ऑस्ट्रेलिया में भी सामने आया ग्रूमिंग गैंग का मामला
कैसे रोकी गई ये संगठित आपराधिक प्रवृत्ति
समग्र समाचार सेवा
सिडनी, 17 जुलाई 2025 – लंबे समय तक ब्रिटेन में ‘ग्रूमिंग गैंग’ को लेकर चली बहस अब ऑस्ट्रेलिया तक पहुँच चुकी है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह उजागर हुआ कि ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे संगठित यौन अपराधी गिरोह सक्रिय रहे, जिन्होंने कई नाबालिग लड़कियों को अपना शिकार बनाया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये घटनाएं मुख्य रूप से सिडनी और उसके उपनगरों में सामने आईं। अधिकांश पीड़िताएं सामान्य ऑस्ट्रेलियाई मूल की किशोर लड़कियां थीं, जिनमें से कई की उम्र 13 वर्ष तक की थी। ये गिरोह पहले इन लड़कियों से दोस्ती करते थे, फिर उन्हें नशीले पदार्थों के जरिए अपने नियंत्रण में लेते और यौन शोषण का शिकार बनाते।
आरोपित कौन थे?
सरकारी और न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, जिन लोगों पर ये आरोप लगे, उनमें बड़ी संख्या में लेबनानी मुस्लिम पुरुष शामिल थे। कुछ मामलों में पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष भी शामिल पाए गए। 2000 के दशक की शुरुआत में जब यह मामला पहली बार सिडनी में सामने आया, तो समाज और प्रशासन के बीच असहजता का माहौल बन गया।
प्रमुख मामला: बिलाल स्काफ गैंग
इस प्रकरण का सबसे प्रमुख चेहरा बना बिलाल स्काफ नामक युवक, जो सिडनी के एक गिरोह का सरगना था। 2001 में बिलाल स्काफ और उसके साथियों पर आरोप सिद्ध हुए, और उन्हें कठोर सजा सुनाई गई। कुछ को 55 साल तक की जेल भी हुई। यह फैसला ऑस्ट्रेलियाई न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है।
पुलिस की भूमिका
जांच एजेंसियों ने शुरुआत में सामाजिक दबाव और राजनीतिक सहीता के चलते मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया, लेकिन जैसे-जैसे पीड़िताओं की गवाही सामने आई, पुलिस को मजबूरन कार्रवाई करनी पड़ी। न्यू साउथ वेल्स पुलिस ने विशेष जांच टीम बनाई और व्यापक स्तर पर गिरफ्तारी की गई।
मीडिया की भूमिका और आलोचना
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया पर भी यह आरोप लगा कि उन्होंने शुरू में इन मामलों को गंभीरता से नहीं लिया। मुख्यधारा के कई चैनलों और अखबारों ने इस पर रिपोर्टिंग करने से परहेज किया, जिससे पीड़िताओं को न्याय मिलने में देर हुई। हालांकि, स्वतंत्र पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया संस्थानों ने मामले को उठाया, जिससे दबाव बना और सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा।
निष्कर्ष:
ग्रूमिंग गैंग की ये घटनाएं केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी हैं। यह घटना बताती है कि किसी भी समाज में यदि अपराध की पहचान धर्म या नस्ल के डर से रोकी जाती है, तो इससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है और पीड़िताओं का न्याय कमजोर पड़ता है ।