डियर ट्रंप! आधी दुनिया की थाली सँभालता है भारत
ट्रंप की सख्ती! भारतीय चावल पर शुल्क की धमकी, क्या अमेरिका चल पाएगा बिना बासमती के?
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अमेरिका भारतीय बासमती का बड़ा खरीददार, हर वर्ष लाखों टन आयात
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प्रवासी भारतीय और खाड़ी मूल के लोगों की वजह से बासमती की अनिवार्य माँग
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भारत दुनिया के कुल चावल निर्यात में शीर्ष स्थान पर
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शुल्क बढ़ा तो अमेरिका में चावल महँगा और बिरयानी का स्वाद फीका पड़ने का जोखिम
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 9 दिसंबर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर आयात शुल्क बढ़ाने के संकेत देकर वैश्विक खाद्य बाज़ार में हलचल पैदा कर दी है। इस बार निशाना बना है भारत का चावल। ट्रंप का कहना है कि विदेशों से आने वाले कृषि उत्पाद घरेलू किसानों पर दबाव बढ़ाते हैं, इसलिए अतिरिक्त शुल्क लगाने पर विचार हो रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका भारतीय चावल के बिना चल सकता है?
अमेरिकी रसोई में भारतीय चावल क्यों ज़रूरी?
अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीय, पाकिस्तानी और खाड़ी क्षेत्र से आए लाखों परिवार बासमती चावल का नियमित उपयोग करते हैं। बिरयानी हो, पुलाव हो या किसी विशेष अवसर का खाना—इन व्यंजनों में बासमती चावल का स्थान कोई और किस्म नहीं ले सकती।
अमेरिका में उगने वाला चावल मात्रा में ठीक है, पर उसकी खुशबू, लंबाई और पकने के बाद का रूप भारतीय बासमती से बिल्कुल अलग है।
इसी वजह से अमेरिकी बाज़ार में भारतीय चावल की पकड़ बहुत मजबूत है।
भारत क्यों है दुनिया की ‘धान शक्ति’?
भारत लगातार कई वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बना हुआ है।
- बासमती की अनूठी सुगंध
- गैर-बासमती की स्थिर गुणवत्ता
- विशाल उत्पादन क्षमता
- समय पर आपूर्ति
इन गुणों की वजह से पश्चिम एशिया, अफ्रीका, और कई कम संसाधन वाले देश भारत पर निर्भर हैं। अनेक देशों में स्थानीय उत्पादन न के बराबर है, इसलिए भारतीय चावल उनके लिए जीवनरेखा जैसा है।
ट्रंप की चेतावनी का असर क्या होगा?
अगर अमेरिका शुल्क बढ़ाता है, तो सबसे बड़ा बोझ उसी के उपभोक्ताओं पर पड़ेगा—
- चावल महँगा होगा
- प्रवासियों के रोज़मर्रा के भोजन का ख़र्च बढ़ेगा
- बिरयानी जैसे व्यंजनों का स्वाद प्रभावित होगा
- वैश्विक बाज़ार में अस्थिरता बढ़ सकती है
भारत हर वर्ष घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा दुनिया को भेजता है। शुल्क में बदलाव से केवल भारत ही नहीं, उन देशों की थाली भी प्रभावित होगी, जो भारत पर निर्भर हैं।
क्यों कहा जा रहा है कि अमेरिका को ही नुकसान होगा?
क्योंकि विकल्प बहुत सीमित हैं।
पाकिस्तान और थाईलैंड चावल बेचते जरूर हैं, लेकिन भारत जैसी मात्रा और विविधता कोई नहीं दे पाता।
पहले भी साबित हो चुका है जब भारत की आपूर्ति में हल्की सी कमी आती है, दुनिया भर में चावल की कीमतें बढ़ जाती हैं।