आखिर हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं
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सत्येंद्र प्रताप सिंह, 'भारत माता की जय' बोलने को लेकर छिड़ी बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सरसंघचालक मोहन भागवत ने साफ कहा है कि इस नारे को किसी पर थोपने की जरूरत नहीं है।बल्कि हमें अपने आदर्शों से ऐसे भारत का निर्माण करना होगा कि लोग खुद ही 'भारत माता की जय' बोलने लगें।लखनऊ में किसान संघ के नवनिर्मित भवन के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने कहा कि "संघ का काम किसी को जीतना या उस पर अपना विचार थोपना नहीं है।हमें अपने आदर्शों व आचरण से ऐसा काम करना है कि लोग खुद ही हमारे रास्ते पर आ जाएं।यह काम कथनी-करनी में अंतर खत्म करके ही किया जा सकता है।यह फर्क खत्म न हुआ तो कोई भी हमारी बात नहीं मानेगा।" एक दिन पहले श्री भागवत ने कोलकाता में भी कहा था कि "हमें अपनी जिंदगी में ही भारत को जीना होगा।" श्री भागवत का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ दिन पहले ही ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि "कोई मेरे गर्दन पर छुरा रख देगा तो भी 'भारत माता की जय' नहीं बोलूंगा।हमारा संविधान भी कहीं नहीं कहता की 'भारत माता की जय' बोलना जरूरी है।"

      ओवैसी की एक अपनी सियासी चाल है।उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2017 के मद्देनजर सियासी सरगर्मियां बढ़ने के बीच एआईएमआईएम के अध्यक्ष असद्दुद्दीन ओवैसी ने सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को एक ही सिक्के के दो पहलू करार देते हुए कहा कि "राज्य में संघ के मुखिया को बैठक करने की आजादी है, जबकि खुद उनके ऐसा करने पर पाबंदी लगाई जा रही है।संघ प्रमुख मोहन भागवत को छूट है लेकिन हम पर पाबंदी लगाई जा रही है।दरअसल सपा सरकार हमसे डरी हुई है।" गौरतलब है कि ओवैसी को लखनऊ में एक रैली को भी संबोधित करना था लेकिन कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए जिला प्रशासन ने इसकी अनुमति देने से इंकार कर दिया था, जिसके बाद ओवैसी ने अपना पूरा दौरा ही रद्द कर दिया था।वहीँ 'भारत माता की जय' बोलने पर हाल में अपनी टिप्पणी को लेकर आलोचना का निशाना बने ओवैसी ने कहा कि "उन्हें किसी से देशभक्ति के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।मुसलमानों ने देश के लिये बड़ी कुरबानी दी है और सिर्फ एक जयकारे के लिये उनकी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।"

         हिन्दू आखिर है क्या ? सबसे बड़ा सवाल यह है।भारतीय संविधान और कानूनों की रोशनी में 'हिंदू' शब्द के आशय और परिभाषा के बारे में केंद्र सरकार सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं करा सकी है।मध्य प्रदेश के नीमच के रहने वाले सोशल वर्कर चंद्रशेखर गौर ने बताया कि उन्होंने आरटीआई के तहत अर्जी दायर कर पूछा था कि भारतीय संविधान और कानूनों के अनुसार 'हिंदू' शब्द का मतलब और परिभाषा क्या है।उन्होंने कहा, 'मेरी आरटीआई अर्जी पर भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से भेजे गए जवाब में कहा गया कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) के पास अपेक्षित सूचना उपलब्ध नहीं है।' गौर ने अपने आरटीआई आवेदन में सरकार से यह भी जानना चाहा था कि देश में किन आधारों पर किसी समुदाय को हिंदू माना जाता है और हिंदुओं को बहुसंख्यकों की तरह देखा जाता है।लेकिन इन सवालों पर यही जवाब दोहरा दिया गया कि अपेक्षित सूचना सीपीआईओ के पास उपलब्ध नहीं है।गौर ने कहा, 'मेरी आरटीआई अर्जी पर सरकार का जवाब हैरान करने वाला है।अगर सरकार को यह पता ही नहीं है कि हिंदू शब्द का आशय और परिभाषा क्या है, तो हिंदू विवाह अधिनियम सरीखे कानून आखिर किस आधार पर बना दिए गए।' गौर ने कहा, 'सरकार को यह भी बताना चाहिए कि वह अलग-अलग शासकीय फॉर्म भरवाते वक्त नागरिकों से उनकी मजहबी पहचान क्यों पूछती है और जनसंख्या के आंकड़े धार्मिक आधार पर क्यों जारी किए जाते हैं।' मशहूर विचारक के एन गोविंदाचार्य ने 'हिंदू' शब्द को लेकर दायर आरटीआई अर्जी पर सरकारी जवाब के बारे में पूछे जाने पर कहा कि  "हिंदुस्तान में सरकार की अवधारणा वर्ष 1935 के भारत शासन अधिनियम के जरिए सामने आई, जबकि हिंदुत्व का विषय हजारों साल पुराना है। हिंदुत्व सरीखे दर्शन को समझने के लिए सरकारों को और कवायद करनी चाहिए।" भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि "भारतीय समाज केवल राजसत्ता से संचालित नहीं होता है।यह समाज राजसत्ता के साथ धर्मसत्ता, समाजसत्ता और अल्पसत्ता से भी चलता है। राजसत्ता को इस बात से वाकिफ होने की जरूरत है।"

