जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, याचिका खारिज

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए. जी. मसीह की बेंच ने सुनाया फैसला, कहा- जांच कमेटी की सिफारिश संवैधानिक और कानूनी रूप से सही है।

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  • सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने घर से मिले कैश के मामले में ‘इन-हाउस’ जांच को चुनौती दी थी।
  • कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा का आचरण “विश्वास योग्य नहीं है” और उन्होंने जांच प्रक्रिया में शामिल होने के बाद उसकी वैधता पर सवाल उठाया, जो सही नहीं है।
  • इस फैसले से जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 7 अगस्त, 2025 – इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने गुरुवार को उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने आधिकारिक आवास से कैश मिलने के मामले में हुई ‘इन-हाउस’ जांच और उसके निष्कर्षों को चुनौती दी थी। इस मामले ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न सिर्फ जांच प्रक्रिया को सही ठहराया, बल्कि जस्टिस वर्मा के आचरण पर भी कड़ी टिप्पणी की।

क्या है जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला?

यह मामला मार्च 2025 में तब सुर्खियों में आया जब जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहते हुए उनके आधिकारिक आवास पर आग लगने की घटना के बाद, उनके स्टोर रूम से बड़ी मात्रा में अधजले नोटों के बंडल मिले। इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की एक इन-हाउस कमेटी का गठन किया। कमेटी ने 55 गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को ‘दुराचार’ का दोषी ठहराया और निष्कर्ष निकाला कि उन्हें इस नकदी की जानकारी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर मुख्य न्यायाधीश ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग की सिफारिश भेजी थी।

याचिका में क्या तर्क दिए गए थे?

जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपनी याचिका में कई दलीलें दी थीं। उनके वकील कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी ने कहा कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया संवैधानिक नहीं थी और यह ‘जज (जांच) अधिनियम’ के तहत तय प्रक्रिया के खिलाफ है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जांच कमेटी ने जस्टिस वर्मा को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं दिया और रिपोर्ट में गलत निष्कर्ष निकाले गए हैं। याचिका में मुख्य न्यायाधीश की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई सिफारिश को भी असंवैधानिक बताया गया था, क्योंकि यह बिना जस्टिस वर्मा को सुने भेजी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए. जी. मसीह की बेंच ने जस्टिस वर्मा के सभी तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि:

आचरण विश्वास योग्य नहीं: बेंच ने कहा कि जस्टिस वर्मा का आचरण “विश्वास योग्य नहीं है”। उन्होंने पहले जांच प्रक्रिया में हिस्सा लिया और जब रिपोर्ट उनके खिलाफ आई, तब उन्होंने उसकी वैधता को चुनौती दी, जो उचित नहीं है।

जांच प्रक्रिया संवैधानिक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया संवैधानिक है और यह न्यायपालिका की अखंडता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। यह ‘जज (जांच) अधिनियम’ के समांतर नहीं है, बल्कि यह एक प्रारंभिक कदम है।

मुख्य न्यायाधीश की भूमिका: कोर्ट ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सिर्फ ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं है, बल्कि उनके पास न्यायिक कदाचार के मामलों में कार्रवाई करने का अधिकार है। इसलिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सिफारिश भेजना असंवैधानिक नहीं था।

महाभियोग की प्रक्रिया का रास्ता हुआ साफ

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, अब जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है। पहले ही 145 लोकसभा सांसदों और 63 राज्यसभा सांसदों ने उन्हें हटाने के लिए नोटिस दिया था। अगर संसद के दोनों सदन बहुमत से इस प्रस्ताव को पास कर देते हैं, तो जस्टिस वर्मा को उनके पद से हटाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि जस्टिस वर्मा को महाभियोग की कार्यवाही के दौरान अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार होगा।

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