समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 1 अक्टूबर :राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भारत में बदलती जनसांख्यिकी और जनसंख्या नीति को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि देश में जनसंख्या से जुड़े विषयों पर नीतियां तैयार करते समय उनके दीर्घकालिक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभावों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
आंबेकर ने 28 सितंबर को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में यह बातें कहीं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश में जनसंख्या और जनगणना से संबंधित मुद्दों पर एक ठोस और व्यापक नीति का अभाव रहा। उनके अनुसार, जनसंख्या वृद्धि को लंबे समय तक देश की विभिन्न समस्याओं का प्रमुख कारण बताया गया, जबकि नीतिगत कमियों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई।
कानूनों और नीतियों के प्रभाव पर सवाल
आंबेकर ने स्वतंत्रता के बाद बने कुछ कानूनों का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग समुदायों के लिए विवाह कानूनों में अंतर और स्थानीय निकाय चुनावों में परिवार के आकार से जुड़े प्रावधानों के जनसांख्यिकीय प्रभावों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।
उन्होंने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लेख किया और दावा किया कि कुछ नीतियों के सामाजिक और जनसांख्यिकीय प्रभावों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ। ये आंबेकर के राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण हैं, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र में अलग-अलग मत मौजूद हैं।
NRC और नागरिकता पहचान का मुद्दा
आंबेकर ने देशभर में National Register of Citizens (NRC) की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह पहचानना जरूरी है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। उन्होंने मतदाता सूचियों में गलत तरीके से शामिल लोगों की पहचान करने की बात कही और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत पात्र लोगों को नागरिकता देने की आवश्यकता का समर्थन किया।
उन्होंने जनसांख्यिकीय बदलाव को राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और देश की एकता से जोड़ते हुए कहा कि इस विषय पर चर्चा को केवल “धर्मनिरपेक्ष” बनाम “सांप्रदायिक” बहस तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
आंबेकर के बयान ऐसे समय आए हैं जब देश में आगामी जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक बहस चल रही है। RSS की NRC संबंधी मांग भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है।