बांग्लादेश जैसी अराजकता का सपना या हिन्दू विरोध?

भारत में आंदोलन की राजनीति पर उठते गंभीर सवा

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पूनम शर्मा 

क्या लोकतंत्र में विरोध का अधिकार किसी भी आंदोलन को कानून से ऊपर खड़ा कर देता है? क्या सत्ता परिवर्तन के लिए चुनावी प्रक्रिया के स्थान पर सड़कों के दबाव को प्राथमिकता देना उचित है? और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल को भारत के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने वाले लोग उस परिवर्तन के बाद उत्पन्न हिंसा, असुरक्षा और सामाजिक तनाव से क्या सबक लेते हैं?

भारत में विरोध प्रदर्शनों, छात्र राजनीति और कथित व्यवस्था परिवर्तन की चर्चाओं के बीच ये प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गए हैं। विशेष रूप से नेहा बोरा से जुड़े बताए जा रहे बयानों और बांग्लादेश के छात्र आंदोलन के संदर्भ में उठे विवादों ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। हालांकि उनके कथित बयानों का मूल रिकॉर्ड और संदर्भ स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना आवश्यक है।

बांग्लादेश का उदाहरण: क्रांति का आदर्श या अराजकता की चेतावनी?

बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन की शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विरोध से हुई थी, लेकिन बाद में वह व्यापक सरकार-विरोधी आंदोलन में परिवर्तित हो गया।

उस दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई हिंसा और उसके बाद विभिन्न समुदायों, विशेष रूप से हिंदू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सामने आए हमलों ने गंभीर मानवाधिकार संबंधी चिंताएं पैदा कीं। यह पूरे विश्व ने देखा कि किस प्रकार कि हिंसा वहाँ की गई एक बर्बर पूर्ण खूनी आंदोलन सभी ने देखा ।

यहां एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है। किसी सरकार के विरुद्ध लोकतांत्रिक आंदोलन और किसी देश में उत्पन्न हिंसक अराजकता एक ही बात नहीं हैं। आंदोलन के उद्देश्यों का मूल्यांकन उसके घोषित आदर्शों के साथ-साथ उसके तरीकों और परिणामों से भी होना चाहिए।

यदि कोई भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ता बांग्लादेश के आंदोलन की प्रशंसा करता है, तो उससे यह पूछना उचित है कि वह उसके किस पहलू को आदर्श मानता है—युवाओं की भागीदारी, सरकार के प्रति जवाबदेही की मांग या सत्ता परिवर्तन का तरीका?

साथ ही, बांग्लादेश के घटनाक्रम की प्रशंसा करने मात्र से किसी व्यक्ति की हिंसा में संलिप्तता या हिंसा का समर्थन सिद्ध नहीं होता।

धार्मिक कट्टरवाद के विरोध का दावा और राजनीतिक गठबंधनों का विरोधाभास

बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से निकले राजनीतिक समूहों और धार्मिक विचारधारा वाले संगठनों के बीच संबंधों को लेकर भी प्रश्न उठते रहे हैं। यदि कोई राजनीतिक संगठन धार्मिक कट्टरवाद के विरोध को अपनी वैचारिक पहचान बताता है, लेकिन बाद में ऐसे समूहों के साथ चुनावी समझौता करता है जिनकी राजनीति धार्मिक पहचान पर आधारित है, तो उस संगठन से उसकी वैचारिक निरंतरता के बारे में प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

यह प्रश्न केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। भारत सहित सभी लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक संगठनों की विश्वसनीयता उनके सार्वजनिक बयानों और वास्तविक राजनीतिक आचरण के बीच सामंजस्य से निर्धारित होती है।

भारत में सरकार बदलने का संवैधानिक मार्ग

भारत में सरकार बदलने का स्थापित संवैधानिक माध्यम चुनाव है। संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं।

भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, अभिव्यक्ति और संगठन बनाने का अधिकार देता है। इसलिए सड़क पर विरोध करना अपने आप में अलोकतांत्रिक नहीं है।

लेकिन विरोध के अधिकार और हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा किसी संवैधानिक संस्था को बलपूर्वक निष्क्रिय करने के प्रयास के बीच स्पष्ट अंतर है।

यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य लोकतांत्रिक सुधार है, तो उसे संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। राजनीतिक असहमति को हिंसक संघर्ष में बदलने का प्रयास लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि उनका दुरुपयोग होगा।

नेहा बोरा के बयान से उठे सवाल: क्या भारत में बांग्लादेश जैसा परिवर्तन संभव है?

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के बांग्लादेश संबंधी बयान ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। 15 अक्टूबर को प्रकाशित समाचार के अनुसार, उन्होंने बांग्लादेश के 2024 के छात्र आंदोलन को भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बताया था। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि इसके पीछे सत्ता परिवर्तन का उद्देश्य है। राष्ट्र संघ का मानवाधिकार उस समय नींद में  चला गया था जब बंगलादेश में हिंदुओं के ऊपर अत्याचार हुआ था । नेहा बोरा के पुरुष मित्र स्वयं एक मुसलमान हैं एवं वह खुद धर्म परिवर्तन के लिए प्रस्तुत जान पड़ती है अतः उसके लिए भारत के हिंदुओं के प्रति कोई संवेदन शील भावना का न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।

