औरतों का हक़ और हमारा समाज: डाक्टर मुज़फ़्फ़र हुसैन ग़ज़ाली
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ई-मॅगज़ीन/E-Magazine

यौम ख़वातीन के मौक़ा पर औरतों की आज़ादी और उनको बाइख़तियार बनाए जाने कीख़ातिर आवाज़ें ज़ोर शोर से उठती हैं फिर साल भर ख़ामोशी तावक़तीके कोई मसला दरपेशना आजाए। भारत में देवियों की पूजा की जाती और नद्दियों को माँ कहा जाता है लेकिन सबसे ज़्यादा मर्दों के ज़ुलम का शिकार यही देवियाँ यानी औरतें होती हैं। कभी जहेज़ की बलि चढ़ाई जाती हैं तो कभी रस्मोरिवाज के नाम पर खाप पंचायतों के तशद्दुद का शिकार बन जाती हैं। हद तो ये है कि झगड़ा मर्द करते हैं लेकिन गालियां औरतों को दी जाती हैं।एक अगर उस की माँ को सीधा कर रहा होता है तो दूसरा बहन को अपनी गंदी ज़बान से निशाना बना रहा होता है और दोनों में से किसी को श्रम नहीं आती।

औरतों और लड़कीयों के साथ तशद्दुद का सिलसिला यहीं ख़त्म नहीं होता। उन्हें अपने वालदैन के यहां भी भेद-भाव का शिकार होना पड़ता है। पहले तो बेटी को पैदा ही नहीं होने दियाजाता ।इस की पैदाइश को नापसंदीदगी का सबब माना जाता है। बेटी पैदा करने वाली माँ को उप शुगनी या मनहूस कहा जाता है। फिर खान पान, देख-भाल और तालीम वित्र बैतमें लड़कीयों के मुक़ाबले लड़कों पर ज़्यादा तवज्जा दी जाती है। देही इलाक़ों या छोटे शहरों के कई ख़ानदानों में उमूमन मर्दों के बाद औरतों को खाना मिलता है। इस तरह लड़कों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया जाता है।WHO की रिपोर्ट के मुताबिक़ लड़कों के मुक़ाबले लड़कीयां ख़ून की कमी की शिकार ज़्यादा होती हैं। भारत एक पुरुष प्रधान यानी मर्दों के तसल्लुतवाला मुलक है।इक्कसवीं सदी में बहुत कुछ बदलने के बावजूद औरतों-ओ-लड़कीयों सेमुताल्लिक़ सोच में मज़ीद बदलाओ होना अभी बाक़ी है। लड़कीयां वालदैन की जायदाद में ना हिस्सा मांग सकती हैं, ना ही ऐसा चलन है। हिंदूमज़हब के पास कोई ऐसी किताब नहीं है जिसमें औरतों के हुक़ूक़ की वज़ाहत की गई हो। मनवा स्म्रती तो औरतों को सिर्फ ख़िदमत-गार के तौर पर देखती है। इस में शोधर, पशवावर नारी को प्रतारण(तशद्दुद) का अधीकारी(हक़दार) बताया गया है ।इस बुनियाद पर बने समाज में ख़वातीन को बराबर का हिस्सा कैसे मिल सकता है?।

भारत के आईन की दफ़ा14,21में ये वज़ाहत की गई है कि मलिक के किसी भी शहरी के साथ सिनफ़(मर्द या औरत), ज़बान, ज़ात, रंग और इलाक़े की बुनियाद पर कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। सरकार ने लोकल बॉडीज़ पंचायतों में ख़वातीन की हिस्सादारी को यक़ीनीबनाने के लिए नशिस्तें मख़सूस की हैं लेकिन असैंबली वपारलीमनट में उन के लिए सीटेंमख़सूस नहीं हैं। कोई भी सयासी पार्टी नहीं चाहती कि मलिक की आधी आबादी को क़ानूनसाज़ इदारों में उनकी आबादी के लिहाज़ से नुमाइंदगी मिले। मलिक की ख़वातीन को जब भी जहां भी मौक़ा मिला, उन्होंने ये साबित किया है कि वो किसी भी तरह मर्दों से कम नहीं हैं। इंदिरा गांधी, ममता बनर्जी, मायावती या फिर जय ललिता। उन्होंने तकलीफ़ें उठाकर धारा के ख़िलाफ़ अकेले तीर कर दिखाया। ममता, मायावती और जय ललिता को मिल रहीमुस्तक़िल कामयाबी के पीछे उनकी अपनी हिम्मत, मेहनत और सूझ-बूझ का दख़ल है। इसी तरह हर मैदान में औरतों ने अपना सिक्का जमाया है।

