भारतीय इतिहास संकलन योजना : नामूलं लिख्यते किञ्चित’ व्याख्यानमाला

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली  ,13 अप्रैल :  (प्रचार विभाग, दिल्ली प्रान्त) दिनांक 12 अप्रैल , स्थान केशवकुंज, झंडेवालाँ, नयी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केन्द्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत विशिष्ट व्याख्यान पुरा नवं भवति: Comprehensive History of Bharat-Unfolding the Geo-Cultural Tapestry विशिष्ट व्याख्यान आयोजित हुआ। कार्यक्रम विषय प्रवर्तन के साथ प्रारम्भ हुआ, जिसमें डॉ. नरेन्द्र शुक्ल (प्रमुख, शोध एवं प्रकाशन विभाग, PMML, पूर्व परियोजना समन्वयक – CHB, लेखक परिषद, ABISY) जी का भेजा वक्तव्य डॉ. निर्मल पाण्डेय द्वारा पढ़ा गया। डॉ . नरेन्द्र ने अपने वक्तव्य में इस बात को उठाया कि प्राचीनता और आधुनिकता का ठीक प्रकार से समन्वय ही इतिहास है, जिसमें अखण्ड भारत का इतिहास भू-राजनीतिक, न होकर भू-सांस्कृतिक है। उन्होंने यह भी उद्धृत किया कि इतिहास हमें टाइम ट्रैवल भी कराता है।दिल्ली प्रान्त भारतीय इतिहास संकलन योजना : नामूलं लिख्यते किञ्चित’ व्याख्यानमाला

आज के इस व्याख्यानमाला की मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सुस्मिता पाण्डे (प्रमुख, CHB, सदस्य ICHR, ICPR, Ex-CP एनएम, प्रमुख, महिला इतिहासकार परिषद, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नयी दिल्ली) ने अपना महत्वपूर्ण उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा समग्र दर्शन के अंतर्गत देखी जा सकती है, जिसमें भारत विश्व की एक महान सांस्कृतिक परंपरा वाला राष्ट्र है, जहाँ राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की अवधारणा सदैव सशक्त रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों और विचारधाराओं का समन्वित प्रतिबिंबन है। उन्होंने प्राचीन भारत को ऋषि-मुनियों और तपस्वियों की पावन कर्मभूमि बताते हुए कहा कि यहाँ सभ्यता के आरंभ से ही विद्वानों, विचारकों और समाज वैज्ञानिकों ने ज्ञान की समृद्ध परंपरा विकसित की। उन्होंने चार पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास में जीवन के इन मूलभूत सिद्धांतों पर गंभीर चिंतन किया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारतीयता और राष्ट्रबोध पर आधारित इतिहास लेखन आज भी प्रासंगिक है और इस दिशा में कार्य जारी है।

कार्यक्रम में मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित आदरणीय डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय जी(राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने अपने पाथेय संबोधन में कहा कि इतिहास एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें नवाचार की निरंतर आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य प्रारंभ हो चुका है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की जरूरत है। डॉ. पाण्डेय जी ने कहा कि अतीत में कुछ आक्रांताओं और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को क्षति पहुँची। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि सत्य आधारित इतिहास, समग्र और राष्ट्रबोध से प्रेरित इतिहास को पुनः स्थापित किया जाए। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे इस दिशा में मानसिक और वैचारिक रूप से तैयार हों।

कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य प्रो. (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने की। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास सत्य, ज्ञान और नवाचार पर आधारित है और इसका पुनर्लेखन भारतीयता की मूल भावना को सामने लाने के लिए आवश्यक है।

व्याख्यानमाला का संचालन दिल्ली प्रान्त महासचिव डॉ. निर्मल पाण्डेय जी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अस्मित शर्मा (कार्यालय प्रमुख, दिल्ली प्रान्त) ने किया। इस अवसर पर संरक्षक सदस्य प्रो. रमेश कुमार मिश्र, प्रो. धर्मचंद चौबे (अध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त ), प्रो यूथिका मिश्र( उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), प्रो. गीता सिंह (CPDHE, दिल्ली विश्वविद्यालय), राष्ट्रीय सचिव प्रो. शिवकुमार मिश्र, डॉ. हर्षवर्धन सिंह तोमर, प्रो. उमेश कदम, प्रो. कावेरी कदम, प्रो. प्रीति शर्मा, श्री सचिन झा (कोषाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), डॉ. पंकज सिंह (सह संगठन मंत्री, दिल्ली प्रान्त), प्रो. अनुराग मिश्र, मुकेश उपाध्याय, विद्वत प्रमुख डॉ रीना कपूर जी, प्रो. सुशांत बाग, डॉ. सुधाकर जी, प्रो सुरजीत कौर जॉली, डॉ. सुरेश मीना, डॉ. पीयूष मिश्र, डॉ. प्रदीप उपाध्याय, डॉ. कौशलेंद्र, डॉ. दुष्यंत शाह, डॉ. प्रीति उपाध्याय, डॉ. मिथिलेश सिंह, दयाशंकर राय, डॉ. राजकुमारी, संजीव मिश्र, रजनीश रंजन, विपुल वशिष्ठ, अविनाश, आदित्य कुमार, कृष्णा द्विवेदी, डॉ. आनंद वर्मा, सहित अनेकानेक दायित्वधारी, पदाधिकारीगण, आजीवन सदस्य और विभिन्न विश्वविद्यालय के प्राध्यापक गण, डेढ़ सौ से ज़्यादा की संख्या में शिक्षक-शोधार्थी-विद्यार्थी प्रतिभागी के रूप में उपस्थित रहे।

डॉ .बमबम यादव

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