पेसा नियमावली से जनजातीय स्वशासन को कमजोर किया गया : अर्जुन मुंडा
पेसा नियमावली से आदिवासी पहचान को खतरा : अर्जुन मुंडा
-
पेसा अधिनियम की मूल भावना से विचलन का आरोप
-
ग्राम सभा की परिभाषा अस्पष्ट करने पर आपत्ति
-
जनजातीय स्वशासन व्यवस्था कमजोर होने की चेतावनी
-
पाँचवीं अनुसूची राज्य में असंवेदनशील निर्णय का दावा
समग्र समाचार सेवा
रांची |07 जनवरी: झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित पेसा नियमावली को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने हेमंत सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि यह नियमावली पेसा अधिनियम उन्नीस सौ छियानवे की मूल भावना के अनुरूप नहीं है और इससे जनजातीय समाज के अधिकारों को गहरी चोट पहुंची है।
लंबे इंतज़ार के बाद भी समाधान नहीं
अर्जुन मुंडा ने कहा कि झारखंड में पेसा नियमावली लागू करने की मांग वर्षों से उठती रही। कई लोगों को न्यायालय का सहारा लेना पड़ा, तब जाकर सरकार ने कैबिनेट से नियमावली पारित कर अधिसूचना जारी की। लेकिन इतने लंबे इंतज़ार के बाद भी जो नियमावली सामने आई, वह जनजातीय स्वशासन की मूल अवधारणा को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करती नजर आती है।
सीमाओं से बाहर गई राज्य सरकार
उन्होंने कहा कि पेसा अधिनियम राज्य सरकार को केवल क्रियान्वयन की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का अधिकार देता है। अधिनियम की मूल संरचना और आत्मा में बदलाव करने का अधिकार किसी भी सरकार के पास नहीं है। इसके बावजूद झारखंड सरकार ने ग्राम सभा की भूमिका और स्वरूप के साथ छेड़छाड़ की है।
ग्राम सभा की अवधारणा पर प्रश्न
अर्जुन मुंडा ने कहा कि किसी भी कानून की दिशा उसकी परिभाषाओं से तय होती है। पेसा अधिनियम में ग्राम सभा को परंपरागत व्यवस्था, रूढ़िजन्य विधि और सामाजिक प्रथाओं से जोड़ा गया है, जो जनजातीय समाज की पहचान का आधार है। राज्य सरकार की नियमावली में परंपरा शब्द का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन उसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं दी गई, जिससे भ्रम और विवाद की स्थिति बन सकती है।
अन्य राज्यों से अलग रास्ता
उन्होंने कहा कि देश के जिन अन्य नौ राज्यों में पेसा अधिनियम लागू है, वहां ग्राम सभा की परिभाषा अधिनियम के अनुरूप ही रखी गई है। झारखंड ही ऐसा राज्य है, जहां इसकी आत्मा को कमजोर करने का प्रयास किया गया है। इसका असर भविष्य में प्रशासनिक फैसलों और सामाजिक संतुलन पर पड़ेगा।
खोखली और जोखिम भरी नियमावली
अर्जुन मुंडा ने कहा कि यह नियमावली आकार में भले ही विस्तृत हो, लेकिन इसके भाव और उद्देश्य जनजातीय हितों के अनुरूप नहीं हैं। इससे प्रशासन को मनमानी की छूट मिलेगी और जनजातीय स्वशासन की संस्थागत व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान को बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। जैसे किसी व्यक्ति की पहचान उसके परिवार से जुड़ी होती है, वैसे ही जनजातीय समाज की पहचान उसकी परंपराओं और स्वशासन प्रणाली से जुड़ी होती है।
संवेदनशीलता की आवश्यकता
अर्जुन मुंडा ने कहा कि पाँचवीं अनुसूची वाले राज्य में सरकार को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने चाहिए थे, लेकिन इस मामले में झारखंड सरकार असफल रही है। यह नियमावली जनजातीय समाज के हितों के विपरीत है और आने वाले समय में गंभीर सामाजिक व प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी कर सकती है।
प्रेसवार्ता में प्रदेश महामंत्री एवं सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा, मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, सह मीडिया प्रभारी अशोक बड़ाइक एवं प्रवक्ता राफिया नाज़ भी मौजूद रहे।