आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान: भारत की एकता सर्वोच्च प्राथमिकता

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश की अखंडता और आपसी सौहार्द को बनाए रखने पर जोर दिया, कहा- राष्ट्रीय हित सर्वोपरि।

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  • मोहन भागवत ने भारत की एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।
  • समाज में आपसी सद्भाव और अखंडता बनाए रखने का आह्वान किया।
  • राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत और क्षेत्रीय हितों से ऊपर रखने पर जोर।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 20 अक्तूबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सौहार्द के महत्व को रेखांकित करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की विविधता में एकता ही इस देश की सबसे बड़ी ताकत है और हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह देश की एकता को अपनी पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता बनाए। वर्तमान भू-राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में उनके इस संदेश ने देश भर में एक सकारात्मक चर्चा को जन्म दिया है, जो राष्ट्रीय हित और सामाजिक एकजुटता पर केंद्रित है।

विविधता में एकता और राष्ट्रीय अखंडता का महत्व

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत एक विशाल और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध देश है, जहाँ विभिन्न भाषाएं, जातियां, संस्कृतियां और परंपराएं एक साथ निवास करती हैं। यह विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और शक्ति है। हालांकि, कुछ असामाजिक तत्व या निहित स्वार्थ वाले लोग इस विविधता का लाभ उठाकर समाज में दूरियां पैदा करने का प्रयास करते हैं। ऐसे समय में यह और अधिक आवश्यक हो जाता है कि प्रत्येक नागरिक अपनी संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे।

मोहन भागवत ने कहा कि देश की अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि समाज का प्रत्येक वर्ग आपसी प्रेम, भाईचारे और संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दे। जब देश का नागरिक सुरक्षित और एकजुट महसूस करेगा, तभी राष्ट्र प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकेगा।

व्यक्तिगत और क्षेत्रीय हितों से ऊपर है राष्ट्रहित

आज के समय में जब वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के दौर में लोग तेजी से अपने व्यक्तिगत और क्षेत्रीय हितों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब राष्ट्रीय एकता का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा या क्षेत्रीय मुद्दा देश की संप्रभुता और एकता से बड़ा नहीं हो सकता। जब कभी भी देश के सामने कोई चुनौती आती है, तो भारत के इतिहास ने यह साबित किया है कि देशवासियों ने अपनी सभी भिन्नताओं को भुलाकर हमेशा एक साथ खड़े होने का परिचय दिया है।

उन्होंने युवाओं और समाज के प्रबुद्ध नागरिकों से आह्वान किया कि वे देश को तोड़ने वाली ताकतों के प्रति सतर्क रहें और एक मजबूत, आत्मनिर्भर तथा संगठित भारत के निर्माण में अपना योगदान दें। एकता के सूत्र में बंधा हुआ समाज ही किसी भी बाहरी या आंतरिक चुनौती का मुंहतोड़ जवाब दे सकता है।

सामाजिक समरसता और समकालीन चुनौतियाँ

आरएसएस प्रमुख ने सामाजिक समरसता (Social Harmony) पर जोर देते हुए कहा कि समाज में व्याप्त भेदभाव, असमानता और वैमनस्य को दूर किए बिना एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी जब सम्मान और अधिकार मिलेगा, तभी देश वास्तविक अर्थों में एक मजबूत इकाई बन पाएगा। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि वे अपने दैनिक जीवन में ऐसे आचरण को अपनाएं जो समाज को जोड़ने का काम करे न कि बांटने का।

आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, तब देश के भीतर आंतरिक स्थिरता और शांति बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द का होना भी राष्ट्र की प्रगति की गति को सुनिश्चित करता है।

निष्कर्ष और नागरिकों का कर्तव्य

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह संदेश हर भारतीय के लिए एक प्रेरणा है। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय संप्रभुता को बनाए रखने के लिए सतत प्रयास की आवश्यकता होती है। भारत की एकता हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, और इसे सुरक्षित रखना किसी एक संस्था या सरकार की नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम सब मिलकर इस प्राथमिकता को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, तो भारत निश्चित रूप से विश्व गुरु के रूप में अपने गौरवशाली भविष्य की ओर अग्रसर होगा।

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