बाहरी बनाम बंगाली नैरेटिव पर नजर… समझिए क्यों ममता बनर्जी ने अचानक ‘वोटर युद्ध’ छेड़ दिया है

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,4 मार्च।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हमेशा से पहचान, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर बहस छिड़ी रही है। लेकिन इस बार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले ‘बाहरी बनाम बंगाली’ का नैरेटिव तेज कर दिया है। यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही उन्होंने इसे फिर से हवा दी है। सवाल यह है कि ममता बनर्जी ने अचानक यह ‘वोटर युद्ध’ क्यों छेड़ दिया है? और इसका राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है? आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।

‘बाहरी’ कौन और ‘बंगाली’ कौन?

ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) लगातार भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर यह आरोप लगाती रही है कि वह पश्चिम बंगाल की संस्कृति और राजनीति में बाहरी तत्वों को शामिल कर रही है।

  • TMC का दावा: बीजेपी के बड़े नेता और चुनाव प्रचार करने वाले चेहरे बंगाल की राजनीति को नहीं समझते और वे सिर्फ उत्तर भारत की राजनीति थोपना चाहते हैं।
  • BJP का जवाब: बीजेपी कहती है कि उनका संगठन राज्य में लगातार मजबूत हुआ है और वे बंगाल में राष्ट्रवादी और विकास केंद्रित राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।

यह बहस खासकर बंगाली पहचान और हिंदुत्व एजेंडे के टकराव से जुड़ी है, जिसे दोनों दल अपने-अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

ममता की रणनीति: ‘बंगाली गौरव’ को मजबूत करना

पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी ने बंगाल में अपना वोट प्रतिशत और सीटें बढ़ाई हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 42 में से 18 सीटें जीतकर ममता को बड़ा झटका दिया था। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता ने यह नैरेटिव मजबूत किया कि बंगाल के लोगों को “बाहरी ताकतों” से सावधान रहना चाहिए।

अब 2024 में भी ममता बनर्जी यही रणनीति अपना रही हैं:
“बंगाल बनाम बाहरी” नैरेटिव को हवा देना
बंगाली पहचान और भाषा का मुद्दा उठाना
बीजेपी को उत्तर भारतीय पार्टी बताकर स्थानीय वोटरों को गोलबंद करना

इस रणनीति का मकसद मुस्लिम, ग्रामीण और पारंपरिक बंगाली वोटरों को एक साथ लाना है, जो तृणमूल का कोर वोट बैंक माने जाते हैं।

बीजेपी की जवाबी चाल: ‘राष्ट्रवाद’ और ‘हिंदुत्व’ पर फोकस

बीजेपी ने भी बंगाल में अपनी अलग रणनीति बना ली है। उनका जोर इस पर है कि:
ममता बनर्जी तुष्टिकरण की राजनीति कर रही हैं।
टीएमसी गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार में लिप्त है।
बंगाल को विकास चाहिए, न कि सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति।

बीजेपी के बड़े नेता, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह, बंगाल में चुनावी रैलियों में इस नैरेटिव को मजबूत कर रहे हैं। वे “जय श्रीराम” के नारे और हिंदुत्व की राजनीति के जरिए वोटरों को आकर्षित करना चाहते हैं, खासकर उन हिंदू वोटरों को, जो ममता बनर्जी की मुस्लिम समर्थक छवि से नाराज बताए जाते हैं।

‘बाहरी बनाम बंगाली’ नैरेटिव का असर क्या होगा?

टीएमसी को फायदा: अगर ममता इस नैरेटिव को सही तरीके से पेश कर पाती हैं, तो वे बंगाली अस्मिता की भावना जगाकर बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को रोक सकती हैं।
बीजेपी को नुकसान: अगर बंगाल के लोग ममता की इस अपील को स्वीकार कर लेते हैं, तो बीजेपी को उतनी सीटें नहीं मिलेंगी जितनी वे उम्मीद कर रहे हैं।
हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण: बीजेपी इस नैरेटिव का इस्तेमाल हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने के लिए भी कर सकती है, जिससे टीएमसी को चुनौती मिल सकती है।

निष्कर्ष

ममता बनर्जी का ‘बाहरी बनाम बंगाली’ नैरेटिव पश्चिम बंगाल की राजनीति में कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे हवा देना उनकी राजनीतिक मजबूरी और रणनीतिक दांव दोनों है। यह लड़ाई सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि बंगाल की पहचान बनाम राष्ट्रीय राजनीति की भी हो गई है।

आने वाले चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ममता बनर्जी ‘बंगाली अस्मिता’ के मुद्दे पर फिर से जीत हासिल करेंगी, या बीजेपी अपने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के एजेंडे से बंगाल में नया इतिहास रचेगी

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