सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धार्मिक न्यास कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को हाई कोर्ट भेजा

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,2 अप्रैल।
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का विरोध किए जाने के बाद, शीर्ष अदालत ने हिंदू धार्मिक न्यास (एंडोमेंट) कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संबंधित हाई कोर्ट में ले जाने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं ने दक्षिणी राज्यों के इन कानूनों को असंवैधानिक बताते हुए उन्हें चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में लागू हिंदू धार्मिक न्यास कानूनों के तहत सरकारें हिंदू मंदिरों के प्रबंधन और प्रशासन में हस्तक्षेप करती हैं, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों के पूजा स्थलों पर ऐसा कोई नियंत्रण नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने इसे धार्मिक भेदभाव का मामला बताते हुए इन कानूनों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया था।

हालांकि, केंद्र सरकार ने अदालत में दलील दी कि यह मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है और सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। सरकार का तर्क था कि चूंकि यह राज्य-विशिष्ट कानून हैं, इसलिए इन पर संबंधित हाई कोर्ट में ही सुनवाई होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार की दलील स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्यों के बनाए गए कानूनों को चुनौती देने के लिए उचित मंच हाई कोर्ट ही होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट में निर्णय से असंतोष होता है, तो वह आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकता है।

याचिका दाखिल करने वाले संगठनों और व्यक्तियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर निराशा व्यक्त की। उनका कहना है कि यह केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि हिंदू धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन की स्वतंत्रता से जुड़ा संवेदनशील मामला भी है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद अलग-अलग राज्यों में इन मामलों को लेकर विभिन्न प्रकार के कानूनी फैसले आ सकते हैं, जिससे एक समान नीति बनाने में कठिनाई हो सकती है। वहीं, कुछ का मानना है कि इससे राज्य सरकारों को अपने धार्मिक न्यास कानूनों की समीक्षा करने और उनमें सुधार करने का अवसर मिलेगा।

इस फैसले के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट इन याचिकाओं पर क्या फैसला सुनाते हैं। वहीं, यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रह सकता है, क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

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