मोरबी हादसे पर हाई कोर्ट ने अफसरों को जमकर लगाई फटकार, कहा- ज्यादा स्मार्ट मत बनिए….

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समग्र समाचार सेवा
मोरबी, 16नवंबर। गुजरात हाई कोर्ट ने मंगलवार को मोरबी पुल त्रासदी मामले में राज्य सरकार से पूछा कि किस आधार पर पुल के रखरखाव का टेंडर नहीं काला गया। बिना निविनिदा निकाले ही किसी व्यक्ति विशेष पर कृपा क्यों की गई? अधिकारियों ने इधर-उधर की बातें कीं तो हाई कोर्ट ने कहा कि ज्यादा स्मार्ट मत बनिए, जो पूछा जाए उसका सीधा जवाब दीजिए। इस तरह से हाई कोर्ट ने अफसरों से सवाल पर सवाल दागे और उन्हें जमकर फटकार लगाई। गुजरात के मोरबी जिले में मच्छु नदी पर बना ब्रिटिश काल का पुल 30 अक्टूबर को ढह गया था और हादसे में महिलाओं, बच्चों सहित 135 लोगों की जान चली गई थी। स्वत: संज्ञान लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने जानना चाहा कि क्या राज्य सरकार ने अजंता मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड (ओरेवा समूह) के साथ वर्ष 2008 के समझौता ज्ञापन (एमओयू) और वर्ष 2022 के समझौते में फिटनेस प्रमाणपत्र के संबंध में किसी तरह की शर्त लगाई थी। यदि ऐसा था तो इसे करने के लिए अथॉरिटी कौन थी?

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चीफ जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस आशुतोष शास्त्री ने कहा, यह समझौता सवा पन्ने का है, जिसमें कोई शर्त नहीं है। यह समझौता एक सहमति के रूप में है। राज्य सरकार की यह उदारता 10 साल के लिए है। कोई निविदा नहीं निकाली गई, किसी तरह की रुचि की अभिव्यक्ति नहीं है।

अवधि बीतने के बाद भी समझौता जारी रखा
अदालत ने कहा कि 15 जून, 2017 को अवधि बीतने के बावजूद अजंता (ओरेवा समूह) को पुल के रखरखाव और प्रबंधन का काम बिना किसी समझौते के जारी रखने के लिए कहा गया। कंपनी के साथ वर्ष 2008 में एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसकी अवधि वर्ष 2017 में समाप्त हुई।

हाई कोर्ट ने दागे सवाल पर सवाल
हाई कोर्ट ने जानना चाहा कि क्या यह अवधि समाप्त होने के बाद संचालन और रखरखाव के उद्देश्य से टेंडर निकालने के लिए स्थानीय अधिकारियों ने कोई कदम उठाए? बता दें कि पुल हादसे के बाद पुलिस ने 31 अक्टूबर को ओरेवा समूह से जुड़े चार व्यक्तियों सहित नौ लोगों को गिरफ्तार किया था। पुल के संचालन और रखरखाव का जिम्मा संभाल रहीं कंपनियों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है।

अधिकारियों को पक्षकार बनाने के आदेश
हाई कोर्ट ने 7 नवंबर को कहा था कि इसने एक खबर के आधार पर पुल हादसा मामले में स्वत: संज्ञान लिया था और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया था। अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि गुजरात सरकार (जिसका प्रतिनिधित्व मुख्य सचिव करते हैं), राज्य के गृह विभाग, नगर पालिका आयुक्त, मोरबी नगरपालिका, जिला कलेक्टर और राज्य मानवाधिकार आयोग को पक्षकार बनाया जाए।

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