गाय को समझाना ही पड़ेगा- डॉ कमल टावरी

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मैंने बड़ी गंभीरता के साथ युगपुरुष श्री गुरु गोलवलकर जी की दृष्टि में गोरक्षा पुस्तक पढ़ी जजसमें गोरक्षा सम्बन्धी सभी प्रश्नों का समुचित समाधान देने का प्रयास किया गया है. प्रश्न यही उठता है कि इतनी ऊँची समझ बनाने के बाद भी गोरक्षा के इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर किसी सगंठन द्वारा कियान्वयन हुआ हो, ऐसा दिखता नहीं है. मैंने दूसरी पुस्तक पढ़ी गाय और गुरुजी जिसमें विश्व हिन्दू परिषद के तात्कालिक संयुक्त महामंत्री ने श्री गुरुजी के बारे में स्पष्ट लिखा है, श्री गुरुजी का कहना था कि गाय ही हमें एकत्र ला सकती है. गोमाता हमारी श्रद्धा का सर्वमान्य केंद्र है. गोवंश रक्षा व संवर्धन हेतु समाज के सभी वर्गों को प्रयत्न करना चाहिए . साथ में यह भी अंकित किया है कि पंचगव्य राष्ट्र के सतत विकास का मुख्य आधार है. इस पुस्तक के प्रस्तावना में तात्कालिक सह – सरकार्यवाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, श्री सुरेश जोशी ने लिखा है कि गोवंश वध बंदी यही इस संकट से उबारने का एक मात्र उपाय है.
इस पुस्तक के प्रस्तावना में तात्कालिक सह – सरकार्यवाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, श्री सुरेश जोशी ने लिखा है कि गोवंश वध बंदी यही इस संकट से उबारने का एक मात्र उपाय है. यह केवल आस्था का विषय नहीं है. पिछले 50 वषों से गोरक्षा के नाम पर क्या चल रहा है, इसे भी देखना होगा.
सामाजिक जीवन में जो दिखाई दे रहा है उसमें गोमाता को कसाइयों से बचाने का जोर – शोर से अभियान दिखता है, लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि कसाइयों से गोमाता को बचाने के बाद उनका संरक्षण भी करना है?
उन्हें सीधे गोशालाओं में भेज दिया जाता है जहाँ पहले से ही सुविधा से अधिक गोमाता किसी प्रकार से निवास कर रही होती हैं. उनके लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हो पातीं और अंतत: उनका संवर्धन नहीं हो पाता. कभी – कभी तो कसाई येन – केन – प्रकारेण गोमाताओं को दुबारा छुड़ा ले जाते हैं. यह दर्द भरी घटना सम्पूर्ण भारत वर्ष की है. गोमाता के इस दर्द और कष्ट पर व्याख्यान देने वाले संतों की भी कमी नहीं है. अपनी गोशाला बनाकर 100 – 200 गोमाताओं का संवर्धन कर अपनी पीठ स्वयं थपथपाने वालों की भी कमी नहीं है. उन सभी को मेरा साधुवाद, क्योकि कुछ तो किया।
इसी के बिच तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित एक संगठन पंचगव्य विद्यापीठम को मैं पिछले 10 वषों से देख रहा हू. उसके किया – कलापों पर ध्यान रख रहा हू. अंतत: मेरा मन और दिल वहां केंद्रित हो गया और अब समझ बन गई कि श्री गोलवलकर गुरुजी गोमाता को जैसी प्रतिष्ठा भारत में दिलाना चाहते थे, वही कार्य यह संस्था कर रही है. इस कार्य में काफी ऊचाई तक सफलता भी मिली है. 23 प्रदेशों में इनका नेटवर्क के साथ विस्तार केंद्र भी है, जहाँ गोमाता के विज्ञानं की शिक्षा दी जा रही है. साथ ही, 11 भाषाओं में गोमाता के अद्भतु विज्ञानं की शिक्षा उपलब्ध कराई है. 6000 से ज्यादा कार्यकर्ता तैयार किये हैं, जिन्हे गव्यसिद्ध बुलाते हैं. छोटे – छोटे इनकी सैकड़ों गोशालाएं हैं. सभी गोशालाएं स्वावलंबी व्यवस्था में संचालित हैं. सभी में शुद्ध देशी नस्ल की गोमाताएँ हैं. उसी गोशालाओं से उन गव्यसिसद्धों का परिवार भी चल रहा है.
इन विषयो पर मैंने गहराई से अध्ययन ककया है कि यह सब कैसे हुआ? गाय और भारत के युवा कैसे स्वावलंबी हुए? इसके कुछ बिंदु इस प्रकार हैं-
1) गोमाता के वास्तविक ज्ञान – विज्ञानं को समझा और उपयोग किया.
2) वेदों से गोमाता वाले वैज्ञानिक सन्दर्भ नि काले और कियान्वयन किया .
3) गोमाता के गव्यों से चिकित्सा का एक बड़ा पादयक्रम और प्रकल्प खड़ा किया.
4) गोमाता के गव्यों से स्वरोजगार – ग्रामरोजगार का राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक कार्य किया.
5) भारत के युवाओं को गोमाता के विज्ञानं से आर्थिक आधार पर जोड़ा, क्योंकि आज का समय शुभ – लाभ का है.
6) वर्तमान भारत की सभी समस्याओं का समाधान गोमाता से खोज निकाला और उसका क्रियान्वयन किया .
7) भारत के सभी मंत्रालयों में गोमाता को स्थापित करने के लिए उनके उपयोग को निर्धारित किया है.
8) सभी जाति और धर्मो के लोगों को गोमाता से लाभ मिले , इसे सुनिश्चित किया है.
9) गव्यसिद्ध हिन्दू ,सिक्ख, जैन के अलावा इसाई और मुसलमान भी बहुतेरे हैं, जिन्होंने स्वावलंबी गोशालाएं स्थापित की है.
10) मनुष्य जीवन में गोमाता को हर मोड़ पर उपयोगी और आर्थिक रूप से भी लाभकारी सिद्ध किया है.
11) वैज्ञाचनक दृष्टिकोण से प्रमाणित कर दिया है कि स्वयं पृथ्वी और उसके पर्यावरण की रक्षा केवल गोमाता से ही हो सकती है.
ऐसे और भी विषय हैं, जिस पर प्रकाश डाला जा सकता है. इस संक्षिप्त पत्र में, मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि इन्हीं कारणों से मैं स्वयं को इस संस्थान का उपकुलपति बनाने पर गौरवांवित हो रहा हूँ.
गव्यसिद्ध डॉ. कमल टावरी IAS (R)(भूतपूर्व सचिव, भारत सरकार उपकुलपति पंचगव्य विद्यापीठम , कांचीपुरम )
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www.panchvidya.org

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