एक समय पार्वती जी ने पूछा- हे महादेव जी ! किस ज्ञान के बल से आपको संसार के लोग शिव मानकर पूजते हैं. मृग छाला ओढ़े, अंगों में शमशान की विभूति लगाएं, गले में सर्प और मुंडो की माला पहने रहते हो इनमें तो कोई पवित्र नहीं है. फिर भी आप किस ज्ञान से पवित्र हो. वह आप कृपा कर बताइए.
श्री महादेव जी बोले- हे प्रिय !
सुनो गीता के ज्ञान को हृदय में धारण करने से मैं पवित्र हूं और उस ज्ञान से मुझे बाहर के कर्म नहीं व्याप्ति है.
पार्वती जी ने कहा- हे भगवन ! जिस गीता ज्ञान की आप स्तुति करते हैं उसके श्रवण करने से कोई कृतार्थ भी हुआ है.
महादेव जी ने कहा- इस ज्ञान को सुनकर बहुत जीव कृतार्थ हुए और आगे भी होंगे. मैं तुमसे एक पुरातन कथा कहता हूं. तुम इसे श्रवण करो. एक समय पाताल लोक में शेषनाग की शैया पर श्री नारायण जी आंखें मूंदकर अपने आनंद में मग्न थे. उस समय भगवन के चरण दबाती हुई श्री लक्ष्मी जी ने पूछा- हे प्रभु ! निद्रा और आलस्य उन पुरुषों को व्यापते हैं जो जीव तामसी हैं. फिर आप तो तीनों गुणों से अतीत श्री नारायण जी प्रभु वासुदेव हो. आप जो नेत्र मूंदे हो यह मुझको बड़ा आश्चर्य है.

श्री नारायण जी बोले- हे लक्ष्मी ! मुझको निद्रा, आलस्य नहीं व्याप्ते है एक शब्द जो भगवत गीता है. उसमें जो ज्ञान है उसके आनंद में मैं मग्न रहता हूं.
जैसे- 24 अवतार मेरे आकार रूप में है. वैसे यह गीता मेरा शब्द रूप अवतार है. इस गीता में यह मेरे अंग हैं. 5 अध्याय मेरा मुख है, 5 अध्याय मेरी भुजाएं हैं, पांच अध्याय मेरा ह्रदय और मन है, 16 वा अध्याय मेरा उदर है, 17 वां अध्याय मेरी जंघा है, 18वां अध्याय मेरे चरण है, संपूर्ण गीता के 2 श्लोक हैं वह मेरी नाडिया है और जो गीता के अक्षर है वह मेरे रोम-रोम है. ऐसा जो मेरा शब्द रूपी गीता ज्ञान है. उसी के अर्थ को मैं हृदय से विचारता हूं और बहुत आनंद को प्राप्त होता हूं.
श्री लक्ष्मी जी बोली- हे नारायण जी ! श्री गीता का इतना ज्ञान है तो उसी को सुनकर कोई जीव कृतार्थ भी हुआ है. सो मुझसे बताइए.
तब नारायण जी ने कहा- हे लक्ष्मी ! गीता ज्ञान को सुनकर बहुत जीव कृतार्थ हुए हैं जो तुम सुनो श्रवण नामक शुद्र वर्ण का एक प्राणी था. जो चांडालों के कर्म करता था और तेल, लवण का व्यापार करता था. उसने बकरी पाली,
एक दिन वह बकरी चराने को बाहर गया. वृक्षों के पत्ते तोड़ने लगा वहां सर्प ने उसे डस लिया. तत्काल प्राण निकल गए, मर कर उसने बहुत नरक भोगा. फिर बैल का जन्म पाया उस बैल को भिक्षुक ने मोल लिया वह भिक्षुक उस बैल पर चढ़कर सारा दिन भिक्षा मांगता था.
जो कुछ भिक्षा मांगकर लाता वह अपने परिवार के साथ मिलकर खाता था. बैल सारी रात द्वार पर बंधा रहता. उसके खाने-पीने की भी खबर न लेता, कुछ थोड़ा सा भूसा उसके आगे डाल देता था.