      हिन्दू पर अनोखा फैसला का भी दृष्टान्त है।यदि कोई हिन्दू व्यक्ति पहले अनुसूचित जाति (एससी) में था तो वह पुनर्धर्मांतरण के बाद उसी जाति में रहेगा और उसे पूरी सुविधा दी जायेगी।यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया।कोर्ट ने इस मामले में कहा कि अगर व्यक्ति दोबारा धर्म परिवर्तन करके फिर से हिंदू बनता है तो वह अपना एससी का दर्जा बरकरार रख सकता है, इतना ही नहीं उसे उस जाति की सारी सुविधायें दी जायेंगी।जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस वी.गोपाल गौड़ा की खंडपीठ ने केरल निवासी याचिकाकर्ता के पी मनु के संबंध में कहा कि एक दलित जिसके माता-पिता या दादा-दादी ईसाई धर्म अपना चुके हैं वह वापस हिंदू धर्म अपनाने पर अपना एससी का दर्जा कायम रख सकता है।अगर उसके समुदाय ने उसे जाति से बाहर किया होता तो बात अलग हो सकती थी।इसलिए वापस हिंदू धर्म स्वीकार करने के बाद उसकी जाति बहाल हो सकती है।अदालत ने कहा कि जाति का लाभ लेने का दावा करने वाले व्यक्ति के पुनर्धर्मांतरण के बाद जारी सर्टीफिकेट में तीन बातों का उल्लेख होना चाहिए। गौरतलब है कि इन दिनों धर्मांतरण का मुद्दा भी गरमाया हुआ है।कुछ हिंदू संगठन अन्य धर्म के लोगों का पुर्नधर्मांतरण करा रहे हैं।इनका कहना है कि इनके पूर्वज पहले हिंदू धर्म के थे और ये अपने धर्म में वापसी कर रहे हैं।

         बहरहाल, बांग्लादेश यदि इस्लामिक राष्ट्र बन सकता है तो भारत हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं बन सकता? बांग्लादेश हाइकोर्ट ने 28 मार्च को फैसला सुनाया की बांग्लादेश इस्लामिक राष्ट्र ही रहेगा,राष्ट्रधर्म इस्लाम ही रहेगा।हालांकि बांग्लादेश संविधान के अंतर्गत अन्य धर्मो पर तय नीति भी बहाल रहेगी।गौरतलब है की 1988 में तत्कालीन राष्ट्रपति एच एम इरशाद ने इस्लाम को राष्ट्रधर्म घोषित करने व इस्लामिक राष्ट्र के लिए बांग्लादेश संविधान का आठवां संशोधन लाये थे जो पारित हुआ था।उसी वक़्त बांग्लादेश के 15 विशिष्ट व्यक्तियों ने इसे कोर्ट में चैलेंज किया था।इसमें कवि सूफिया कमाल, शिक्षक कबीर चौधरी, अनिसुजमान, भाषा ज्ञानी बदरुद्दीन उमर व पूर्व जस्टिस कमालुद्दीन होसैन शामिल थे।इन 15 में से 10 का निधन हो गया है।बांग्लादेश हाइकोर्ट में 29 वर्ष बाद सुनवाई हुई व कुछ एक मिनट में ही तीन सदस्यीय बेंच ने यह फैसला सुना दिया।दूसरी तरफ भारत के संदर्भ में गोविंदाचार्य के इस विचार पर गंभीर विचार करने की जरूरत है कि "भारतीय समाज केवल राजसत्ता से संचालित नहीं होता है।यह समाज राजसत्ता के साथ धर्मसत्ता, समाजसत्ता और अल्पसत्ता से भी चलता है।राजसत्ता को इस बात से वाकिफ होने की जरूरत है।"

 

 

 

 

 

 

सत्येंद्र प्रताप सिंह,