जब नेताओं के शब्द दुश्मन का हथियार बन जाएँ

सेना, राजनीति और राष्ट्रीय स्मृति का संकट

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पूनम शर्मा
कभी-कभी किसी देश को सबसे गहरी चोट सीमा पार से नहीं, अपने भीतर से मिलती है। हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में ऐसा ही एक क्षण सामने आया, जब एक बड़े राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चौहान  द्वारा दिया गया बयान पाकिस्तान के टीवी चैनलों की सुर्खी बन गया। बयान था—कि “भारतीय सेना पहले ही दिन हार गई थी।”

यह कोई साधारण राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। यह वह वाक्य था, जिसे पाकिस्तान ने बिना किसी काट-छाँट के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछाल दिया। संयुक्त राष्ट्र से लेकर सोशल मीडिया तक, पाकिस्तान के एंकर यह कहते दिखे—“यह भारत के ही पूर्व मुख्यमंत्री कह रहे हैं।”

सवाल यह नहीं है कि किसी नेता को बोलने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि जब बोलने वाला व्यक्ति संवैधानिक पद पर रह चुका हो, तो क्या उसके शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी नहीं हो जाती?

पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा रणनीति और भारतीय बयान

पाकिस्तान दशकों से एक ही रणनीति अपनाता रहा है—भारत के भीतर से ऐसे बयान ढूँढना, जिन्हें वह “स्वीकारोक्ति” के रूप में पेश कर सके। जब भारत के किसी नेता के शब्द ही उसके दावे की पुष्टि करने लगें, तो उसे झूठ गढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती।

यह समझना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नहीं देखा जाता कि बयान सत्ता पक्ष ने दिया या विपक्ष ने। वहाँ केवल यह दर्ज होता है कि “एक भारतीय नेता” ने क्या कहा। इसी कारण ऐसे बयान केवल घरेलू राजनीति नहीं रहते, वे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन जाते हैं।

सेना सरकार नहीं, राष्ट्र है

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है। लेकिन सेना सरकार नहीं होती। सेना राष्ट्र की सामूहिक आत्मा होती है—वह संस्था, जो राजनीति से ऊपर रहकर सीमा पर खड़ी रहती है।

भारतीय संविधान नागरिक नियंत्रण की बात करता है, लेकिन वह सेना के मनोबल को सार्वजनिक रूप से तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं देता। अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर अनुच्छेद 19(2) उसी स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के हित में सीमाएँ भी तय करता है।

यह संतुलन जानबूझकर रखा गया था—ताकि लोकतंत्र जीवित रहे, लेकिन राष्ट्र कमजोर न पड़े।

इतिहास की भूलें और शब्दों की कीमत

भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि सैन्य मामलों में राजनीतिक अपरिपक्वता कितनी महंगी पड़ सकती है। नेहरू का यह कहना कि “हमें फौज की ज़रूरत नहीं, हम शांति-प्रिय देश हैं”—1962 में जवानों ने उसकी कीमत चुकाई।

1971 में भारत ने युद्ध मैदान में पाकिस्तान को निर्णायक रूप से हराया, लेकिन शिमला समझौते की मेज़ पर उस विजय का पूरा लाभ नहीं लिया गया। युद्धबंदी, कब्ज़ाए गए क्षेत्र—सब कुछ होते हुए भी भारत ने रणनीतिक दबाव बनाए रखने का अवसर खो दिया। इतिहास यह बताता है कि युद्ध केवल सीमा पर नहीं हारे या जीते जाते, वे फैसलों और बयानों से भी तय होते हैं।

कांग्रेस की परंपरा और सैन्य असहजता

आलोचकों का तर्क है कि कांग्रेस नेतृत्व और सैन्य मामलों के बीच एक ऐतिहासिक असहजता रही है। चाहे 1962 हो, 1971 के बाद के निर्णय हों, या बाद के वर्षों में रक्षा सौदों से जुड़े विवाद—बार-बार यह प्रश्न उठा कि क्या राजनीतिक नेतृत्व ने सेना के आत्मसम्मान और रणनीतिक हितों को पर्याप्त प्राथमिकता दी।

आज जब उसी परंपरा से जुड़े नेता सेना की “हार” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो यह केवल एक बयान नहीं रह जाता—यह उस ऐतिहासिक अविश्वास को फिर से जीवित कर देता है।

शहादत की स्मृति और राजनीतिक लापरवाही

2013 में शहीद लांस नायक हेमराज का सिर काटकर ले जाने की घटना आज भी देश की सामूहिक स्मृति में दर्ज है। वह केवल एक आतंकी वारदात नहीं थी, वह भारतीय सेना के सम्मान पर सीधा हमला था। ऐसे उदाहरण यह याद दिलाते हैं कि सीमा पर खड़ा जवान किस मानसिक दबाव में काम करता है। जब वही जवान टीवी पर यह सुनता है कि देश के बड़े नेता उसकी सेना को “पहले दिन हारी हुई” बता रहे हैं, तो यह केवल राजनीतिक बहस नहीं रहती—यह मनोबल पर चोट बन जाती है।

लोकतंत्र में बोलने की नहीं, सोचने की जिम्मेदारी

लोकतंत्र केवल बोलने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सोचने की जिम्मेदारी भी देता है—विशेषकर उन्हें, जो कभी मुख्यमंत्री, मंत्री या बड़े संवैधानिक पदों पर रह चुके हों। उनके शब्द साधारण नागरिक के शब्द नहीं होते। वे इतिहास में दर्ज होते हैं, दुश्मन के नैरेटिव में शामिल होते हैं और कभी-कभी देश के खिलाफ सबूत बन जाते हैं।

शब्द  भी राष्ट्रीय संपत्ति हैं

राष्ट्र केवल जमीन, झंडे और हथियारों से नहीं बनता। वह शब्दों से भी बनता है—और शब्दों से ही टूटता भी है। जब राजनीतिक बयानबाज़ी राष्ट्रहित से ऊपर व्यक्तिगत या दलगत आक्रोश को रख दे, तो लोकतंत्र मजबूत नहीं होता—कमजोर होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत की राजनीति कम से कम एक बुनियादी सहमति पर पहुँचे—कि सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय चुनावी हथियार नहीं, राष्ट्रीय मर्यादा हैं। क्योंकि युद्ध के समय जवान सीमा की रक्षा करता है, लेकिन शांति के समय राष्ट्र की रक्षा नेताओं के शब्द करते हैं।

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