मैं हूं सशक्त सीता स्वयंपूर्णा

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अंशु सारडा'अन्वि'
अंशु सारडा’अन्वि’
मेरी टेबल पर गरिमा श्रीवास्तव द्वारा लिखी किताब ‘देह ही देश’ रखी है, जो आज ही लाई गई है और सामने ही टी.वी. पर कर्नाटक विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ विधायक के. आर. रमेश कुमार के ‘रेप को इंजॉय करो’ वाले विवादित बयान का समाचार चल रहा है। कर्नाटक विधानसभा के पूर्व और वर्तमान स्पीकरो़ के बीच हुए इस अनर्गल, आपत्तिजनक, अशोभनीय, असंवेदनशील वार्तालाप को सुनकर उस टी.वी. को बंद करने का साहस भी नहीं रहा। और टेबल पर रखी किताब, जिसे अभी तक खोलने का साहस भी नहीं कर पाई हूं क्योंकि  किताब का शीर्षक भी इतना ज्वलंत है कि इसको पढ़ने का साहस भी है कैसे कर पाऊंगी यह सोचती हूं। इसके अंदर की सच्चाई जरूर एक तार के शरीर पर चुभने की भांति हर जगह चुभती रहेगी। तार चुभने की बात से याद आया कि आज सुबह ही जब अपने बालकनी के फूल-पौधों को कबूतरों के अवांछनीय  और अनाधिकृत तरीके से घुसकर खराब करने से बचाने के लिए वहां तार बांध रही थी तो सदाबहार के खिले फूलों में वह तार उलझ गया और मेरी आह ही निकल गई। बड़े ही धीरे से उन फूलों को बचाकर उस तार को बाहर निकाला। जरूर फूलों को उस तार के चुभने से दर्द हुआ होगा। वैसा ही दर्द हर उस स्त्री को भी हुआ होगा जिसने उन तथाकथित नेताजी की इन बातों को सुना होगा। शायद उन दोनों ही को मैं न तो सुनना, न देखना और न पढ़ना चाह रही थी क्योंकि मैं एक स्त्री हूं, संबंद्ध हो या नहीं हो, कहीं तो भीतर कुछ टूटने लग जाता है इन सब से। पुरुष होती तो क्या पता इन बातों को उन तथाकथित नेता जी के समान रस घोल के पी लेती। पर इन सब से नजरें बचाने के उपक्रम में उठकर गैस पर चढ़े खाने को संभालने चली गई। एक आग सामने जल रही थी, कुछ पक रहा था, खुशबू भी आ रही थी और एक आग जलने का एहसास हो रहा था भीतर में। स्त्री होने का सच जल रहा था कहीं भीतर।
         शायद इन बातों का अंत यहीं तक नहीं था। सीबीएसई बोर्ड के दसवीं कक्षा के अंग्रेजी विषय के पेपर में  आया हुआ पैराग्राफ भी इसी के साथ झटक से स्मृति में आ गया। जिसका सार कुछ इस तरह से था कि पत्नी को पति की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना चाहिए। बच्चे और नौकर अनुशासित नहीं है क्योंकि पत्नियों ने अपने पतियों की बात माननी बंद कर दी है। महिलाओं की स्वतंत्रता ने बच्चों पर माता-पिता के अधिकार को समाप्त कर दिया है और पति के तौर-तरीके को स्वीकार करके ही एक मां खुद से छोटों से सम्मान पा सकती है। महिलाओं को स्वतंत्रता मिलना सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं का प्रमुख कारण है। क्या गलत है इसमें, कुछ भी गलत नहीं लिखा है यहां। इसलिए नहीं है क्योंकि हमारा और हमारे समाज का जो माइंड सेट है वह यही कहता है। यहां में पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग करके नहीं देख रही हूं और न ही उनके विचारों को अलग कर रही हूं। हमारे देश की, समाज की पिछले कुछ शताब्दियों से जो बुनावट है उसके अनुसार यही सच है। चूंकि हम अपना माइंड सेट न तो बदलने को तैयार होते हैं और न ही इस परिवर्तन को स्वीकार कर पाते हैं। यह तो मात्र एक पैराग्राफ है जिसे विवादों के कारण सीबीएसई ने  वापस ले लिया, पर क्या वह  समाज के उस माइंड सेट में परिवर्तन ला सकेगी, जिसमें वाकई बदलाव की जरूरत है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो कि परिवर्तन को स्वीकार कर पाते हैं और जो कर भी लेते हैं, वे कहीं न कहीं, कभी न कभी उपरोक्त पैराग्राफ से अपनी रजामंदी जाहिर भी कर ही जाते हैं। जो शेष ऐसा नहीं करते हैं  वे कुछ ज्यादा ही संवेदनशील और स्त्रीवादी करार दिए जाते हैं।
