अशोक सिंघल के संस्मरण: जीवन के अनमोल अनुभव
अशोकजी के साथ बिताए वर्षों की स्मृतियां, उनके संगठनात्मक योगदान, राष्ट्रसेवा और प्रेरणादायी व्यक्तित्व को याद करते हुए भावपूर्ण संस्मरण।
विमल सोढ़ानी
परम श्रद्धेय श्री अशोकजी सिंघल के साथ जीवनभर के अनुभवों को शब्दों में समेटना आसान नहीं है। उनके व्यक्तित्व और जीवन से जुड़ी इतनी स्मृतियां हैं कि उन्हें पूरी तरह व्यक्त कर पाना कठिन है। जैसा कि कहा जाता है—“प्रेम कभी समाप्त नहीं होता और आत्मा की प्रेरणा कभी कम नहीं होती।”

अशोकजी से मेरा पहला संपर्क नवंबर 1970 के आसपास हुआ था, जब मैं अमेरिका जाने की तैयारी कर रहा था। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में बताया कि अमेरिका पहुंचने के बाद मेरी भूमिका क्या होनी चाहिए। उस समय उन्होंने कहा था कि अमेरिका में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां नहीं हैं, इसलिए वहां विश्व हिंदू परिषद की गतिविधियों को शुरू करने की आवश्यकता है। उनका मानना था कि हमें हिंदुत्व के दूत के रूप में काम करना चाहिए।
इसके बाद अमेरिका में विश्व हिंदू परिषद की गतिविधियां लगातार आगे बढ़ीं। लेखक के अनुसार, VHPA ने आगे चलकर एक विशाल वटवृक्ष का रूप लिया, जिसने हजारों लोगों को आश्रय दिया और हिंदू जीवन-पद्धति को मजबूत करने में योगदान किया।

अशोकजी की विनम्रता, संगठन क्षमता, जनसंपर्क और उनके प्रति लोगों के विश्वास के कारण बड़ी संख्या में संत-महात्मा और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग विश्व हिंदू परिषद के आंदोलनों से जुड़े। उनके माध्यम से समाज और देश के सामने मौजूद समस्याओं और चुनौतियों पर लोगों ने अपनी बात खुलकर रखी।
लेखक उनके संगठनात्मक और नेतृत्व कौशल को 6 दिसंबर 1992 की अयोध्या की घटना से भी जोड़ते हैं। लेख में बाबरी ढांचे को लेकर लेखक का अपना मूल्यांकन और दृष्टिकोण व्यक्त किया गया है तथा इसे श्रीराम जन्मभूमि से संबंधित आंदोलन के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।

अशोकजी अपने आप में एक संस्था थे। उनका जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित रहा। लेखक के अनुसार, वे अनेक सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों के पीछे प्रेरक शक्ति रहे, जिनसे जरूरतमंद और गरीब लोगों को लाभ मिला।
उन्होंने हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) के उद्देश्य और कार्यों के लिए अपना जीवन समर्पित किया। श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या के विषय को उन्होंने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और एकता के व्यापक उद्देश्य से जोड़कर देखा। इसके साथ ही उन्होंने विद्वानों और संत-महात्माओं के साथ संवाद एवं विचार-विमर्श के माध्यम से हिंदू चिंतन और उसके विभिन्न आयामों को समझने और आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
त्रावणकोर के पूर्व महाराजा ने स्नेहपूर्वक अशोकजी के नाम की व्याख्या करते हुए उनकी प्रशंसा की थी। उनके अनुसार, अशोकजी भीतर से ‘अशोक’ और बाहर से ‘सिंह’ थे।
अशोकजी ने संगठनात्मक कार्यों के सिलसिले में त्रिनिदाद एवं टोबैगो, अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, जापान, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और केन्या सहित कई देशों की यात्राएं कीं।
89 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अगस्त-सितंबर 2015 में ब्रिटेन, हॉलैंड और अमेरिका की लगभग एक महीने लंबी व्यस्त एवं कठिन यात्रा भी की।
सितंबर 2015 में अमेरिका की अपनी अंतिम यात्रा से पहले मेरी पत्नी पप्पू और मुझे उनके साथ कुछ यादगार समय बिताने का सौभाग्य मिला।
आज भी मैं अपने मार्गदर्शक अशोकजी की कमी महसूस करता हूं। वे कभी भुलाए नहीं जा सकते। उनका जीवन हमें लगातार यह याद दिलाता रहेगा कि समर्पण और दृढ़ संकल्प की शक्ति से हम उन कार्यों को पूरा कर सकते हैं, जिन पर हमें विश्वास है।
जीवन से पूछा जाने वाला सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए—“मैं किस प्रकार सेवा कर सकता हूं?”
मेरे लिए अशोकजी केवल एक मार्गदर्शक ही नहीं थे, बल्कि पिता समान व्यक्तित्व, शिक्षक और मेरे व्यक्तिगत विकास के प्रेरणास्रोत भी थे। वे उन सबसे दयालु, विवेकशील और प्रेरणादायी व्यक्तियों में से एक थे, जिन्हें मैंने अपने जीवन में जाना। उनकी विनम्रता और सकारात्मक ऊर्जा ने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
परम श्रद्धेय श्री अशोक सिंघलजी की जन्म शताब्दी के पावन अवसर पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
राष्ट्र, धर्म और समाज के प्रति आपका समर्पित जीवन हम सभी के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा। आपके त्याग, तपस्या, संघर्ष और राष्ट्रसेवा की अमिट स्मृतियां हमारे हृदय में सदैव जीवंत रहेंगी।
आपके दिखाए मार्ग पर चलते हुए और आपकी पावन स्मृतियों को हृदय में संजोकर, हम सभी आपके सपनों और संकल्पों को साकार करने के लिए कृतसंकल्प एवं प्रतिबद्ध हैं।
आपका जीवन हमारी प्रेरणा है, आपका संकल्प हमारा संकल्प है।
शत-शत नमन। कोटि-कोटि नमन।
विमल सोढ़ानी, न्यू जर्सी, अमेरिका