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विजय पाल सिंह

​हम अक्सर एक ही जगह होते हैं, एक ही विषय पर बात कर रहे होते हैं, फिर भी बात नहीं बनती। धीरे-धीरे शब्द कम होने लगते हैं, आवाज़ मद्धम पड़ जाती है, और अंत में एक वाक्य हवा में तैर जाता है—”चलो छोड़ो, जाने दो।”
हम इसे समझदारी का नाम देते हैं।
​पर क्या यह सचमुच समझदारी है?

​गहराई से देखें तो हम कभी एक बिंदु पर थे ही नहीं। हम शब्द भले ही एक इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन उन्हें देखने का हमारा कोण अलग था। एक ही बात हम दोनों के लिए अलग-अलग अर्थ और संदर्भ ले रही थी। हम जिसे ‘संवाद’ समझ रहे थे, वह दरअसल दो अलग-अलग दिशाओं में बहते विचारों का एक जगह बेमेल ठहराव भर था। जब दृष्टिकोण ही नहीं मिले, तो संवाद का बिखर जाना स्वाभाविक था।
​समस्या यह नहीं कि हमारे विचार अलग हैं; समस्या यह है कि हमने अपने दृष्टिकोण के उस ‘कोण’ को कभी स्पष्ट ही नहीं किया, या फिर सामने वाले ने उसे समझने का धीरज नहीं दिखाया। नतीजा यह होता है कि बातचीत विचारों के द्वंद्व में बदल जाती है और बीच में पूर्वाग्रहों का एक अदृश्य पहाड़ खड़ा हो जाता है।

​असल में, जब भी कोई व्यक्ति किसी विषय पर सोचता है, तो वह केवल उस विषय को नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े अपने निजी अनुभवों और जीवन-दर्शन को भी साथ लेकर आता है। वही अनुभव उसका दृष्टिकोण तय करते हैं। विडंबना यह है कि उस दृष्टिकोण को साझा किए बिना, हम सीधे निष्कर्ष पर सहमति खोजने लगते हैं। यह असंभव है। जब तक देखने का कोण स्पष्ट न हो, बिंदु की वास्तविकता दिखाई नहीं देती—और ऐसे में असहमति का उभरना तय है।

​यहीं से वह चुप्पी शुरू होती है। यह चुप्पी किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि असहमति के भय से जन्म लेती है।
​हम डरते हैं कि अपनी बात रखने से संबंध में दरार आ जाएगी, बना-बनाया ढाँचा बिखर जाएगा। इसलिए हम सामंजस्य की रक्षा के नाम पर असहमति को भीतर ही घोंट लेते हैं। खामोश हो जाते हैं। और इस मौन को खुद ही एक गरिमामयी नाम दे देते हैं—सभ्यता, परिपक्वता, समझदारी।
​हमें लगता है कि चुप रहकर हमने संबंध बचा लिया, पर असल में हमने उसे थोड़ा और झूठा बना दिया। भीतर असहमति की टीस वैसी ही बनी रहती है, बस होंठ सिल जाते हैं। हम साथ बैठकर भी एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। यह सामंजस्य नहीं, सामंजस्य का एक थका हुआ अभिनय है।

​इस अभिनय में हम सभ्य तो दिखते हैं, पर प्रामाणिक नहीं रह पाते।
​इस चुप्पी के भीतर एक घुटती हुई बेचैनी होती है—यह मलाल कि कुछ कहा नहीं गया, कुछ सुना नहीं गया। हम अपने दृष्टिकोण को भीतर दबाए रखते हैं और उम्मीद करते हैं कि सामने वाला उसे बिना कहे ही समझ ले। संवाद की इसी शून्यता में रोज़ न जाने कितने विचार असमय दम तोड़ देते हैं; गैरों के बीच ही नहीं, अपनों के बीच भी।
​तो फिर क्या हो, अगर असहमति को रिश्ते का विरोध न माना जाए?

​क्या हो, अगर यह स्वीकार कर लिया जाए कि असहमति जताना संबंध को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे सच्चा बनाना है? जो सामंजस्य केवल चुप्पी के सहारे टिका हो, वह शांति नहीं, एक बेबस समझौता है।
​अक्सर हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की इतनी जल्दी में होते हैं कि दूसरे को सुनने का धीरज ही खो बैठते हैं। और जैसे ही लगता है कि बात नहीं बन रही, हम एक कदम पीछे हटकर स्थिति को समझने के बजाय, सीधे संवाद से ही पलायन कर जाते हैं।

​क्या उस तल्ख मोड़ पर ठहरकर यह नहीं पूछा जा सकता—”क्या हम इसे अलग-अलग कोण से देख रहे हैं?”
​यह एक सीधा सा सवाल किसी को हराता नहीं है। यह केवल संवाद का धरातल बदल देता है। तब बात सही या गलत साबित करने पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के नज़रिये को समझने पर आ जाती है। वहाँ से एक नए तरह का संवाद शुरू होता है, जहाँ अहं नहीं, बल्कि दृष्टि आमने-सामने होती है।

​समझदारी के नाम पर ओढ़ी गई यह चुप्पी समाज को धीरे-धीरे संवेदनहीन और मूक बना रही है। जहाँ लोग साझेदार नहीं, वहाँ बस एक भीड़ है—एक ऐसी भीड़ जो साथ तो दिखाई देती है, पर जिसमें कोई किसी के साथ नहीं होता।

​इसलिए अगली बार जब असहमति के डर से आपके कदम पीछे हटने लगें, तो खुद से ज़रूर पूछिए—
क्या मैं संबंध बचा रहा हूँ, या सिर्फ सामंजस्य का अभिनय कर रहा हूँ?
क्या मैं सचमुच शांत हूँ, या खुद को प्रामाणिक रखने से भाग रहा हूँ?

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