         दरअसल यह स्त्री देह मिलना ही उसके लिए एक गुनाह बन जाता है क्योंकि शोषण का रास्ता भी तो यहीं से शुरू होता है। स्त्री सशक्तिकरण  शब्द का अर्थ सिर्फ बाहर जाकर विमान उड़ाना, गाड़ियां चलाना, पबों-बार में जाना, सिगरेट के छल्ले उड़ाना या कपड़ों की आजादी नहीं। ये सब तो वह है जो कि पुरुष खुद भी चाहता है। यह उस सोच से आजादी होती है जो कि स्त्री को पुरुष के बराबर आने के लिए यह सब करने को कहे और उनसे नीचे पायदान पर रहने के लिए उन्हें यह सब सहने को कहे। स्त्री को स्त्री रूप में ही स्वीकार करना और उसकी निजता, उसकी पीड़ा, उसकी सफलता-असफलता, उसके निर्णयों,  उसकी अभिव्यक्ति, उसके सम्मान को जस का तस स्वीकार कर लेना अधिक जरूरी है। उसकी जिंदगी में भी खूबसूरती होती है, तल्खियां भी होती हैं, उसका अपना रचना संसार होता है। जिसको वह खुद संजो  भी सकती है और बांट भी सकती है। इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि वह एकाकी होना चाहती है, नहीं।
         ऐसा नहीं है कि बदलाव नहीं आया है, बदलाव आया भी है और स्वीकार्य भी है। पर बहुत धीमे-धीमे। हम बहुत पढ़े-लिखे वर्ग की या उच्च पदस्थ नौकरशाही की बात छोड़ दें तो हम पाएंगे कि आज महिला अपने इर्द-गिर्द बने घेरों से बाहर जरूर निकल रही है और वर्तमान में महिलाओं में आत्मविश्वास की भी बढ़ोतरी हुई है, यह तो हम देख ही रहे हैं , और देखेंगे भी कि भविष्य में महिलाएं और अधिक तेजी से अन्य पदों पर और अन्य कार्य क्षेत्रों में आगे आएंगी। उनकी  सहभागिता के बढ़ते प्रतिशत से दहशत में आए पुरुषों के एक वर्ग की यह तो फितरत ही रही है स्त्रियों को पीछे धकियाने की जो कि आज भी बड़े प्रतिशत में समाज पर हावी है। यह एक अच्छी बात है कि लड़कियों की विवाह की उम्र बढ़ाकर 18 से 21 वर्ष कर दी गई है पर यह बदलाव तो समाज के प्रचलन में काफी समय से आने भी लग गया था और समाज उसे स्वीकार भी करने लग रहा था। हां, शादी का अनिवार्य पंजीकरण जरूर स्वागत योग्य कदम है।  महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में खुद ब खुद आगे बढ़ रही हैं ऐसे में शादी की उम्र पहले से ही आगे बढ़ चुकी है। बस आवश्यकता है उस माइंड सेट को तोड़ने की  कि जो महिलाएं घरों से निकलती हैं वे सार्वजनिक वस्तु बन जाती हैं। वे न तो सार्वजनिक वस्तु हैं और न ही किसी की निजी वस्तु। नजरिए में बदलाव की आवश्यकता है और अंत में महिला रचनाकार उषा किरण खान जी की पंक्तियां……
         “मैं नहीं हूं पाषाणी अहिल्या
          वातभक्षा निराहारा
          जिनका किया आपने उद्धार
          मिलाया स्वामी गौतम से
           मैं हूं सशक्त सीता स्वयंपूर्णा
           बाल्मीकि आश्रम वाली
           साग- पात तोड़ती 
           सुपुष्ट।”
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