मुल्क में लड़कीयों की घुटती तादाद तशवीशनाक मसला है। मर्कज़ी सरकार ने इस की संगीनीको महसूस करते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ स्कीम शुरू की है। इस मसले से निमटने के लिए अलग अलग रियास्तें अलग अलग प्रोग्राम चला रही हैं।बिहार सरकार ने साईकलेंतक़सीम करते हुए स्कूलों में लड़कीयों की हाज़िरी बढ़ाई तो छतें गढ़ सरकार ने लड़कीयों के लिए हॉस्टल की सहूलत फ़राहम की । साथ ही अच्छे नंबर लाने वाली लड़कीयों की आला तालीम का ख़र्च बर्दाश्त करने काभी रियास्ती हुकूमत ने फ़ैसला लिया। बच्चीयों में ग़िजाईयतवख़ोन की कमी को दूर करने की कोशिशें भी जारी हैं। यूपी,उत्तराखंड, मग़रिबी बंगाल, झारखंड,आसाम और मध्य प्रदेश में भी लड़कीयों को बेहतर ज़िंदगी गुज़ारने का मौक़ा देने के लिए संजीदगी दिखाई दे रही है।

इस्लाम में लड़कीयों वावतों के हुक़ूक़ को तफ़सील के साथ बयान किया गया है। उसने रिश्तों के लिहाज़ से ताल्लुक़ात की हदें मुतय्यन हैं। इस्लाम ने ऐसे समाज को तबदील करके रख दिया जहां लड़कीयों को ज़िंदा दफ़न कर दियाजाता था। इस्लाम ने लड़की की पैदाइश को अल्लाह की रहमत बताया। पैग़ंबर इस्लाम ने लड़की के वालदैन को जन्नत की बशारत दी और फ़रमाया जिसने बेटी को पढ़ाया लिखाया उस की अच्छी तर्बीयत की और लड़की केबालिग़ होने पर इस की शादी कर दी, वो जन्नत में दाख़िल होगा। माँ के क़दमों तले जन्नत होने की बात भी कही गई है। ये भी कहा गया है कि वो बदनसीब है जिसने अपने माँ बाप को पाया, उनमें से किसी को बुजु़र्गी की हालत में पाया और उन की ख़िदमत करके जन्नत हासिल ना की। क़ुरआन में मुस्लिम मर्द और औरतों पर तालीम हासिल करने को यकसाँ तौर पर फ़र्ज़ क़रार दिया गया है। क़ुरआन में शादी ब्याह के उसूल, मीरास में हिस्सा, बच्चों के हुक़ूक़, लड़कीयों के हुक़ूक़, अलैहदगी के तरीक़े वग़ैरा की मुकम्मल वज़ाहत मौजूद है। बीवी पर शौहर के फ़र्ज़ और शौहर पर बीवी बच्चों की ज़िम्मेदारीयों को बताया गया है।

मुस्लमान भारत में इस्लामी तालीमात पर कम यहां की रस्मोरिवाज और रिवायतों से ज़्यादामुतास्सिर हैं। इस लिए कम ही लोग अपनी बेटीयों को अपनी जायदाद में हिस्सा देते हैं। इसी तरह शादी वतलाक़ के मुआमले में भी अपनी मन-मानी करते हैं। इस वक़्त तलाक़ का मसला मीडीया की सुर्ख़ीयों में छाया हुआ है। उसे मुस्लिम औरतों की आज़ादी से जोड़ कर पेश किया जा रहा है। तलाक़ अल्लाह के रसूल की नज़र में सबसे नापसंदीदा अमल है लेकिन समाजी ज़रूरत के तहत इसे जारी रखा गया। जिस समाज में शौहर बीवी के दरमयान निबाह ना होने की सूरत में अलैहदगी का तरीक़ा मौजूद नहीं है, वहां औरतों से छुटकारा पाने के लिए उन्हें मार देने के वाक़ियात आम हैं। शरीयत का क़ानून जो देश की अदालतों में राइजहै, वो 1925,1927में बिना था और अंग्रेज़ों ने लागू किया था आज के लिहाज़ से इस में ज़रूरी तबदीलीयां होनी चाहिऐं। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के क़ियाम का मक़सद इस तरह के मसअलों पर ध्यान देना था लेकिन इस के ज़िम्मा दारान सयासी मक़ासिद को साधने और अपनी जायदादों को बचाने में लगे रहे। अगर उन्होंने मलिक को लड़कीयों वाइ रुतों सेमुताल्लिक़ इस्लामी क़वानीन से वाक़िफ़ किराया होता तो आज अह्ले वतन के बहुत से लोग उस की हिमायत में खड़े होते।

औरतों की आज़ादी का मतलब इस्लाम में फ़ुहश पुन या उर्यानियत नहीं। इस्लाम पूरीआज़ादी देता है लेकिन हदूद में रह कर। ऐसा नहीं है कि मर्द तो पूरे कपड़े पहनें औरआज़ादी के नाम पर औरतों को नंगा किया जाये या कम कपड़ों में रखा जाये। औरतें मर्दों केशाना बशाना काम करें लेकिन अपनी पहचान और तशख़्ख़ुस के साथ। औरत को देवी बनाकर पूजना आसान है लेकिन उसे इज़्ज़त और भागीदारी देना बहुत मुश्किल है।जबकि औरतें यही चाहती हैं कि उन्हें मर्दों के बराबर इज़्ज़त मिले। उन्हें अपनी बात कहने का हक़ हो और उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मर्द उन पर अपनी राय ना थोपें। बल्कि उन्हें उनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ आगे बढ़ने का मौक़ा मिले क्यों कि वो भी एक इन्सान हैं, उनका भी समाज पर इतना ही हक़ है जितना एक मर्द का