विवाद का दूसरा पहलू अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयान से जुड़ा है । प्रशांत भूषण जिन्होंने अपनी हिन्दू पत्नी का त्याग किया एवं अब वे किसी ईसाई महिला के साथ रहते हैं इससे पता चलता है कि यदि बांग्लादेश सदृश किसी खूनी आंदोलन का समर्थन  वे करते हैं तो आश्चर्य कि कोई बात नहीं । यह भी तय है कि एक बहुत बड़ा खूनी खेल के वे समर्थक जान पड़ते हैं जिसमें मात्र और मात्र हिंदुओं को  एक बड़े  संकट का सामना करना होगा  ।  प्रश्न है कि क्या ऐसे वक्तव्य केवल लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवर्तन की मांग हैं या इनके माध्यम से व्यापक जनांदोलन की रणनीति प्रस्तुत की जा रही है।

इस प्रश्न का उत्तर अनुमान या राजनीतिक आरोपों, नेताओं के पूरे बयानों, घोषित कार्यक्रमों और वास्तविक गतिविधियों के आधार पर ही निकाला गया  है।

बांग्लादेश की हिंसा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में जुलाई से अगस्त 2024 के बीच हुई हिंसा में लगभग 1,400 लोगों की मृत्यु हुई हो सकती है। रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों पर तत्कालीन सुरक्षा बलों के गंभीर अत्याचारों का उल्लेख है। बांग्लादेश पुलिस के अनुसार, हिंसा में उसके 44 अधिकारी भी मारे गए।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने शेख हसीना सरकार के पतन के बाद हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों को भी दर्ज किया है।

इसलिए बांग्लादेश की घटनाओं को केवल राजनीतिक परिवर्तन की सफलता के रूप में प्रस्तुत करना अधूरा विश्लेषण होगा। वहां प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सरकारी हिंसा और सत्ता परिवर्तन के बाद अल्पसंख्यकों पर हुए हमले, दोनों की गंभीरता को स्वीकार करना आवश्यक है।

तिरंगा, विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था

16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है । समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 25,000 से अधिक पुलिस एवं अर्धसैनिक कर्मियों की तैनाती की व्यवस्था की गई और सेंट्रल पार्क में सार्वजनिक प्रवेश पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया गया है ।

पालिका बाजार के व्यापारियों ने बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से कारोबार प्रभावित होने की चिंता व्यक्त की। आंदोलनकारियों ने पुलिस की कार्रवाई को शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर प्रतिबंध बताया त्योहार के अवसर पर इस तरह का बाधित करने वाला कार्यक्रम पूर्ण रूप से हिंदुओं कि आस्था पर एक आघात है ।

यहां दोनों संवैधानिक दायित्वों का संतुलन आवश्यक है। नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक सुरक्षा, यातायात और सामान्य जनजीवन भी प्रभावित न हो। प्रतिबंध कानूनसम्मत, आवश्यक और अनुपातिक होने चाहिए।

वामपंथी छात्र राजनीति और माओवादी हिंसा का प्रश्न

भारत के विश्वविद्यालयों में वामपंथी छात्र संगठनों की भूमिका लंबे समय से वैचारिक विवाद का विषय रही है। उनके आलोचक अक्सर हिंसक माओवादी आंदोलनों, वर्ग संघर्ष की राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति कुछ कट्टरपंथी विचारधाराओं के दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं।

2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में 76 सुरक्षाकर्मियों की हत्या माओवादी हिंसा के इतिहास की अत्यंत गंभीर घटनाओं में शामिल है। लेकिन किसी छात्र संगठन के सदस्यों की राजनीतिक विचारधारा और किसी प्रतिबंधित सशस्त्र संगठन की आपराधिक गतिविधियों के बीच संबंध स्थापित करने के क्या कारण हैं  यह एक शोध का विषय है । वैचारिक समानता अपने आप में हिंसक गतिविधियों के समर्थन में  संलिप्तता का प्रमाण  है।

क्या आंदोलनकारी चुनावी लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं?

आज भारतीय राजनीति के सामने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सड़क पर सक्रिय नए राजनीतिक समूह अपनी लोकप्रियता को चुनावी भागीदारी और लोकतांत्रिक संगठन में कैसे परिवर्तित करना चाहते हैं।

आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकार है। चुनाव लड़ना, जनता का समर्थन प्राप्त करना और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नीतियों में परिवर्तन लाना लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं।

यदि कोई राजनीतिक समूह व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन चाहता है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी वैकल्पिक नीतियां क्या हैं, संस्थाओं को मजबूत करने की उसकी योजना क्या है और असहमति रखने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा वह कैसे करेगा।

इसी प्रकार सरकार और प्रशासन का दायित्व भी केवल विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि वास्तविक सार्वजनिक शिकायतों को सुनना और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है।

निष्कर्ष: भारत का लोकतंत्र किसी विदेशी राजनीतिक मॉडल की नकल नहीं

भारत का लोकतंत्र अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों, संवैधानिक संरचना और सामाजिक विविधता के आधार पर विकसित हुआ है। किसी दूसरे देश की राजनीतिक उथल-पुथल से सबक लेना उपयोगी हो सकता है, लेकिन उसके हिंसक अनुभवों का अनुकरण आवश्यक या वांछनीय नहीं है।

नेहा बोरा के बयान से उत्पन्न विवाद ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है। क्या राजनीतिक परिवर्तन का लक्ष्य केवल सत्ता बदलना है, या ऐसी व्यवस्था विकसित करना भी है जिसमें नागरिक अधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और संस्थागत स्थिरता एक साथ सुरक्षित रहें?

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल सरकार के बने रहने या बदलने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि राजनीतिक संघर्ष के दौरान भी संविधान, नागरिकों की सुरक्षा और कानून के शासन का सम्मान बना रहे।

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