अलविदा मनोज कुमार… दोस्त को आखिरी विदाई देने पहुंचे अमिताभ बच्चन, राज बब्बर समेत कई शख्सियतें

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,5 अप्रैल।
हिंदी सिनेमा के ‘भारत कुमार’ कहे जाने वाले दिग्गज अभिनेता, लेखक और निर्देशक मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर ने फिल्म इंडस्ट्री और उनके चाहने वालों को गहरे शोक में डुबो दिया। देशभक्ति फिल्मों को एक नया आयाम देने वाले मनोज कुमार को अंतिम विदाई देने के लिए मंगलवार को मुंबई में सिनेमा, राजनीति और समाज से जुड़ी कई बड़ी हस्तियां उमड़ीं। इस भावुक मौके पर फिल्मी जगत के महानायक अमिताभ बच्चन, अभिनेता और राजनेता राज बब्बर, निर्देशक सुभाष घई, और कई अन्य वरिष्ठ कलाकार मौजूद रहे।

मनोज कुमार के निवास पर अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। आम लोगों से लेकर फिल्मी हस्तियों तक, हर कोई उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि देने पहुंचा। हर चेहरा भावुक था और हर आंख नम। अमिताभ बच्चन, जो मनोज कुमार को न सिर्फ एक आदर्श कलाकार बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी एक प्रेरणास्रोत मानते हैं, बेहद भावुक नजर आए। उन्होंने कहा, “मनोज जी न होते, तो शायद सिनेमा में देशभक्ति की आत्मा न होती।”

राज बब्बर, जो खुद भी एक कलाकार और राजनेता हैं, ने कहा कि मनोज कुमार सिर्फ अभिनेता नहीं थे, वो एक विचारधारा थे। उन्होंने कहा, “उनकी फिल्मों में देशभक्ति अभिनय नहीं, आत्मा से बहती थी। उन्होंने जो कुछ भी किया, वो सिनेमा के ज़रिए भारत को एक पहचान देने के लिए किया।”

मनोज कुमार ने ‘उपकार, पूरब और पश्चिम, क्रांति, रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों के ज़रिए भारतीय समाज और राजनीति को सिनेमा में जगह दी। वह उन कलाकारों में से थे जिन्होंने न सिर्फ अभिनय किया, बल्कि लेखन और निर्देशन में भी अपनी गहरी समझ का परिचय दिया।

उनकी फिल्मों ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़े, बल्कि लोगों के दिलों में देश के प्रति सम्मान और जागरूकता भी पैदा की। आज जब देशभक्ति को लेकर सिनेमा की दिशा पर सवाल उठते हैं, तब मनोज कुमार की फिल्मों को आदर्श रूप में देखा जाता है।

मनोज कुमार को पद्म श्री और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जैसे उच्चतम सम्मान मिल चुके हैं, लेकिन उनके निधन के बाद उनके प्रशंसकों और फिल्म समीक्षकों ने मांग की है कि उनके सम्मान में केंद्र सरकार कोई स्थायी स्मारक या फिल्म संस्थान की योजना बनाए। कई लोगों ने यह भी सुझाव दिया कि उनकी फिल्मों को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।

मनोज कुमार अब भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनका काम, उनकी सोच और उनका सिनेमा हमेशा जीवित रहेगा। उन्होंने सिनेमा को न सिर्फ मनोरंजन का माध्यम, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का औज़ार बनाया। आज जब उन्हें अंतिम विदाई दी गई, तो सिर्फ एक कलाकार को नहीं, एक युग, एक विचारधारा और एक प्रेरणा को अलविदा कहा गया।

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