समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 2जुलाई। कहते है आयुर्वेद में हर मर्ज का ईलाज है और सबसे बड़ी बात इसमें बीमारी को जड़ से खत्म करने की क्षमता है। ये जड़ी- बूटियां हमें बीना किसी के साइड इफेक्ट के ठीक करती है। ऐसी ही एक जड़ी बूटी है थाइम पुदीना..इसके अनेकों फायदे है।
थाइम पुदीना परिवार से संबंधित एक सुगंधित जड़ी बूटी है जिसका खाना बनाने के अलावा कई चीजों में इस्तेमाल होता है। यह सेहत के लिए कई तरीके से फायदेमंद है। थाइम के अंदर मौजूद थाइमोल एक प्रमुख घटक है। इसके अलावा इसमें कई बायोएक्टिव यौगिक जैसे पी-साइमीन, मायसीन, बोर्नियोल और लिनालूल भी होते हैं। यही वजह है कि यह जड़ी बूटी एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुणों का खजाना है। इसके इस्तेमाल से आपको इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में भी मदद मिल सकती है।
थाइम में अनेक प्रकार के विटामिन्स एवं खनिज पाए जाते हैं, जो कई तरह के शारीरिक रोगों को ठीक करने में सक्षम होते हैं। थाइम में प्रमुख्य रूप से प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट, विटामिन ए, पोटैशियम, मैग्नीशियम, सोडियम, कैल्शियम, आयरन, विटामिन सी, विटामिन बी6, कैलोरी, एंटीऑक्सीडेंट एवं एंटीफंगल तत्व प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।
पारंपरिक विज्ञान के अनुसार, थाइम प्रतिरक्षा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में सहायक है। इसमें संक्रमण से लड़ने और श्वसन विषाक्त पदार्थों को साफ करने की क्षमता होती है। यह संक्रमण से लड़कर आपके शरीर को स्वस्थ रखता है। थाइम विटामिन सी और विटामिन ए का भी भंडार है, जो न केवल आपको ठीक करने में मदद करता है, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देता है। यदि नियमित रूप से इसे लिया जाए, तो यह शरीर को कॉपर, फाइबर, आयरन और कई अन्य ट्रेस खनिजों को बाहर निकालकर लाभान्वित करता है जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली के स्थिर कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए अच्छे हैं।
इतना ही नही थाइम धमनियों को अवरुद्ध करने के लिए जिम्मेदार कोलेस्ट्रॉल को कम करके रक्तचाप के स्तर को कम करने के लिए जाना जाता है। यह हृदय की दीवारों, वाहिकाओं और धमनियों को सुरक्षित रखते हुए आपकी हृदय गति को कंट्रोल रखता है।
थाइम के जीवाणुरोधी गुण के कारण, यह स्टैफिलोकोकस, एंटरोकोकस, एस्चेरिचिया और स्यूडोमोनास बैक्टीरिया पर प्रभावी पाया जाता है जो मनुष्यों में गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बनते हैं।
अस्थमा रोग से आप सभी परिचित होंगे क्यूंकि अस्थमा रोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह बीमारी अधिकतर 30 से 60 वर्ष की उम्र के व्यक्तियों में देखने को मिलती है। बता दें कि अस्थमा को दमा भी कहते हैं एवं यह श्वशन तंत्र से सबंधित बीमारी है इसलिए शरीर को इस बीमारी से सुरक्षित रखना जरुरी है। इस रोग में मरीज की श्वास नलियों में सूजन आ जाती है एवं चिपचिपा बलगम इकट्ठा होने लगता है व नलियों की पेशयां कड़क अथवा सख्त हो जाती हैं। इसी कारण अस्थमा रोगी को सांस लेने में दिक्कत होती है। यह अस्थमा रोग में का एक अचुक उपाय है।