पूनम शर्मा
भारत की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर के आसपास चल रहे आंदोलन के साथ-साथ जरा फ्रांस में हो रही घटनाओं पर भी नजर डालिए। फ्रांस में भी युवा स्कूलों की स्थिति सुधारने की मांग को लेकर इन दिनों बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब इतना हिंसक हो गया है कि प्रदर्शनकारी अपने ही देश के बुनियादी ढांचे, इमारतों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सड़कों को नुकसान पहुंचाने और आग लगाने लगे हैं।
ये दृश्य एक ऐसे रुझान की ओर इशारा करते हैं जो आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दिखाई दे रहा है। युवा किसी समस्या को लेकर विरोध शुरू करते हैं। फिर आंदोलन हिंसक और राजनीतिक रूप लेने लगता है। इसके बाद देश में व्यापक अशांति फैलती है और अंततः सरकार को अस्थिर करने या उसके पतन की कोशिशों की बात सामने आने लगती है।
फ्रांस में आंदोलन स्कूलों की स्थिति सुधारने की मांग के साथ शुरू हुआ था और आज इसके हिंसक होने की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में भविष्य में भारत में भी इस तरह की तस्वीर दिखाई दे तो शायद आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसे ध्यान से समझने की जरूरत है।
भारत में जिस आंदोलन को यहां ‘कॉकरोच पार्टी’ का आंदोलन कहा जा रहा है, उसकी शुरुआत परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों से हुई थी और अब वह चुनाव व्यवस्था तक पहुंच चुका है। यानी आंदोलन ने पूरी तरह राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर लिया है। पहले कहा गया कि आंदोलन प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ है और इसका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। लेकिन अब यह राजनीतिक मुद्दों तक पहुंच गया है।
पिछले आंदोलन में ये छात्र सवाल उठा रहे थे कि परीक्षाएं कैसे आयोजित होनी चाहिए और प्रश्नपत्र लीक को कैसे रोका जाना चाहिए। अब वे सवाल उठा रहे हैं कि देश में चुनाव कैसे आयोजित होने चाहिए।
लेकिन इस बार कुछ नई बातें देखने को मिल रही हैं।
पहली बात, पिछली बार छात्रों के दबाव के बाद सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज कई एफआईआर वापस ले ली थीं। इसका असर इस बार के आंदोलन में पुलिस के प्रति दिखाई देने वाले व्यवहार में नजर आता है। आंदोलनकारी खुलकर पुलिस से बहस कर रहे हैं, पुलिस के खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं, पुलिसकर्मियों के वीडियो बना रहे हैं और कई मौकों पर पुलिस के निर्देशों को मानने से इनकार करते दिखाई दे रहे हैं।
इसलिए सवाल उठता है कि पिछली बार एफआईआर वापस लेने के फैसले ने क्या इस बार आंदोलनकारियों के मन से पुलिस और कानूनी कार्रवाई का भय कम कर दिया है?
दूसरी महत्वपूर्ण बात सोशल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन से जुड़ी है। पिछले आंदोलन में बड़ी संख्या में यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स को खूब सामग्री मिली। कई लोगों के वीडियो को लाखों व्यू मिले, उनके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े और कई आंदोलनकारी रातोंरात सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
इससे एक धारणा मजबूत हुई कि ऐसे आंदोलनों में विरोध के साथ-साथ कंटेंट भी तैयार किया जा सकता है और वायरल होने का अवसर भी मिल सकता है।
उस दौरान ऐसा भी दिखाई दिया कि जो व्यक्ति जितनी उत्तेजक या अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करता, बड़े नेताओं का जितना अधिक अपमान करता या प्रधानमंत्री के खिलाफ जितनी तीखी भाषा बोलता, उसके वीडियो को उतना ही ज्यादा ध्यान और व्यू मिलते। इस तरह जंतर-मंतर पर मानो कंटेंट क्रिएशन की एक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
पिछले आंदोलन से मिले इसी अनुभव के बाद इस बार भी जंतर-मंतर कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक बड़े ‘स्टूडियो’ जैसा दिखाई देने लगा है। कई बार ऐसा लगता है कि यहां आंदोलन से अधिक कंटेंट बनाने की होड़ है।
हर तरफ कैमरे और मोबाइल फोन दिखाई देते हैं। कंटेंट बनाने के लिए यहां लगभग हर तरह का मसाला मौजूद है—प्रदर्शन, उत्तेजक और अशोभनीय भाषा, ड्रामा, कथित रूप से उत्तेजक नृत्य, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की। एक यूट्यूबर या रील बनाने वाले के लिए इससे अधिक सामग्री एक ही जगह कहां मिलेगी?
यहां गतिविधि है, टकराव है और नाटकीयता भी। यही कारण है कि जंतर-मंतर आज रील और वीडियो बनाने के बड़े मंचों में बदलता दिखाई दे रहा है। जंतर-मंतर मानो एक स्टूडियो बन गया है।
सवाल यह भी है कि मोदी सरकार जंतर-मंतर पर इस तरह की गतिविधियों को आखिर क्यों जारी रहने दे रही है? यहां जो कुछ हो रहा है, उसे शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
फ्रांस में छात्र आंदोलन जिस तरह हिंसक स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है, उसे देखते हुए चिंता यह है कि कहीं भविष्य में भारत में भी विरोध-प्रदर्शन उसी दिशा में न चले जाएं।