क्या भारत ईरान–अफगानिस्तान की राह पर बढ़ रहा है ?

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पूनम शर्मा
यह सवाल आज अचानक नहीं उठा है। यह सवाल उन घटनाओं से जन्म ले रहा है, जो हमारे सामने, दिनदहाड़े, कैमरों के सामने, और पुलिस की मौजूदगी में घट रही हैं। हाल की घटना—पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के बेलडांगा में—इस बेचैनी को और गहरा कर देती है।

जी 24 घंटे की महिला पत्रकार सोमा मैती पर दिन के उजाले में हमला किया गया। उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया, उनके साथ बदसलूकी की गई, और यह सब उस जगह हुआ जहाँ पुलिस मौजूद थी। लेकिन पुलिस—प्रत्यक्षदर्शी होने के बावजूद—खामोश खड़ी रही। यह सिर्फ एक पत्रकार पर हमला नहीं था, यह एक चेतावनी थी। चेतावनी उन सभी के लिए, जो सवाल पूछते हैं। चेतावनी उन सभी महिलाओं के लिए, जो डर के बिना बाहर निकलना चाहती हैं।

जब कपड़े अपराध बन जाएँ

इस घटना को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे और भी डरावनी हैं। कहा जा रहा है कि पत्रकार पर हमला इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने हिजाब नहीं पहना था। पहले उनके पहनावे पर आपत्ति जताई गई, फिर विरोध हुआ और उसके बाद हिंसा।

यह दृश्य हमें कहीं और की याद दिलाता है—ईरान की।
वहाँ भी एक युवती की “गलती” बस इतनी थी कि उसका हिजाब ठीक से नहीं था, कुछ बाल दिख गए थे। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को हिला दिया। पुलिस हिरासत, कथित उत्पीड़न, और फिर मौत। उसी घटना ने ईरान में जनविद्रोह को जन्म दिया।

भारत और ईरान की तुलना करना कई लोगों को अतिशयोक्ति लग सकती है। लेकिन सवाल तुलना का नहीं, दिशा का है। जब किसी महिला की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करने लगे कि उसने क्या पहना है, तब खतरे की घंटी बज चुकी होती है। और जब वह महिला पत्रकार हो—जो सवाल पूछती है, सच्चाई दिखाती है—तो खतरा दोगुना हो जाता है। “वहाँ क्यों गई?”—यह सवाल किससे पूछा जाना चाहिए

इस पूरी घटना में सबसे चौंकाने वाली बात हिंसा नहीं थी—हिंसा तो दुर्भाग्य से अब खबर बनती जा रही है। सबसे चौंकाने वाला था मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान—कि पत्रकारों को ऐसे इलाकों में जाना ही नहीं चाहिए था। “वे वहाँ क्यों गए?”

यह एक वाक्य कई सवाल खड़े करता है।

क्या भारत में अब ऐसे इलाके बन रहे हैं जहाँ पत्रकारों का जाना मना है? क्या संविधान कुछ इलाकों में लागू होता है और कुछ में नहीं?
क्या सरकार की जिम्मेदारी नागरिकों की रक्षा करना है, या उन्हें सलाह देना कि कहाँ न जाएँ?

जब सत्ता सवाल पूछने वालों पर ही सवाल उठाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।

पत्रकारों का काम है जाना—वहीं जाना, जहाँ सच्चाई छुपाई जा रही हो। अगर सरकार ही यह तय करने लगे कि पत्रकार कहाँ जा सकते हैं और कहाँ नहीं, तो यह प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला है।

डर का शासन और संविधान की चुप्पी

आज चिंता सिर्फ पश्चिम बंगाल की नहीं है। चिंता इस सोच की है, जो धीरे-धीरे सामान्य बनाई जा रही है। जब लोग यह मानने लगें कि कुछ इलाकों में जाना सुरक्षित नहीं, कुछ सवाल पूछना खतरनाक है, और कुछ कपड़े पहनना अपराध—तो संविधान किताबों में रह जाता है, ज़मीन पर नहीं।

पश्चिम बंगाल को लेकर यह कहना कि वह “संविधान के बाहर जा रहा है”, कठोर लग सकता है। लेकिन जब पुलिस मूकदर्शक बने, सरकार सवालों से बचे, और अपराधियों को सामाजिक या राजनीतिक संरक्षण महसूस हो—तो जनता ऐसा ही महसूस करती है।

यह मुद्दा सिर्फ ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस का नहीं है। यह भारतीय राज्य की नैतिक जिम्मेदारी का सवाल है। और विपक्ष भी इससे बच नहीं सकता। अगर वह सिर्फ चुनावी गणित में उलझा रहेगा और ज़मीनी डर को नहीं समझेगा, तो वह भी इस विफलता का हिस्सा बनेगा।

यह अभी चेतावनी है, फैसला नहीं भारत अभी ईरान नहीं बना है। भारत अभी अफगानिस्तान नहीं बना है।

लेकिन हर देश, जो वहाँ  पहुँचा, उसने कभी कहा था—“यहाँ ऐसा नहीं हो सकता।”

आज जरूरत है इन घटनाओं को राजनीतिक शोर में दबाने की नहीं, बल्कि ईमानदारी से देखने की। महिला सुरक्षा, प्रेस की आज़ादी और कानून का राज—ये किसी एक पार्टी के मुद्दे नहीं हैं। ये किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद हैं। अगर एक महिला पत्रकार सरेआम सुरक्षित नहीं है, अगर पुलिस देखते हुए भी चुप है, और अगर सत्ता सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दे— तो सवाल उठना स्वाभाविक है। सवाल यह नहीं कि भारत ईरान बन रहा है या नहीं।
सवाल यह है—अगर हम अभी भी चुप रहे, तो कल क्या बन जाएगा?

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