रिजीम चेंज’ की राजनीति और राष्ट्र प्रथम का संकल्प
क्या भारत को अस्थिरता की ओर धकेलने की कोशिश हो रही है?
पूनम शर्मा
भारत की राजनीति में इन दिनों ‘रिजीम चेंज’ अर्थात सत्ता परिवर्तन की चर्चा ने एक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजयादशमी के अवसर पर देशवासियों से राष्ट्र की गरिमा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का आह्वान किया, तो दूसरी ओर शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत के सत्ता परिवर्तन और विदेशी आंदोलनों से जुड़े बयानों ने राजनीतिक वातावरण को गर्म कर दिया है।
सवाल केवल यह नहीं है कि सत्ता में कौन रहेगा और कौन जाएगा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है?
प्रधानमंत्री ने बताईं राष्ट्र के सामने तीन चुनौतियां
20 अक्टूबर को दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन स्थित विजयादशमी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय एकता का संदेश देते हुए तीन प्रकार की प्रवृत्तियों से सावधान रहने को कहा।
पहली, वे शक्तियां जो देश के सम्मान और गरिमा को चोट पहुंचाती हैं। दूसरी, वे तत्व जो समाज को बांटने का प्रयास करते हैं। तीसरी, वे मानसिकताएं जो भारत की संस्कृति और विरासत के प्रति घृणा रखती हैं।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्र प्रथम के संकल्प के साथ एकजुट होने की अपील की। उनका संदेश राजनीतिक मतभेदों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने पर केंद्रित था। हालांकि, उन्होंने अपने इस संबोधन में राहुल गांधी या किसी विशिष्ट विपक्षी नेता का नाम लेकर उन्हें देश का शत्रु नहीं बताया।
संजय राउत का बयान और सत्ता परिवर्तन की चर्चा
इसी राजनीतिक वातावरण में संजय राउत ने राहुल गांधी की कथित वियतनाम यात्रा से जुड़े सवाल पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके लौटने के बाद सत्ता परिवर्तन हो जाएगा।
यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक व्यंग्य या आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति रही हो, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह बहुत गंभीर अर्थ है । लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन के लिए यह कोई सामान्य घटना नहीं है। चुनाव के माध्यम से सरकार बदलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया है तो उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए ।
लेकिन जब ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्द का प्रयोग हिंसक विदेशी आंदोलनों और संस्थागत टकराव की चर्चाओं के बीच होता है, तो राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह अपनी मंशा स्पष्ट करे।
राउत के बयान से किसी सुनियोजित या गैर-संवैधानिक सत्ता परिवर्तन की योजना का अंदेशा लगता है । सार्वजनिक जीवन में शब्दों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विदेशी हिंसक आंदोलनों से प्रेरणा लेने का सवाल
संजय राउत ने अल्बानिया में न्यायिक संस्था पर हमले से जुड़ी एक घटना का उल्लेख करते हुए भारत को उससे सबक लेने की बात कही थी। इस पर भाजपा नेताओं ने तीखी आपत्ति जताई।
यह विवाद एक बुनियादी प्रश्न सामने लाता है—क्या लोकतांत्रिक असहमति व्यक्त करने के लिए हिंसक विदेशी घटनाओं का उदाहरण देना उचित राजनीतिक भाषा है?
भारत में सरकारों की आलोचना करने, विरोध प्रदर्शन आयोजित करने और संवैधानिक बदलाव की मांग करने का अधिकार है। लेकिन न्यायालयों, संसद या अन्य संस्थाओं के विरुद्ध हिंसा किसी लोकतांत्रिक समाधान का विकल्प नहीं हो सकती।
विरोध और अराजकता में अंतर समझना होगा
बांग्लादेश, नेपाल और अन्य देशों में हुए राजनीतिक आंदोलनों का उल्लेख भारतीय राजनीतिक बहस में बार-बार किया जाता है। लेकिन प्रत्येक देश की संवैधानिक व्यवस्था, राजनीतिक परिस्थितियां और सामाजिक संरचना अलग होती हैं। किसी दूसरे देश में हुई हिंसा या राजनीतिक उथल-पुथल को भारत के लिए आदर्श मानना गंभीर चिंतन का विषय है।
लोकतांत्रिक विरोध की शक्ति उसकी शांतिपूर्ण प्रकृति, जनसमर्थन और संवैधानिक वैधता में होती है। हिंसा से सार्वजनिक संपत्ति, सामान्य नागरिक और अंततः लोकतांत्रिक संस्थाएं ही प्रभावित होती हैं।
क्या राजनीतिक विरोध राष्ट्रविरोध है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है। सरकार का विरोध करना और राष्ट्र का विरोध करना समान नहीं हैं। किसी प्रधानमंत्री, राजनीतिक दल या सरकारी नीति की आलोचना अपने आप में देशविरोधी गतिविधि नहीं है।
लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर हिंसा भड़काना, सामाजिक समुदायों के बीच शत्रुता फैलाना या लोकतांत्रिक संस्थाओं को बलपूर्वक निष्क्रिय करने का प्रयास करना गंभीर विषय है।
इसी प्रकार बिना प्रमाण किसी विपक्षी नेता या संगठन को देशद्रोही घोषित करना भी लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। राष्ट्रहित की रक्षा का अर्थ कानून के समान अनुपालन और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा से भी है।
राहुल गांधी और विपक्ष की जिम्मेदारी
राहुल गांधी सहित विपक्षी नेतृत्व को सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह असहमति को किस भाषा और दिशा में आगे बढ़ाता है। यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य चुनावी या संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सरकार बदलना है, तो उसे स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए। राजनीतिक अस्पष्टता और उत्तेजक बयान जनता के बीच अनावश्यक आशंकाएं उत्पन्न कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रथम केवल नारा नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र प्रथम का आह्वान एक व्यापक प्रश्न उठाता है—क्या हमारे राजनीतिक दल राष्ट्रीय हित के बुनियादी मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद एकजुट रह सकते हैं?
राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा किसी एक दल की संपत्ति नहीं हैं।
इनकी रक्षा सरकार, विपक्ष और नागरिक समाज की साझा जिम्मेदारी है। विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। आज इस संदेश की सार्थकता इसी में है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहे।
भारत में सरकारें जनता के जनादेश से बननी और बदलनी चाहिए, भय, हिंसा या अराजकता से नहीं। राजनीतिक सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन राष्ट्र और उसकी संवैधानिक संस्थाओं की निरंतरता सर्वोपरि है।
यही वह कसौटी है जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को अपने शब्दों तथा कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।