बिन जाति के कैसे बने अंग्रेज़ों के सरनेम? जानिए दिलचस्प इतिहास
प्रसिद्ध साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा के आलेख के माध्यम से समझिए कि कैसे मध्यकालीन ब्रिटेन में पेशे, भूगोल और पूर्वजों के नाम से अस्तित्व में आए सरनेम।
- भारत में जहां सरनेम से अक्सर व्यक्ति की जाति का पता चल जाता है, वहीं ब्रिटेन में उपनामों की शुरुआत मुख्य रूप से पेशे, स्थान और पूर्वजों के आधार पर हुई थी।
- इंग्लैंड में 1066 के नॉर्मन कब्जे के बाद से उपनामों का चलन शुरू हुआ और 14th-15th शताब्दी तक यह एक अनिवार्य परंपरा बन गया।
- ब्रिटिश उपनामों को मुख्य रूप से सात श्रेणियों में बांटा जाता है, जिनमें पैट्रोनॉमिक, पेशे से जुड़े और भौगोलिक स्थानों पर आधारित नाम शामिल हैं।
समग्र समाचार सेवा
लंदन / नई दिल्ली, 23 सितंबर: भारत एक ऐसा विशिष्ट देश है जहां किसी व्यक्ति का कुलनाम (सरनेम) सुनते ही उसकी जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि का अंदाजा आसानी से लग जाता है। मिश्रा, शुक्ला, खन्ना, माथुर या राजपूत जैसे नाम झट से बता देते हैं कि हम किस पृष्ठभूमि की बात कर रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि ब्रिटेन या पश्चिमी देशों में, जहां भारत जैसी जाति-प्रथा नहीं है, वहां लोगों के पास सरनेम कैसे आए और इन्हें रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? ‘नाम में क्या रखा है?’ वाली कहावत को यदि सच माना जाए तो अकेले इंग्लैंड में ही लगभग 45,000 अलग-अलग सरनेम मौजूद हैं और हर एक नाम के पीछे इतिहास की एक लंबी और रोचक दास्तान छिपी हुई है।
नॉर्मन कब्ज़े से पहले कैसे होती थी पहचान?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि ब्रिटेन पर 1066 के नॉर्मन कब्जे से पहले लोगों के पास खानदानी या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले उपनाम नहीं होते थे। उन्हें केवल उनके निजी नाम से ही जाना जाता था। उस समय आबादी कम थी और समुदाय छोटे थे, इसलिए एक ही नाम से काम चल जाता था। लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ने लगी, एक ही नाम के कई लोग होने के कारण पहचान का संकट खड़ा होने लगा। इस समस्या के समाधान के लिए लोगों को उनकी विशेषता, काम या निवास स्थान के आधार पर पुकारा जाने लगा, जैसे—’कसाई जॉन’ (जॉन द बुचर), ‘नाटे विलियम’ (विलियम द शॉर्ट) या ‘सटन के हेनरी’।
पेशे और भूगोल से जुड़े उपनाम
समय के साथ ये पहचान बताने वाले नाम पक्के होते चले गए। 1483 में राजा एडवर्ड पंचम ने इंग्लैंड के सभी नागरिकों के लिए उपनाम रखना अनिवार्य कर दिया, ताकि प्रशासनिक कामकाज और पहचान बेहतर हो सके। अंग्रेज़ी उपनामों को मुख्य रूप से सात श्रेणियों में समझा जा सकता है:
पैतृक नाम (Patronymic): जो पिता के नाम पर बने हों, जैसे ‘रिचर्डसन’ (रिचर्ड का बेटा) या ‘डेविडसन’।
पेशेवर उपनाम (Occupational): जो व्यक्ति के काम को दर्शाते हैं, जैसे ‘स्मिथ’ (लोहार), ‘टेलर’ (दर्जी) या ‘कार्पेंटर’।
भौगोलिक और स्थान आधारित: जो किसी शहर, गांव या विशेष स्थान के नाम पर रखे गए, जैसे ‘हैम्पशायर’ या ‘सटन’।
प्राकृतिक विशेषताएं: जो जंगलों, पहाड़ियों या नदियों के पास रहने के कारण पड़े, जैसे ‘वुड’ या ‘हिल’।
राजघरानों के सरनेम और उनका सफर
केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि शाही परिवारों के नाम भी समय के साथ बदलते रहे हैं। इसका एक बेहतरीन उदाहरण ब्रिटिश राजपरिवार है, जिसने 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपने जर्मन प्रभाव वाले नाम ‘सैक्स-कोबर्ग-गोथा’ को बदलकर प्रसिद्ध ‘विंडसर कैसल’ के नाम पर ‘विंडसर’ रख लिया था। आज भले ही इन उपनामों की उत्पत्ति के स्रोत कई बार अस्पष्ट हो जाते हैं, लेकिन ये इस बात का जीवंत दस्तावेज हैं कि कैसे इंसानी सभ्यता और भाषा ने अपनी पहचान गढ़ने के लिए इतिहास के विभिन्न पड़ावों को पार किया है।