सरोज कुमारी
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गणेश उपासना की विभिन्न परंपराओं में श्रीगणेश के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है। द्वादश गणपति की परंपरा में गणेशजी के 12 विशेष नामों और स्वरूपों का स्मरण किया जाता है। प्रत्येक रूप विघ्न-विनाश, बुद्धि, सिद्धि, समृद्धि और मंगल के किसी विशेष भाव का प्रतीक माना जाता है।
1. वक्रतुंड गणपति
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वक्रतुंड का अर्थ है- वक्र अर्थात मुड़ी हुई सूंड वाले। यह स्वरूप अहंकार और नकारात्मक शक्तियों पर विजय का प्रतीक माना जाता है।
मंत्र-
ॐ वक्रतुण्डाय नमः।
2. एकदंत गणपति
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एकदंत गणेशजी का अत्यंत प्रसिद्ध स्वरूप है। यह एकाग्रता, त्याग और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
मंत्र-
ॐ एकदन्ताय नमः।
3. महोदर गणपति
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महोदर अर्थात विशाल उदर वाले। यह स्वरूप ज्ञान को धारण करने की क्षमता और जीवन में विवेक का प्रतीक माना जाता है।
मंत्र-
ॐ महोदराय नमः।
4. गजानन गणपति
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गजानन अर्थात हाथी के समान मुख वाले। यह स्वरूप बुद्धि, विवेक और शांत चित्त का प्रतिनिधित्व करता है।
मंत्र-
ॐ गजाननाय नमः।
5. लंबोदर गणपति
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लंबोदर का अर्थ है विशाल उदर वाले। इन्हें समस्त अनुभवों और ज्ञान को अपने भीतर समाहित करने वाले गणपति के रूप में स्मरण किया जाता है।
मंत्र-
ॐ लम्बोदराय नमः।
6. विकट गणपति
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विकट का अर्थ है अद्भुत या कठिन परिस्थितियों को पार कराने वाला। यह स्वरूप संकटों और बाधाओं से संघर्ष करने की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
मंत्र-
ॐ विकटाय नमः।
7. विघ्नराज गणपति
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विघ्नराज अर्थात विघ्नों के राजा। इनकी आराधना कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर करने और शुभ आरंभ के लिए की जाती है।
मंत्र-
ॐ विघ्नराजाय नमः।
8. धूम्रवर्ण गणपति
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धूम्रवर्ण अर्थात धुएँ के समान वर्ण वाले। यह स्वरूप अहंकार, भ्रम और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय का संकेत माना जाता है।
मंत्र-
ॐ धूम्रवर्णाय नमः।
9. भालचंद्र गणपति
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भालचंद्र अर्थात मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले। यह स्वरूप शीतलता, मानसिक संतुलन और शांति का प्रतीक माना जाता है।
मंत्र-
ॐ भालचन्द्राय नमः।
10. विनायक गणपति
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विनायक श्रीगणेश का अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय नाम है। यह स्वरूप नेतृत्व, बुद्धि और शुभ मार्गदर्शन से जुड़ा माना जाता है।
मंत्र-
ॐ विनायकाय नमः।
11. गणपति
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गणपति का अर्थ है- गणों के अधिपति। यह श्रीगणेश का सार्वभौमिक और सर्वाधिक प्रचलित स्वरूप है, जिनका स्मरण किसी भी शुभ कार्य से पहले किया जाता है।
मंत्र-
ॐ गणपतये नमः।
12. गजानन/द्वैमातुर परंपरा का स्वरूप
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कुछ परंपराओं में द्वादश नामों की सूचियों में भिन्नता मिलती है। इसलिए द्वादश गणपति की सूची सभी ग्रंथों में एक जैसी नहीं है। गणेशजी के नाम और स्वरूप क्षेत्रीय तथा संप्रदायगत परंपराओं के अनुसार भी अलग मिलते हैं।
।। श्री गणपति अष्टकम् ।।
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वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभकार्येषु सर्वदा।।1।।
गजाननं भूतगणादि सेवितं
कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारणं
नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।।2।।
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्।
विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्।।3।।
सिद्धिबुद्धिप्रदातारं मंगलं मंगलप्रदम्।
भक्तानां वरदं देवं गणनाथं नमाम्यहम्।।4।।
अग्रपूज्यं महादेवं सर्वकार्येषु सिद्धिदम्।
प्रणमामि गणाध्यक्षं सर्वविघ्नविनाशनम्।।5।।
ज्ञानरूपं दयारूपं भक्तकामफलप्रदम्।
नमामि पार्वतीपुत्रं मंगलं गणनायकम्।।6।।
लड्डुकप्रियदेवं तं मोदकप्रियदायकम्।
भक्तप्रियं महावीरं वन्देऽहं गणनायकम्।।7।।
सर्वसिद्धिप्रदातारं सर्वमंगलकारकम्।
विघ्नराजं महाकायं नमामि गणनायकम्।।8।।
फलश्रुति
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जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से श्रीगणेश के इन स्वरूपों का स्मरण करता है, उसके जीवन में बुद्धि, विवेक, शुभता और कार्यारंभ का मंगल भाव दृढ़ होता है। गणेश उपासना का मूल संदेश है- पहले विवेक, फिर संकल्प और उसके बाद पुरुषार्थ।
।। जय भगवान श्री गणेश जी ।।
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