प्रदेश कांग्रेस कार्यालय का ‘अशुभ कमरा’ और संवाद संकट
ताले में बंद कमरा, अटकी प्रवक्ताओं की सूची और अदृश्य कम्युनिकेशन इंचार्ज को लेकर कांग्रेस में गहराया अंदरूनी विवाद।
- प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के कमरा नंबर को लेकर उठे कई सवाल।
- कम्युनिकेशन इंचार्ज अभय तिवारी की अनुपस्थिति पर उठे सवाल।
- लंबे समय से नहीं जारी हो सकी प्रवक्ताओं की नई सूची।
समग्र समाचार सेवा
भोपाल, 22 अक्तूबर: प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में इन दिनों एक विशेष कमरे को लेकर राजनीतिक गलियारों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच जबरदस्त सुगबुगाहट देखने को मिल रही है। सूत्रों की मानें तो पार्टी कार्यालय के इस कमरे को संगठन के भीतर ‘अशुभ’ माना जाने लगा है। राजनीतिक चर्चाओं का बाजार इस बात को लेकर गर्म है कि जिस भी नेता को यह कमरा आवंटित किया गया, उसका राजनीतिक करियर या तो हाशिए पर चला गया या फिर उसने पार्टी से किनारा कर लिया। कुछ नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर दूसरे राजनीतिक दलों की राह थाम ली, तो कुछ अब इस दुनिया में भी नहीं रहे। इन तमाम अंधविश्वासों और चर्चाओं के बीच कमरे के मुख्य दरवाजे पर लटका ताला और बाहर लगी चमचमाती नामपट्टिका आज भी पूरे रुतबे के साथ अपना अस्तित्व दर्ज करा रही है।
पट्टिका पर साहब का नाम, लेकिन कार्यालय से दर्शन दुर्लभ
विवाद का विषय बना यह कमरा कांग्रेस के मीडिया एवं कम्युनिकेशन विभाग के इंचार्ज अभय तिवारी को आवंटित बताया जाता है। हालांकि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस अधिकारी पर पार्टी के मीडिया संवाद, प्रवक्ताओं के समन्वय और सार्वजनिक संचार की पूरी जिम्मेदारी है, उनका अपना ही संचार पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों के लिए एक अबूझ पहेली बना हुआ है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, बीते लगभग डेढ़ साल से इस कमरे पर लगातार ताला जड़ा हुआ है।
कार्यालय में साहब के दर्शन होना बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। पार्टी के भीतर ही अब लोग चुटकी लेते हुए कहने लगे हैं कि तिवारी जी कम्युनिकेशन इंचार्ज कम और ‘अदृश्य कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी’ के विशेषज्ञ ज्यादा नजर आते हैं। न तो उनका कार्यकर्ताओं से प्रत्यक्ष संवाद होता है और न ही वे कार्यालय में उपलब्ध रहते हैं; केवल कभी-कभार फोन पर ही उनका संपर्क हो पाता है।
इंदौरी रिश्तों की मजबूती और जवाबदेही पर उठते गंभीर सवाल
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी खूब चर्चा है कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और अभय तिवारी के बीच इंदौर से जुड़े व्यावसायिक और राजनीतिक संबंध बेहद मजबूत हैं। पार्टी के अंदरूनी हलकों में तंज कसा जा रहा है कि जब शीर्ष नेतृत्व और संरक्षक इतने मजबूत हों, तो फिर पद पर रहकर काम न करने का हिसाब कौन मांग सकता है?
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी संगठन में बाकी आम नेताओं और कार्यकर्ताओं पर तो अनुशासन और उपस्थिति के कड़े नियम लागू किए जाते हैं, लेकिन कुछ खास और करीबी लोगों के लिए संगठन के नियम-कायदे दरकिनार कर दिए जाते हैं। यद्यपि इन आरोपों की कोई आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस स्थिति ने कार्यकर्ताओं के मनोबल पर गहरा असर डाला है और यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संगठन में जिम्मेदारी का सही पैमाना काम है या केवल नाम की पट्टिका।
डेढ़ साल से अटकी प्रवक्ताओं की सूची, पुराने चेहरों के भरोसे विभाग
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक और रणनीतिक पहलू यह है कि एक प्रमुख विपक्षी दल होने के बावजूद प्रदेश कांग्रेस में लंबे समय से प्रवक्ताओं की नई आधिकारिक सूची जारी नहीं हो सकी है। पार्टी का पूरा मीडिया विभाग आज भी पुराने पदों, पुराने चेहरों और पुरानी व्यवस्था के भरोसे ही संचालित हो रहा है।
एक तरफ जहां कांग्रेस राज्य की सत्तारूढ़ सरकार को विभिन्न जनहित के मुद्दों पर घेरने का दावा करती है और आक्रामक रुख अपनाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ अपने ही मीडिया विभाग में नई नियुक्तियों, युवा आवाजों को मौका देने और मजबूत संवाद तंत्र स्थापित करने के मामले में पार्टी पूरी तरह से पिछड़ती दिख रही है। नई सूची के अभाव में कई प्रतिभावान और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का आधिकारिक मंच नहीं मिल पा रहा है।
संगठन की जवाबदेही और भविष्य की चुनौतियां
पार्टी के भीतर और बाहर अब यह सवाल प्रमुखता से पूछा जा रहा है कि जब मुख्य कम्युनिकेशन इंचार्ज का दफ्तर ही बंद पड़ा है, तो पार्टी का जनसंचार और मीडिया प्रबंधन सुचारू रूप से कैसे चल सकता है? जब प्रवक्ताओं की नई सूची ही जारी नहीं होगी, तो नई प्राथमिकताओं और नई आवाजों को नेतृत्व का अवसर कैसे मिलेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल नाम की पट्टिका टांग देने से या पद संभाल लेने से मीडिया प्रबंधन नहीं होता। इसके लिए निरंतर उपस्थिति, जमीनी रणनीति, प्रवक्ताओं का मार्गदर्शन और त्वरित संवाद की आवश्यकता होती है। यदि संगठन के जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही जवाबदेही से बचेंगे, तो आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पार्टी के लिए बेहद कठिन साबित होगा।
निष्कर्ष: पट्टिका चालू, लेकिन संवाद पूरी तरह ठप
संक्षेप में कहें तो, प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में यदि किसी कमरे की चाबी खो जाए तो उसे खोजा जा सकता है, लेकिन यदि पूरी व्यवस्था पर ही ताला लग जाए, तो उसकी चाबी किसके पास है—यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है। अभय तिवारी जी की पट्टिका अपनी जगह सुरक्षित रहे, इससे किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन कांग्रेस के मीडिया और कम्युनिकेशन विभाग के इस बंद ताले को खोलना बेहद जरूरी है। क्योंकि आधुनिक राजनीति में केवल पद और पट्टिका से संवाद नहीं बनता, बल्कि जमीनी काम और निरंतर सक्रियता से ही संगठन मजबूत होता है।