RSS को BJP के चश्मे से न देखने की अपील: एक गहन विश्लेषण

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पूनम शर्मा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह बयान कि “RSS को BJP के चश्मे से देखना बड़ी भूल होगी”, भारतीय राजनीति और समाज के मौजूदा विमर्श में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब RSS और BJP को अक्सर एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है, चाहे वह राजनीतिक आलोचक हों या समर्थक। भागवत का यह कथन न केवल संघ की वैचारिक स्वतंत्रता को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि RSS अपनी पहचान को केवल सत्ता या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं मानता।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि RSS स्वयं को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, न कि एक राजनीतिक दल के रूप में। मोहन भागवत ने इसी बात को दोहराते हुए कहा कि संघ को भाजपा या उसकी गतिविधियों के आधार पर समझना गलत होगा। यह कथन दरअसल उस आम धारणा को चुनौती देता है, जिसमें संघ को भाजपा की “मदर ऑर्गेनाइजेशन” मान लिया जाता है। भागवत का जोर इस बात पर है कि संघ की भूमिका और उद्देश्य दीर्घकालिक सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जुड़े हैं, न कि तत्काल राजनीतिक लाभ से।

उनका यह कहना कि RSS कोई “प्रेशर ग्रुप” नहीं बनना चाहता, बल्कि पूरे हिंदू समाज को संगठित करना उसका लक्ष्य है, संघ की आत्म-परिभाषा को स्पष्ट करता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि “हिंदू समाज को संगठित करना” एक व्यापक और जटिल विचार है, जिसकी व्याख्या अलग-अलग लोग अलग तरीके से करते हैं। समर्थकों के लिए यह सांस्कृतिक एकता और आत्मगौरव का प्रश्न है, जबकि आलोचकों के लिए इसमें बहुलतावाद और अल्पसंख्यक चिंताओं से जुड़ी आशंकाएं भी शामिल हैं।

भागवत ने RSS को किसी भी तरह की “पैरामिलिट्री संस्था” मानने से भी इनकार किया। उन्होंने कहा कि संघ की वर्दी, शाखाएं, मार्च और दंड (लाठी) अभ्यास को यदि सैन्य या अर्धसैनिक प्रशिक्षण की तरह देखा जाए, तो यह गलतफहमी होगी। यह बयान खास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RSS पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह एक संगठित, अनुशासित और सैन्य ढांचे जैसी संरचना वाला संगठन है। भागवत का तर्क है कि ये गतिविधियां अनुशासन, शारीरिक स्वास्थ्य और सामूहिकता के लिए हैं, न कि हिंसा या टकराव के लिए।

अपने भाषण में उन्होंने इतिहास का भी संदर्भ दिया—ब्रिटिश शासन से लेकर आज़ादी के बाद तक RSS को विरोध, दबाव और हमलों का सामना करना पड़ा। यह कथन संघ की उस पीड़ित-छवि (victim narrative) को सामने लाता है, जिसे RSS अक्सर अपने संघर्षों और अस्तित्व की कहानी के रूप में प्रस्तुत करता है। “मानसिक गुलामी” का जिक्र करते हुए भागवत ने एक बार फिर उस विचारधारा को दोहराया, जिसमें सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और पश्चिमी प्रभाव से मुक्ति की बात की जाती है। यह विचार RSS के मूल दर्शन से मेल खाता है, जहां भारत की सांस्कृतिक पहचान को सर्वोपरि माना जाता है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भागवत का यह बयान भाजपा के लिए भी एक संदेश हो सकता है। भले ही संघ और भाजपा के बीच वैचारिक निकटता हो, लेकिन संघ यह स्पष्ट करना चाहता है कि उसकी भूमिका केवल सत्ता की राजनीति तक सीमित नहीं है। इससे भाजपा को भी यह संकेत मिलता है कि संघ का एजेंडा दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा है, जो हमेशा तत्काल राजनीतिक रणनीतियों से मेल खाए, यह जरूरी नहीं।

वहीं दूसरी ओर, आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि व्यवहारिक स्तर पर RSS और BJP की दूरी कितनी वास्तविक है। संगठनात्मक नेटवर्क, कार्यकर्ताओं की आवाजाही और वैचारिक समानताओं के कारण दोनों को पूरी तरह अलग मानना कई लोगों को कठिन लगता है। ऐसे में भागवत का बयान एक आदर्श स्थिति (ideal position) को दर्शाता है, जबकि ज़मीनी हकीकत कहीं अधिक जटिल है।

अंततः, मोहन भागवत का यह वक्तव्य RSS की छवि-निर्माण की एक कोशिश भी माना जा सकता है—खासकर युवाओं और शहरी मध्यम वर्ग के बीच, जिनके मन में संघ को लेकर कई तरह की धारणाएं हैं। उन्होंने गर्व, एकता और निःस्वार्थ भाव से देश के भविष्य को बदलने की बात की, जो किसी भी सामाजिक आंदोलन के लिए प्रेरक संदेश हो सकता है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि RSS को BJP के चश्मे से न देखने की अपील केवल एक बयान नहीं, बल्कि संघ की वैचारिक स्वतंत्रता, दीर्घकालिक दृष्टि और आत्म-परिभाषा को दोबारा स्थापित करने का प्रयास है। यह बयान भारतीय राजनीति और समाज में RSS की भूमिका पर चल रही बहस को और गहरा करता है, और यह सवाल छोड़ता है कि विचार और व्यवहार के बीच की दूरी को संघ और उसका राजनीतिक परिवेश किस हद तक पाट पाते हैं।

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