1: मीटू के पहले शहीद
मीटू की आंच पर सबसे पहले होने वाले शहीदों में पत्रकारिता के रास्ते राजनीति में आकर मंत्री बने एम. जे. अकबर का नाम अमर हो गया। चंबल नरेश की तरह कानूनी कार्रवाई की धमकी देते हुए मंत्रीजी ने 97 वकीलों की फौज के साथ अदालती औपचारिकताओं में जुट गये। मगर आरोप लगाने वाली महिलाओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रधानमंत्री ने सबसे ताकतवर नौकरशाह अजीत डोभाल को मंत्रीजी के पास भेजा। और देखते ही देखते सारी अकड़ निकल गयी। और मीटू के शहादतों में नंबर वन हो गये। बिन बीरबल अकबर का अब भविष्य क्या होगा यह तो एकदम एक्सक्लूसिव स्टोरी है। पर मीटू की जब तब भी चर्चा होगी तो लोग बेसाख्ता बडे़ बे आबरू होकर….. पत्रकार संपादक को भी लोग जरुर याद करेंगे।
2: क्या किस्मत है?
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अपनी सटीक संतुलित सर्वेक्षणों और पैनी नजर से सबको अचंभित कर देने वाले पीके चुनावी जादूगर हैं। एनडीए को केंद्र में और जेडीयू के बिहार में सत्तारूढ़ होने की घोषणा करके अपना लोहा मनवाया था। पर मोदी दरबार से उपेक्षित कर दिए गए पीके को गोद लेने वालों की भीड़ लग गयी। मगर बिना चापलूसी को घोले सही-सही आकलन की संभावना को बताकर भी बेघर हो गए थे। तभी इनके प्रति फिर जेडीयू करीब आकर गले लगा ली। बिहार के मुख्यमंत्री के वे इतने विश्वसनीय साबित हुए कि आज वे पार्टी में नंबर टू हो गये। ज्यादातर लोग हैरान हैं मगर देखना है कि चुनावी रणनीतिकार पीके की अगली घोषणा का सुफल क्या होगा?
3:सबके चहेते शत्रु
सबको खामोश कर देने वाले अभिनेता और अटल युग में मंत्री रह चुके बिहारी बाबू को इसबार बे भाव रखा गया। नये निजाम के राज में खामोश बिहारी बाबू आज सबसे बड़े संकट बन गए हैं। शुरूआत में तो सांकेतिक विरोध किया मगर तमाम विपक्षी दलों की दिलचस्पी और मित्रता ने खामोश बगावत की धार में नयी ऊर्जा भर दी। इनके साथ सपा नरेश अखिलेश से लेकर सुशासन बाबू और लालटेन के युवा क्रिकेटर नेता भी साथ लेने और पाने के लिए आतुर हैं। कोई इनको दिल्ली से तो कोई बनारस से प्रत्याशी बनाने की योजना बना रहे हैं। सब की सहमति और समर्थन के बाद बिहारी बाबू के दांव-पेंच पर सबकी निगाहें लगी है। देखे खामोश सिन्हा की अंततः फाइनल गर्जना क्या होगी?
सबको खामोश कर देने वाले अभिनेता और अटल युग में मंत्री रह चुके बिहारी बाबू को इसबार बे भाव रखा गया। नये निजाम के राज में खामोश बिहारी बाबू आज सबसे बड़े संकट बन गए हैं। शुरूआत में तो सांकेतिक विरोध किया मगर तमाम विपक्षी दलों की दिलचस्पी और मित्रता ने खामोश बगावत की धार में नयी ऊर्जा भर दी। इनके साथ सपा नरेश अखिलेश से लेकर सुशासन बाबू और लालटेन के युवा क्रिकेटर नेता भी साथ लेने और पाने के लिए आतुर हैं। कोई इनको दिल्ली से तो कोई बनारस से प्रत्याशी बनाने की योजना बना रहे हैं। सब की सहमति और समर्थन के बाद बिहारी बाबू के दांव-पेंच पर सबकी निगाहें लगी है। देखे खामोश सिन्हा की अंततः फाइनल गर्जना क्या होगी?
4: बिहार की पहेली
एनडीए के साथ रहकर भी सुशासन कुमार को नाथना संभव नहीं हो पा रहा है। कई दौरों और बैठकों के बाद भी टिकट समीकरण पर पेंच फंसी हुई है। पासवान और कुशवाहा के पैतरों को कमल मुखिया सुलझा नहीं पा रहें हैं। इनके बयानों से भी कभी खीर तो कभी कोई खिचड़ी पकती पकाती दिख रही है। हर बैठक में सुलह होने समझौता होने की गलबहियां फोटू छपने के बाद भी कोई साफ़ साफ़ कहने को तैयार नहीं। इसी बीच भूतल परिवहन मंत्रालय पर बरसते हुए सुशासन बाबू एनडीए पर ही सूबे की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। जेडीयू के इस तेवर से अचंभित एनडीए बिहार में एकल लड़ने को लेकर भी विचार-विमर्श कर सकती है। देखना यही दिलचस्प होगा कि इसबार बिहार किसके साथ होगा?
