कथित हिरासत मृत्यु मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, विधवा को 25 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

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समग्र समाचार सेवा

गुवाहाटी, ९ जून: कथित हिरासत मृत्यु मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, विधवा को 25 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
नई दिल्ली/गुवाहाटी। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में असम सरकार को कथित हिरासत मृत्यु के मामले में व्यवसायी संतोष होजाई की विधवा को कुल 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा पीड़ित परिवार को तत्काल राहत प्रदान करने के उद्देश्य से दिया जा रहा है और इसका आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराणा और न्यायमूर्ति शमीमा जहां की खंडपीठ ने राज्य सरकार को पहले दिए गए 5 लाख रुपये के अंतरिम मुआवजे के अतिरिक्त 20 लाख रुपये और देने का आदेश दिया। मामला वर्ष 2020 में असम के व्यवसायी संतोष होजाई की कथित हिरासत में मृत्यु से जुड़ा है।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस कर्मियों ने होजाई का अपहरण कर उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा और गंभीर यातनाएं दीं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई। आरोप यह भी है कि घटना को छिपाने के लिए शव को दफना दिया गया था। इसके बाद मृतक की पत्नी ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन का हवाला देते हुए मुआवजे की मांग की थी।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
पुलिस द्वारा बिना विधिक प्रक्रिया का पालन किए हिरासत में लेने के आरोप अत्यंत गंभीर हैं।

हिरासत में यातना और मृत्यु के आरोप मौलिक अधिकारों के संभावित उल्लंघन को दर्शाते हैं।

लगभग छह वर्ष बीत जाने के बावजूद परिवार आर्थिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है।

संवैधानिक अदालतें आपराधिक मुकदमे के परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा दे सकती हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप यदि सही साबित होते हैं तो यह राज्य शक्ति के गंभीर दुरुपयोग का उदाहरण होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दायर आरोपपत्रों के आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा और मुआवजे का आदेश उस प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगा।

साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि मुकदमे में संबंधित अधिकारियों को दोषी पाया जाता है तो सरकार उनसे मुआवजे की राशि की वसूली कर सकती है। इस फैसले को हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।

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