समग्र समाचार सेवा
लंदन, 17 जुलाई : भारत की आध्यात्मिक परंपरा ने आज एक और ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया, जब ब्रिटिश संसद के पवित्र कक्ष में पहली बार हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। यह अवसर था बागेश्वर धाम सरकार के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ऐतिहासिक ब्रिटेन यात्रा का, जिसमें उन्होंने न केवल भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया, बल्कि सनातन धर्म के मूल्यों को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया।
यह अभूतपूर्व घटना ब्रिटेन की संसद में आयोजित विशेष ‘फेथ एंड कल्चर’ संवाद सत्र के दौरान हुई, जिसमें ब्रिटिश सांसदों, भारतीय प्रवासी समुदाय और विभिन्न धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। सत्र की शुरुआत पंडित धीरेंद्र शास्त्री द्वारा बजरंगबली की स्तुति से हुई, जिसके बाद पूरे सदन में हनुमान चालीसा का समवेत उच्चारण गूँज उठा। ब्रिटिश संसद के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी हिंदू संत ने वहां धार्मिक पाठ किया।
कार्यक्रम के दौरान पंडित शास्त्री ने कहा,
“ये हनुमान चालीसा सिर्फ एक पाठ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है, जो आज लंदन की संसद में गूँज रही है। यह दर्शाता है कि हमारी संस्कृति सीमाओं में नहीं बंधी, बल्कि दुनिया को जोड़ने वाली शक्ति है।”
इस आयोजन को भारतीय मूल के सांसद नवीन शाह और विरेंद्र शर्मा ने विशेष सहयोग दिया। दोनों सांसदों ने कहा कि यह अवसर भारतीय मूल के नागरिकों के लिए गर्व का क्षण है।
ब्रिटिश संसद में उपस्थित लोगों ने भी इस आध्यात्मिक क्षण का भावपूर्ण स्वागत किया। संसद के कई गैर-भारतीय सदस्यों ने हनुमान चालीसा के शब्दों की भावना को सराहा और इसे भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक गहराई से जोड़कर देखा।
धीरेंद्र शास्त्री की यह यात्रा भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। वे इस यात्रा में लंदन के अन्य प्रमुख स्थलों पर भी प्रवचन व हनुमत कथा कर रहे हैं, जिनमें हज़ारों की संख्या में प्रवासी भारतीय और विदेशी श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
ध्यान देने योग्य है कि बागेश्वर धाम सरकार के नाम से प्रसिद्ध पंडित धीरेंद्र शास्त्री न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपने आध्यात्मिक विचारों और दिव्य दरबार के लिए विख्यात हो चुके हैं। लंदन में हनुमान चालीसा का पाठ उनके प्रयासों से हिंदू संस्कृति के वैश्विक प्रचार की दिशा में एक ऐतिहासिक अध्याय जोड़ता है।
यह क्षण न केवल सनातन संस्कृति की विश्वव्यापी स्वीकार्यता का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि भारतीय आध्यात्मिकता आज वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।