जब दिन चढ़े फिर बैल पर चढ़कर भीख मांगने निकल जाता. कई दिन गुजर गए वह बैल भूख के मारे गिर पड़ा और उसके प्राण छूटे नहीं.
नगर के लोग उसे देख कर कोई तीर्थ का फल दे, कोई व्रत का फल दे, पर उस बैल के प्रांत नहीं छूटे. एक दिन एक गणिका आई. उसने मनुष्यों से पूछा यह भीड़ कैसी है. तो उन्होंने उससे कहा- इस बैल के प्राण जाते नहीं, हम लोग अनेक पुण्य का फल दे रहे हैं तो भी इसको मुक्ति नहीं होती है.
तब गणिका ने कहा- जो पूण्य मैंने किया है उसका फल इस बैल के निमित्त दिया, इतना कहते ही बैल की मुक्ति हुई. तब मैंने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया. पिता ने इसका नाम सुशर्मा रखा, बड़ा हुआ, पिता ने इसको विद्या में दक्ष किया. तब भी इसको पिछले जन्म की सुध रही थी. यह अति सुंदर हुआ. इसलिए 1 दिन मन में विचार किया. जिस गणिका ने मुझको बैल की योनि से छुड़ाया था. उसका मैं दर्शन करूं, विप्र चलता- चलता गणिका के घर गया और कहा तू मुझे पहचानती है.
गणिका ने कहा मैं नहीं पहचानती तू कौन है? मेरा तेरा क्या पहचान है?
तू विप्र मैं वैश्या. तब विप्र ने कहा मैं वही बैल हूं. जिसको तुमने अपना पुण्य दिया था. तब मैं बैल योनि से छुटकारा पाया था. अब मैं विप्र के घर जन्म लिया हूं. तू अपना वह पुण्य बता. गणिका ने कहा- मैंने अपने जाने कोई पुण्य नहीं किया. पर मेरे घर एक तोता है वह सवेरे कुछ पढ़ता है मैं उसके वाक्य सुनती हूं, उस पुण्य का फल मैंने तेरे निमित्त दिया था.
तब विप्र ने तोते से पूछा कि तू सवेरे क्या पढ़ता है. तोते ने कहा – मैं पिछले जन्म में विप्र का पुत्र था. पिता ने मुझे गीता के पहले अध्याय का पाठ सिखाया था.
एक दिन मैंने गुरु जी से कहा- मुझको गुरु ने क्या पढ़ाया है. तब गुरु जी ने मुझे शाप दिया कि तू तोता हो जा. तब मैं तोता हुआ.
एक दिन वहेलिया मुझे पकड़ ले गया. एक मित्र ने मुझे मोल लिया. वह विप्र अपने पुत्र को गीता का पाठ सिखाता था. तब मैंने भी वह पाठ सीख लिया. एक दिन विप्र के घर चोर आए, उनको धन को प्राप्त ना हुआ, मेरा पिंजरा ही उठा ले गए. उन चोरों की गणिका मित्र है. मुझे इसके पास ले आए. शो मे नित्य गीता जी के पहले अध्याय का पाठ करता हूं. यह सुनती है, पर इस गणिका की समझ में नहीं आता जो मैं पढ़ता हूं. वही पुण्य तेरे निमित्त दिया था.
सो श्री गीता जी के पहले अध्याय के पाठ का फल है.
तब विप्र ने कहा हे तोते तू भी विप्र है, मेरे आशीर्वाद से तेरा कल्याण हो सो हे लक्ष्मी इतना कहने से तोते की मुक्ति गणिका ने भी भले कर्म ग्रहण किए. नित्य प्रति स्नान कर और गीता के प्रथम अध्याय का पाठ करने लगी.
इससे उसकी भी मुक्ति हुई. श्री नारायण ने कहा- हे लक्ष्मी ! जो कोई अर्थ न जानकर भी गीता का पाठ करें या श्रवण करे तो उसको भी मुक्ति मिलेगी.
गीता जी के प्रथम अध्याय का महात्म्य सम्पूर्ण।