: 5 पवार का घटता पावन
अपनी ढुलमुल नीतियों के चक्कर में दूसरों को पटकनी देने में माहिर एनसीपी नरेश इस बार चित होकर फंस गए। राफेल डील मामले में संकट का सामना कर रहे प्रधानमंत्री का समर्थन करना भारी पड़ा। सालोसाल तक हनुमान की तरह वफादार तारिक अनवर दूसरे ही पल पार्टी और सांसदी छोड़ दी। भतीजे अजीत पवार भी बागी होकर सामने तन गये। और तो और सांसद बेटी भी इसबार अभी तक नाराज हैं। सैकड़ों कार्यकर्ताओं की जमात भी खिसकने लगी है। पार्टी से मोहभंग का यह दौर कब तक जारी रहता है। देखना यही है कि अपने पावर से कभी दिल्ली को डांवाडोल करने का पावर अब कितना रह गया है। शायद एनसीपी को भी लुप्त जनाधार का अंदाजा है।
6: आप के लिए भी दिल्ली संकट
सबसे ज्यादा भाव मारने और दिखाने में स्मार्ट आप को पंजाब की जमा पूंजी को थामना कठिन हो गया है। पहले नशा को मुद्दा परवान नहीं चढ़ सका। तो अब ठेके पर रखे गये हजारों शिक्षकों को पक्का करने का मुद्दा गरमा दिया है। जिससे सालों से अस्थायी शिक्षकों को आप में स्थायी नौकरी की उम्मीद दिखाई दे रही हैं संभव है कि आप का यह पैंतरा लोकसभा चुनाव की बैतरणी बन सकती है। मगर दिल्ली में भी तीस हजार से अधिक आउट सोर्सिंग पर काम करने वाले शिक्षकों को परमानैंट प्रोब्लम भी 2019 में जी का जंजाल बन सकता है।
7: दिग्गी की पीड़ा
मध्यप्रदेश में चुनाव है मगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके दिग्गी राजा को चुनाव प्रचार से बाहर रखा गया है। सबसे उपेक्षित राजा साहब यह सफाई देते घूम रहे हैं कि मेरे प्रचार से वोट घट जाएंगे। अब राजा महाराजा परिवार से रहे वाचाल बेकाबू राजा को कौन बताएं कि टेलीविजन एंकर को फांसकर कथित शादी करने के बाद घर में महाभारत और पूरे सूबे में छी छी होने लगी थी। अपनी बेटियों को राजा से बचाओ के पोस्टर लग गये थे। खतरा लेने की बजाय राजा को ही अभियान से बाहर करके पार्टी सुप्रीमों ने एक अच्छा संदेश दिया है। जिससे आहत राजा क्या करेंगे यह तो समय ही फैसला करेगा।
: 8 हरियाणा से त्रिदेव लालों के लाल युग खत्म होते ही इनके परिवार की चमक दमक खत्म होने पर है। सूबे के ताऊ के बेटे की सत्ता तो रही मगर करप्शन के बाद जेल की हवा खा रहे ओमप्रकाश के लिए प्रार्थना करने का ही विकल्प रह गया है। अब ताऊ के पोते दुष्यंत ने फिर से लुप्त जनाधार और खो गयी राजनीतिक जमीन को पाने के लिए कमर कस ली है। वे ताऊ के नाम पर ग्रामीणों को फिर से साथ लेने देने की चौपाली बात पर विचार कर रहे हैं। देखना है कि कमल और पंजे की बेहतरीन हाल के बाद भी डेढ़ दशक से रसातल में खो गयी पार्टी और ताऊ के नाम से क्या यंग स्मार्ट सबल सक्षम और धनवान किसानों को पटा साथ कर पाएंगे देखना हे की ताऊ के पोतों की मेहनत से क्या शकुंतला रूपी सत्ता को फिर हासिल करना संभव है?
9: राफेल पर बक बक
: राफेल घोटाले पर कांग्रेस सुप्रीमो के आरोपों के सामने एनडीए पस्त है । राहुल के हमलावर रूख पर तार्किक सफाई की बजाय एनडीए प्रवक्ताओं की फौज द्वारा सुप्रीमो को ही निशाना बनाया जा रहा है। युवा अध्यक्ष को ही मजाकिया घोषित करके छवि खराब करने में लगी है। वित्त मंत्री को बकबक ब्लॉगर तो पीएम पर सीधे-सीधे आरोप लगाकर पंजा भारी हो रहा है। देखना है कि आरोपों की तार्किक सफाई सामने आती है या कमल कि मजाकिया चेहरा ही राफेल की हकीकत है। जनता सब जानने-समझने को व्यग्र बेचैन है।
10: माया के संग धन राम भी
एक कहावत है कि माया मिली न राम मुफ्त हुए बदनाम। राफेल डीलिंग सौदे में छोटे अंबानी को सरकारी दलाल बनाने या बन जाने का सौदा काफी लाभदायक है। पहले तो लगा कि संकट में चल रहे छोटे अंबानी के दिन वाकई गर्दिश में है। मोबाइल कंपनी बंद हो गयी तो अलग से हजारों करोड़ का बकाया। उसपर राफेल दलाली में नाम? भले ही सरकार ने वफादारी दिखाते हुए यह करके मुसीबत मोल ले ली हो। पर असली सच्चाई तो यह है कि इस डील में तीन फीसदी राशि छोटे अंबानी के खाते में जाएगी। अब अंबानी बाबू के खाते से कमीशन कहां कहां जाएगी यह तो अनुसंधान का शोध का प्रसंग हो सकता है मगर फिलहाल यही संतोष की बात है कि हुए बदनाम तो क्या माया के साथ-साथ खूब मिले धन राम।।
