव को युवा नेता के रूप में प्रॉजेक्टकरना ही था। ताकि वह यूपी के युवाओं के आइकन बन सकें और आने वाला विधानसभा चुनाव जाति, समुदाय, धर्म और सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर मोबाइल, लैपटॉप, प्रौद्योगिकी, रोजगार, किशोरों की जरूरतों और उनकी समस्याओं के आसपास लड़ा जाए।

शुरू से ही अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते हैं। उनके रणनीतिकारों का मानना है कि गठबंधन में चुनाव लड़ने से समाजवादी पार्टी काप्रदर्शनअच्छारहेगा। इस गठबंधन में कांग्रेस के अलावा रालोद, जदयू और राजद को जोड़ने की कोशिश हो रही थी। यह माना जा रहा था कि इस कदम से मुस्लिम वोटों का बंटवारा होने से रोका जा सकता है। दूसरे नीतीश कुमार के साथ आने से कुर्मी वोट गठबंधन को मिल जाएंगे। अखिलेश यादव, राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और जयंत चौधरी की ऐसी टीम होगी जिसके द्वारा राज्य के युवा खींचे चले आएंगे। गठबंधनसे पहले ही डिंपल यादव और प्रियंका गांधी की तस्वीरों के साथ पोस्टर और होर्डिंग भी दिखाई दिए। रालोद को 20 से 25 सीटें दी जानी थीं। जदयू के बिहार से लगी 37 सीटों पर दावेदारी की संभावना थी। सपा कांग्रेसकागठबंधनहोगया जबकि मुलायम सिंह किसी भी तरह के गठबंधन के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने 325 उम्मीदवारों की सूची जारी करने के समय गठबंधन से इनकार किया था। 
यूपी के चुनाव को 2019 के चुनाव की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। इस चुनाव से मोदी के नोटबंदी करने के फैसले पर भी मुहर लगेगी।करंसी विलोपन सेसबसे ज्यादा तकलीफ गरीबों, मजदूरों, दिहाड़ी पर काम करने, रिक्शा, हाथ से काम करने वालों और किसानों को हुई है। खेती किसानी से जुड़े काम में ठाकुर, जाट और यादों की संख्या अधिक है। जाट आरक्षण के मुद्दे पर पहले से ही भाजपा से नाराज हैं। 2014 में भाजपा को 43 प्रतिशत वोट मिले थे। उस समय मोदी ने खुद को यूपी का नेता बताया था। मुजफ्फरनगर की घटना से अन्य वर्गोंके साथ ठाकुर, जाट यादव और दलित वोट भी भाजपा को मिला था। इस समय न तो कोई सांप्रदायिक माहौल है और न ही भाजपा के पास कोई चेहरा। जबकि राम मंदिर सहित कई मामले उठाकर भाजपा ने माहौल गरमाने की पूरी कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। रही सही कसर नोटबंद करने और अब आरएसएस के आरक्षण विरोधी बयान ने पूरी कर दी है। इसका फायदा सीधे तौर पर मायावती को मिलेगा।

आमतौर पर माना जाता है कि दलित वोट मायावती के साथ है। पिछले कई चुनावके नतीजों को देखें तो मायावती का दलित वोट बैंक चुनाव दर चुनाव सिकुड़ते जा रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में एससी के लिए आरक्षित 17 सीटों में से बसपा को केवल पांच सीटें मिली थीं। 2009 में बसपा को कुल 20 सीटें हासिल हुई थीं लेकिन एस सी सीटों का ग्राफ काफी खराब रहा था। 2014 में 20 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद उसे एक भी सीट नहीं मिली। 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे 25.9 प्रतिशत और सपा को 29.13 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन बसपा 85 आरक्षित सीटों में से केवल 15 सीटें ही जीत सकी थी जबकि सपा ने इनमें से 58 सीटें जीत ली थीं। वहीं 2009 के चुनाव में बसपा को इन में से 47 सीटें हासिल हुई थीं। कई सीटों पर बसपा उम्मीदवारों के हार का अंतर पांच हजार वोटों से भी कम रहा था। जाहिर है कि बसपा की इस सफलता में केवल दलित वोटों का हाथ नहीं था। मौजूदा चुनाव में उसे दूसरी जातियों के वोटों की जरूरत है। बसपा को जीत के लिए 60 -70 प्रतिशत मुस्लिम दलित वोटों की जरूरत है।

भाजपा के अलावा बाकी सभी पार्टियां मुसलमानों को विशेष रूप से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से उम्मीदवार बना रही हैं यही कारण है कि मौजूदा चुनाव बहुत कुछ मुस्लिम वोटों परनिर्भर है। अगर वह स्ट्रैट्जिकमतदान करते हैं यानी जहां जिस पार्टी का उम्मीदवार जीतने की स्थिति में है उसे जिताया जाए तो यूपी में किसी एक पार्टी को बहुमत मिलने की उम्मीद कम है। वोट कटवा दलों के झांसे में आकर मुसलमानों ने अपना वोट बर्बाद किया तो भाजपा को बेहतर करने से कोई नहीं रोक पाएगा। मुलायम सिंह तो हमेशा भाजपा और संघ के लिए मुलायम रहे हैं। गठबंधन में बाधा के पीछे भी यही उद्देश्य रहाहोगाताकि भाजपा अंत समय तक प्रतिस्पर्धा में बनी रहे। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह कहा करते थे कि बिहार देश का दिमाग है और यूपी दिल। दिमाग ने तो भाजपा को ठुकरा कर अपनी समझदारी दिखा दी। अब दिल की बारी है कि वह किसे पसंदकरता है और किसे अपने से दूर । मुसलमानों को अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए तैयारी करके इस चुनाव में आना चाहिए था लेकिन वह समय गंवा दिया अब देखना यह है कि क्या इस चुनाव में वह कोई रास्ता निकालेंगे या भावनाओं में बह कर अपने वोट यूं ही बर्बाद कर देंगे।