भगवंत मान को किसानों की अरविंद केजरीवाल की तरह परवाह क्यों नहीं?

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,4 मार्च।
जिसे भारत का “अन्नदाता प्रदेश” कहा जाता है, आज फिर किसानों के संघर्ष और आंदोलनों का केंद्र बना हुआ है। किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर हैं, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री भगवंत मान का रवैया कुछ अलग ही कहानी कहता है। आश्चर्य की बात यह है कि जब दिल्ली में किसान आंदोलन चरम पर था, तब अरविंद केजरीवाल किसानों के समर्थन में पूरी ताकत से खड़े नजर आए थे, लेकिन अब जब वही किसान पंजाब में अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो भगवंत मान उतनी ही मजबूती से उनके साथ क्यों नहीं खड़े दिख रहे?

क्यों अलग है भगवंत मान और केजरीवाल का रवैया?

अरविंद केजरीवाल ने 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान खुलकर किसानों का समर्थन किया था। उन्होंने न केवल उनकी मांगों को जायज़ ठहराया, बल्कि दिल्ली की सीमाओं पर जाकर किसानों से मुलाकात भी की। उस दौरान दिल्ली सरकार ने आंदोलनरत किसानों को सुविधाएं देने तक का ऐलान किया।

इसके विपरीत, भगवंत मान, जो खुद भी पंजाब के किसान परिवार से आते हैं, अब किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की बजाय केंद्र सरकार का पक्ष लेते नजर आ रहे हैं। किसान जब भी अपने हक के लिए आंदोलन करते हैं, तो मान सरकार की ओर से या तो सख्ती दिखाई जाती है या फिर उन्हें बातचीत के नाम पर टाल दिया जाता है।

क्या है किसानों की नाराजगी की वजह?

पंजाब के किसान इस वक्त न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी, कर्जमाफी, और पराली जलाने पर दंड के खिलाफ राहत जैसे मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं। वे बार-बार सरकार से अपील कर रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए, लेकिन सरकार की उदासीनता उनके गुस्से को और भड़का रही है।

किसानों को इस बात की शिकायत है कि जब आम आदमी पार्टी (AAP) पंजाब में सत्ता में आई थी, तब उन्होंने किसानों के हक की लड़ाई लड़ने का वादा किया था। लेकिन अब जब वे सत्ता में हैं, तो केंद्र सरकार के दबाव में झुकते नजर आ रहे हैं।

क्या केंद्र की राजनीति है वजह?

एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि पंजाब सरकार केंद्र से वित्तीय सहायता चाहती है और इसीलिए वह केंद्र सरकार को नाराज नहीं करना चाहती। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली में रहकर किसानों का समर्थन कर सकते हैं, तो भगवंत मान पंजाब में रहकर ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या वे अपनी ही पार्टी के दृष्टिकोण से अलग हो गए हैं, या फिर राजनीतिक समीकरणों की वजह से उनका रुख बदला है?

आगे क्या होगा?

अगर भगवंत मान किसानों की मांगों को हल्के में लेते हैं, तो इसका असर पंजाब की राजनीति पर गहरा पड़ सकता है। पंजाब में किसान राजनीति का केंद्र बिंदु रहे हैं, और वे चुनावों में भी एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अगर मान सरकार किसानों की नाराजगी को दूर नहीं करती, तो इसका खामियाजा AAP को अगले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।

निष्कर्ष

भगवंत मान के लिए यह समय है कि वे किसानों की असली मांगों को समझें और उनके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएं। सिर्फ चुनावी वादे और बयानबाजी से किसान संतुष्ट नहीं होने वाले। अगर आम आदमी पार्टी को पंजाब में अपनी पकड़ बनाए रखनी है, तो उसे किसानों के प्रति वही संवेदनशीलता दिखानी होगी, जो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के किसान आंदोलन के दौरान दिखाई थी।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.