कांग्रेस की राजनीति : वैचारिक दिवालियापन और खतरनाक नैरेटिव

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पूनम शर्मा
वेनेजुएला तुलना और कांग्रेस की खतरनाक मानसिकता

वेनेजुएला संकट पर पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान का बयान किसी सामान्य राजनीतिक आलोचना का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर पनप रही एक खतरनाक मानसिकता को उजागर करता है। जब कोई नेता यह प्रश्न उठाता है कि “क्या भारत में भी वेनेजुएला जैसी स्थिति बन सकती है”, तो वह केवल सरकार पर सवाल नहीं उठा रहा होता, बल्कि देश की संस्थाओं, सेना और लोकतांत्रिक ढांचे पर अविश्वास पैदा कर रहा होता है।

भारत और वेनेजुएला की तुलना तथ्यात्मक रूप से भी और वैचारिक रूप से भी गलत है। भारत एक मजबूत संवैधानिक लोकतंत्र है, जहां सत्ता परिवर्तन केवल चुनाव के माध्यम से होता है। ऐसी तुलना यह संकेत देती है कि कांग्रेस के कुछ नेता भारत को जानबूझकर अस्थिर और कमजोर राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, ताकि अपनी राजनीतिक विफलताओं को ढक सकें। यह आलोचना नहीं, बल्कि राजनीतिक हताशा से उपजी खतरनाक कल्पना है।

 नेतृत्व संकट, चापलूसी गैंग और संगठनात्मक पतन

कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या आज उसका नेतृत्व संकट है। पार्टी के भीतर राहुल गांधी के इर्द-गिर्द एक ऐसा समूह खड़ा हो चुका है जो न चुनाव जीत सकता है, न संगठन खड़ा कर सकता है, बल्कि केवल बयानबाज़ी और नैरेटिव गढ़ने में माहिर है। इस “चापलूसी गैंग” में शामिल नेता इस प्रतिस्पर्धा में रहते हैं कि कौन प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अधिक तीखा बयान देगा और कौन भारत की स्थिति को अधिक भयावह बताकर सुर्खियां बटोरेगा।

पृथ्वीराज चौहान जैसे नेता इसी गिरावट का उदाहरण हैं। न महाराष्ट्र में उनका राजनीतिक वजन बचा है, न संगठन में प्रभाव, लेकिन दिल्ली की राजनीति में बने रहने के लिए ऐसे बयान देना उनके लिए अस्तित्व की राजनीति बन चुका है। यही कारण है कि कांग्रेस में भीतर ही भीतर एक नया गुट बन रहा है, जो राहुल गांधी और उनकी टीम के खिलाफ असंतोष जता रहा है। यह आंतरिक संघर्ष कांग्रेस के संगठनात्मक पतन को और तेज कर रहा है।

 क्षेत्रीय पराजय, न्यायिक राजनीति और विपक्ष की हताशा

राज्य स्तर पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की स्थिति और भी चिंताजनक है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल—हर जगह विपक्ष सत्ता से दूर नजर आता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस द्वारा मतदाता सूची को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख करना यह दर्शाता है कि अब विपक्ष जनादेश के बजाय न्यायिक रास्तों से राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है।

58 लाख नाम हटाने का दावा गंभीर है, लेकिन यह भी सच है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण एक संवैधानिक प्रक्रिया है। जब चुनावी मैदान में आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है, तब विरोध सड़क से कोर्ट तक पहुंचता है। ममता बनर्जी की राजनीति भी इसी हताशा को दर्शाती है—जहां एक ओर लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी समर्थन लगातार खिसकता जा रहा है।

निष्कर्ष

कांग्रेस आज वैचारिक भ्रम, नेतृत्व विफलता और राजनीतिक निराशा के चक्र में फंसी हुई है। जब तक वह आत्ममंथन कर यह नहीं समझती कि सरकार की आलोचना और देश को कमजोर दिखाने में फर्क होता है, तब तक ऐसे विवादित बयान सामने आते रहेंगे। असली सवाल यह नहीं है कि भारत वेनेजुएला बनेगा या नहीं—असली सवाल यह है कि कांग्रेस कब अपनी राजनीतिक सच्चाई स्वीकार करेगी और जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएगी।

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