मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हुए डीके शिवकुमार?

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पूनम शर्मा
कर्नाटक कांग्रेस में उठा राजनीतिक तूफान अब पार्टी नेतृत्व के भी नियंत्रण से बाहर होता दिख रहा है। रामनगर के विधायक इकबाल हुसैन के उस दावे के बाद कि लगभग 100 कांग्रेस विधायक डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, पूरे राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई। इस बयान के बाद से न केवल सिद्धारमैया असहज दिखे, बल्कि खुद डीके शिवकुमार भी दो बार दिल्ली का दौरा कर चुके हैं – एक बार ठीक उस दिन जब सिद्धारमैया ने साफ कह दिया कि वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।

दिलचस्प बात यह रही कि दिल्ली से लौटने के बाद, डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी। बल्कि उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें एक “आध्यात्मिक दीक्षा” दी है, जिसे उन्होंने “खुशी से स्वीकार कर लिया है”। यह बयान राजनीतिक रूप से काफी मायने रखता है – क्या डीकेएस अब पीछे हट चुके हैं?

गुटबाज़ी की हदें

कर्नाटक कांग्रेस में गुटबाज़ी अब असहनीय स्तर पर पहुँच  गई है। पिछले सप्ताह मैसूरु में आयोजित ‘साधना समावेश’ सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंच से शिवकुमार का नाम तक नहीं लिया, क्योंकि वह बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए थे। यह व्यवहार कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की मौजूदगी में और भी असहज कर देने वाला था। हालांकि डीकेएस ने भी इस सम्मेलन में कांग्रेस की ‘पाँच  गारंटी’ का ज़िक्र करते हुए अपनी भूमिका निभाई और कहा, “हमारी पार्टी एक मंदिर जैसी है। हमारे अच्छे काम देखें और 2028 में हमें आशीर्वाद दें।”

सिद्धारमैया ने एक बयान में यह भी कहा कि डीकेएस को 100 विधायकों का समर्थन प्राप्त नहीं है। इसके जवाब में शिवकुमार ने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा, “मैं कर्नाटक कांग्रेस का अध्यक्ष हूं और वही करता हूं जो पार्टी कहती है। मुख्यमंत्री ने आपके सारे सवालों के जवाब दे दिए हैं।”

पीसीसी अध्यक्ष पद पर केंद्रित साजिश?

अब ऐसा लग रहा है जैसे डीकेएस को न केवल मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर किया गया, बल्कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) पद को भी उनके हाथ से छीनने की कोशिश चल रही है। सिद्धारमैया खेमे ने पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि निकाय चुनावों से पहले डीकेएस को पीसीसी अध्यक्ष पद से हटाया जाए। सिद्धारमैया ने बड़ी चतुराई से ‘मुख्यमंत्री बदलिए’ की लड़ाई को ‘पीसीसी अध्यक्ष बदलिए’ में तब्दील कर दिया है।

इस रणनीति का असर साफ दिखा – डीकेएस अब अपने बयानों में संयम बरत रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री पद पर दिए गए बयान उनके व्यक्तिगत विचार हैं। पार्टी अध्यक्ष होने के नाते मेरा दायित्व संगठन को मजबूत करना है। मैं तभी तक हूं, जब तक पार्टी है। उसके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है।”

चुप्पी की वजह क्या है?

डीकेएस क्यों पीछे हटते दिख रहे हैं, इसका कारण स्पष्ट नहीं है। क्या हाईकमान ने राज्य के विवादों से दूरी बना ली है? राहुल गांधी ने न तो सिद्धारमैया से मुलाकात की, न डीकेएस से, जबकि दोनों कई दिनों तक दिल्ली में जमे रहे। अंततः दोनों नेता केवल कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला से ही मिल सके, जो कर्नाटक के मामलों को देख रहे हैं। कहा जाता है कि सुरजेवाला अक्सर बेंगलुरु जाकर विधायकों के मूड का “आकलन” करते हैं और मुख्यमंत्री को सलाह देते हैं।

हालांकि, डीकेएस ने प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात जरूर की, लेकिन इस मुलाकात के बारे में वह खामोश रहे।

लोकसभा चुनाव की हार का असर

यह भी माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की वोक्कालिगा बहुल सीटों पर खराब प्रदर्शन ने डीकेएस की स्थिति कमजोर कर दी है। वोक्कालिगा क्षेत्रों की 28 सीटों में से 19 सीटें बीजेपी-जेडीएस गठबंधन ने जीत लीं। डीकेएस के भाई डीके सुरेश भी चुनाव हार गए। इस पर एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता एल.एन. मूर्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“अगर कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती, तो डीकेएस मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर सकते थे। अब वे दो साल पहले जीती विधानसभा चुनाव की सफलता के आधार पर यह दावा नहीं कर सकते।”

शायद इसी कारण डीकेएस ने पार्टी लाइन का पालन करते हुए विधायक इकबाल हुसैन को कारण बताओ नोटिस तक जारी कर दिया।

डीके शिवकुमार ने फिलहाल अपनी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पर विराम लगा दिया है। पार्टी के भीतर की रणनीति, हाईकमान की उदासीनता और लोकसभा चुनाव में असफलता ने उनके लिए परिस्थितियां विपरीत बना दी हैं। हालांकि, यह पूरी तरह हार नहीं है। डीकेएस के पास अभी भी संगठन में मजबूत पकड़ है और वह आगे के चुनावों के जरिए फिर से दावा मजबूत कर सकते हैं। परंतु इस समय उन्हें सिद्धारमैया की परछाईं में ही रहना होगा।

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