पूनम शर्मा
भारत में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (ONOE) का विचार एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पीपी चौधरी के अनुसार, यदि संवैधानिक संशोधन समय पर हो जाते हैं, तो यह व्यवस्था 2034 तक लागू की जा सकती है। यह प्रस्ताव केवल चुनावी कैलेंडर बदलने का मामला नहीं है, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संरचना, संघीय संतुलन और राजनीतिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
आर्थिक लाभ: क्या सच में ₹7 लाख करोड़ की बचत?
सरकार का दावा है कि बार-बार होने वाले चुनावों पर भारी खर्च होता है—चुनावी प्रबंधन, सुरक्षा बलों की तैनाती, प्रशासनिक संसाधन और राजनीतिक दलों का खर्च। ONOE लागू होने पर लगभग ₹7 लाख करोड़ की बचत का अनुमान जताया गया है।
चुनावी खर्च का बड़ा हिस्सा राजनीतिक दलों का होता है, जिसे नियंत्रित करना अलग चुनौती है। फिर भी, यह सच है कि बार-बार आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य बाधित होते हैं—इस दृष्टि से एक साथ चुनाव नीति-निर्माण को गति दे सकते हैं।
संवैधानिक और कानूनी चुनौतियाँ
इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए भारतीय संविधान के कई अनुच्छेदों—जैसे 82, 83, 172 और 327—में संशोधन आवश्यक होंगे। यह कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है, क्योंकि इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत और कई मामलों में राज्यों की मंजूरी भी चाहिए।
यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक सहमति सबसे बड़ी परीक्षा बन जाती है। भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में, जहां क्षेत्रीय दलों की मजबूत उपस्थिति है, सर्वसम्मति बनानी होगी ।
संघीय ढांचे पर प्रभाव
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन सहित कई क्षेत्रीय नेताओं ने आशंका जताई है कि ONOE से राज्यों की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय मुद्दे राज्य चुनावों पर हावी हो सकते हैं, जिससे स्थानीय मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। उनसे कोई यह पूछे जब भारत में चुनाव एक साथ होते थे तब भी क्या यह आशंका थी ?
1951 से 1967 तक भारत में एक साथ चुनाव होते थे और उस समय संघीय ढांचे पर कोई संकट नहीं आया। उनका तर्क है कि यह केवल चुनावों के समय का समन्वय है, न कि अधिकारों का हनन।
व्यावहारिक चुनौतियाँ: क्या भारत तैयार है?
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में एक साथ चुनाव कराना आसान नहीं है। इसके लिए भारी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), सुरक्षा बल और प्रशासनिक संसाधनों की जरूरत होगी। आज तकनीक और चुनाव आयोग की क्षमता पहले से कहीं अधिक मजबूत है। भारत निर्वाचन आयोग ने पहले भी विशाल चुनावों का सफल प्रबंधन किया है।
सरकार गिरने की स्थिति: सबसे बड़ा सवाल
यदि ONOE लागू होता है, तो सबसे जटिल प्रश्न यह होगा कि किसी सरकार के मध्यावधि में गिरने पर क्या होगा? इसके लिए ‘रिमेंडर टर्म’ (शेष कार्यकाल) का मॉडल प्रस्तावित किया गया है, जिसमें नई सरकार केवल बची हुई अवधि के लिए ही चुनी जाएगी।
इसके अलावा, जर्मनी की तरह ‘कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ नो-कॉन्फिडेंस’ का विकल्प भी चर्चा में है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता को रोका जा सके।
राजनीतिक प्रभाव: किसे होगा फायदा?
आलोचकों का मानना है कि ONOE से राष्ट्रीय दलों को लाभ मिल सकता है, क्योंकि चुनावी विमर्श राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाएगा। वहीं क्षेत्रीय दलों को अपने स्थानीय एजेंडे को स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है। लेकिन इस तर्क का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। भारत के मतदाता अक्सर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग तरीके से वोट करते हैं, जो उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।
निष्कर्ष: सुधार या जोखिम?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ एक बड़ा और दूरगामी सुधार हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है। यह केवल प्रशासनिक दक्षता का प्रश्न नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा—प्रतिनिधित्व, विविधता और संतुलन—से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि सरकार राजनीतिक सहमति बना पाती है और संवैधानिक जटिलताओं को संतुलित ढंग से हल करती है, तो ONOE भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन साबित हो सकता है। अन्यथा, यह एक अच्छा विचार होकर भी व्यवहारिक धरातल पर अधूरा रह सकता है।