दुर्गा स्तुति और ॐ ही सृष्टि का आधार है.

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समग्र समाचार सेवा

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।
* अजय कुमार केशरी

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे
सर्वार्थसाधिके |
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ||
उपर्युक्त दुर्गा – स्तुति दुर्गा सप्तशती से उद्धृत है, जिसका शाब्दिक अर्थ अधोलिखित है:
सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी, कल्याण करने वाली, सब के मनोरथ को पूरा करने वाली, तुम्हीं शरण ग्रहण करने योग्य हो, तीन नेत्रों वाली यानी भूत भविष्य वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने वाली हो, तुम्ही शिव पत्नी, तुम्ही नारायण पत्नी अर्थात भगवान के सभी स्वरूपों के साथ तुम्हीं जुडी हो, आप को नमस्कार है।।
इस मंत्र के अर्थ को समझने की सुगमता के लिए मैं प्रयुक्त शब्दों का अर्थ भी लिख रहा हूं;
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये= सभी मंगलों में मंगलमयी शिवे= कल्याणकारी
सर्व अर्थ साधिके= सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली
शरण्ये = शरणागत वत्सला , शरण ग्रहण करने योग्य
त्रयम्बके= तीन नेत्रों वाली
गौरी= शिव पत्नी
नारायणी= विष्णु की पत्नी
नमः अस्तु ते = तुम्हे नमस्कार हैं
ॐ= ओम का संक्षिप्त चिन्ह ‘ॐ’ है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है. इसके पांच अवयव- ‘अ’ से अकार, ‘उ’ से उकार एवं ‘म’ से मकार, ‘नाद’ और ‘बिंदु’ हैं। इन पांचों को मिलाकर ‘ओम’ एकाक्षरी मंत्र बनता है।ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है. यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। “अ” से आदि कर्ता ब्रह्म, “उ” से विष्णु एवं “म” से महेश का बोध करा देता है। श्रीमदभगवद् गीता में वर्णित है कि ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ॐ इति एकाक्षरं (एक अक्षर)ब्रह्म’ अर्थात एक अक्षर शब्द ही ब्रह्म है।
‘ओंकारों यस्य मूलम’ वेदों का मूल भी यही ओम् है।
ऋग्वेद पत्र है, सामवेद पुष्प है और यजुर्वेद इसका इच्छित फल है। तभी इसे प्रणव नाम दिया गया है जिसे बीज मंत्र माना गया है।
तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है. देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है. उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि. इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।
इसके उच्चारण से को ध्वनि निकलती है उसे ओंकार कहते है जिसका अर्थ प्रणव (ब्रह्म) होता है।
ओंकार ध्वनि ‘ॐ’ को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है. यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है.
ॐ को ओम कहा जाता है। इसके उच्चारण के वक्त ‘ओ’ पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं।इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। विदित हो कि यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। एक मात्र यही एकक्षरी शब्द है जिसका उच्चारण मुख से बिना किसी अन्य शारीरिक अवयवों यथा जिह्वा, तालू, दांत आदि के सहयोग के बिना होता है। अन्य सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। यह इस ब्रह्माण्ड की प्रथम ज्ञात ध्वनि है।ओम को “प्रथम ध्वनि” माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्माण्ड में भौतिक निर्माण के अस्तित्व में आने से पहले जो प्राकृतिक ध्वनि थी, वह थी ओम की गूँज। इस लिए ओम को ब्रह्मांड की आवाज कहा जाता है। ओम् का नाद सम्पूर्ण जगत में उस समय दसों दिशाओं में व्याप्त हुआ था जब युगों-पूर्व इस सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। उस समय इस सृष्टि की रचना हुई थी। ‘प्रजा पति समवर्तताग्रे, भूतस्य जातस्य पतिरेकासीत’
अर्थात सृष्टि के प्रारंभ होने के समय यह एक ब्रह्मनाद था। मनुष्य शरीर पांच तत्वों से बना है। बिना ओम (ॐ) सृष्टि की कल्पना भी नहीं हो सकती है।
पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु तथा आकाश। यही आकाश तत्व ही जीवों में शब्द के रूप में विद्यमान है। ध्वनि के इतिहास में इसकी उत्पत्ति के बाद ही अन्य ध्वनियों का सृजन हुआ। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।
तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांति महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।
इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है. इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।इसका स्मरण करने से सभी प्रकार की कामनाएं पूर्ण होती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-‘‘प्रणव: सर्ववेदषु” सम्पूर्ण वेदों में ओंकार मैं हूं।

प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करना श्रेष्ठ है। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं।
इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी. दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ और अन्य व्याधियां भी दूर होती हैं।यदि व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर कनिष्ठ हो, तो केवल ॐ का जप करने से दुष्प्रभाव हो सकता है; क्योंकि उसमें इस जप से निर्मित आध्यात्मिक शक्ति को सहन करने की क्षमता नहीं होती । शरीर में एक विशिष्ट ऊर्जा का संचार होता है। काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार ॐ शब्द ब्रह्म शब्द, परम सत्य है और अनादि काल से अनवरत गुंजित है।

अजय कुमार केशरी,

(भारतीय राजस्व सेवा के वरिष्ठ अधिकारी )

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