जयशंकर का कांग्रेस पर पलटवार, इंदिरा-भुट्टो का दिया हवाला

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की मुंबई यात्रा और द्विपक्षीय बैठकों पर सियासत गरमाई, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कांग्रेस के आरोपों पर दिया तीखा जवाब।

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अशोक कुमार
भारतीय कूटनीति के इतिहास में जब भी किसी विदेशी उच्चाधिकारी या मंत्री का दौरा होता है, तो वह केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस पर घरेलू राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। हाल ही में, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा और विशेष रूप से उनकी मुंबई यात्रा को लेकर भारतीय राजनीतिक मंच पर एक नया विवाद खड़ा हो गया। देश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुलाकात के तरीके और स्थान पर आपत्ति जताई, जिसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बेहद आक्रामक और तथ्यात्मक अंदाज में पलटवार किया।

जयशंकर ने अपने जवाब में केवल मौजूदा कूटनीतिक प्रोटोकॉल का बचाव ही नहीं किया, बल्कि भारतीय राजनीतिक इतिहास के उन पन्नों को भी पलटा, जिन्हें विपक्षी दल अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार नजरअंदाज कर देता है। इस आलेख में हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, एस. जयशंकर ने अपने बचाव में क्या ऐतिहासिक उदाहरण दिए, और भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक व व्यापारिक संबंधों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है।

मार्को रूबियो की मुंबई यात्रा और कांग्रेस की आपत्तियां

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे का एक अहम हिस्सा मुंबई में आयोजित हुआ, जहां उन्होंने देश के प्रमुख व्यावसायिक और सांस्कृतिक दिग्गजों के साथ मुलाकात की। इस यात्रा के दौरान रूबियो ने उद्योगपति मुकेश अंबानी के साथ रिलायंस जामनगर रिफाइनरी का दौरा भी किया और ऊर्जा साझेदारी पर चर्चा की।

हालांकि, इस दौरे के दिल्ली के बजाय मुंबई में आयोजित होने और द्विपक्षीय बैठकों के स्वरूप को लेकर कांग्रेस पार्टी, विशेष रूप से राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कांग्रेस का यह तर्क था कि इस तरह की उच्च-स्तरीय कूटनीतिक मुलाकातें देश की राजधानी दिल्ली में ही होनी चाहिए थीं। विपक्ष का आरोप था कि सरकार विदेश नीति के पारंपरिक मानदंडों और प्रोटोकॉल से हटकर काम कर रही है, जिससे भारत की कूटनीतिक गरिमा पर असर पड़ता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी विदेशी मेहमान के आगमन या उसके साथ बैठक के स्थान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच खींचतान देखने को मिली हो। भारतीय राजनीति में विदेश नीति के मामलों पर आम तौर पर एक आम सहमति बनाने की परंपरा रही है, लेकिन हाल के वर्षों में घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए कूटनीति के मंचों को भी चुनावी अखाड़ा बनाया जाने लगा है।

एस. जयशंकर का करारा जवाब: ऐतिहासिक संदर्भों की वापसी

कांग्रेस के इन आरोपों पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान बेहद बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुंबई देश की वित्तीय, वाणिज्यिक और फिल्मी राजधानी है, और यदि किसी विदेशी मेहमान की मेजबानी वहां की जाती है, तो इस पर सवाल उठाना विपक्षी दल की अपरिपक्वता और कूटनीति की अज्ञानता को दर्शाता है।

अपनी बात को अकाट्य और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित करने के लिए, जयशंकर ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि 1972 में शिमला समझौते के समय पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से मिलने के लिए खुद शिमला गई थीं।

जयशंकर ने तंज कसते हुए सवाल किया, “अगर किसी विदेशी नेता या समकक्ष से मिलने के लिए दिल्ली से बाहर जाना ‘तलब किया जाना’ या प्रोटोकॉल के विरुद्ध है, तो क्या इंदिरा गांधी को भी भुट्टो से मिलने शिमला जाने पर ‘तलब’ किया गया था?” उन्होंने आगे पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की जयपुर यात्रा का भी जिक्र किया, जहां उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। जयशंकर के इस कड़े और तार्किक जवाब ने विपक्ष के तर्कों की हवा निकाल दी और उन्हें रक्षात्मक मुद्रा में आने पर मजबूर कर दिया।

शिमला समझौता और इंदिरा-भुट्टो मुलाकात: एक ऐतिहासिक तुलना

विदेश मंत्री द्वारा इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो की 1972 की शिमला बैठक का जिक्र करना बेहद गहरा कूटनीतिक संदेश देता है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने के लिए शिमला समझौता हुआ था। उस समय राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया गया था कि बैठक का स्थल दिल्ली के बजाय एक शांत और अनुकूल पहाड़ी शहर यानी शिमला हो, ताकि बातचीत सकारात्मक माहौल में आगे बढ़ सके।

कहा जाता है कि कूटनीति में स्थान का चयन हमेशा प्रतीकात्मक और व्यावहारिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। जब मार्को रूबियो मुंबई आए, तो इसका उद्देश्य भारत की आर्थिक शक्ति, वित्तीय केंद्र और उद्योग जगत (विशेषकर ऊर्जा और तकनीक क्षेत्र) के साथ सीधे संवाद स्थापित करना था। दिल्ली से बाहर जाकर इस तरह की बैठकें आयोजित करना आधुनिक वैश्विक कूटनीति का एक सामान्य हिस्सा है, जहां नेताओं को स्थानीय व्यापारिक परिवेश से रूबरू कराया जाता है। जयशंकर ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक विरोध के चक्कर में इतिहास के तथ्यों को झुठलाना या मनगढ़ंत नैरेटिव गढ़ना देश के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता और अंतिम चरण की चुनौतियां

इस पूरे राजनीतिक विवाद के समानांतर, भारत और अमेरिका के बीच चल रहे महत्वपूर्ण व्यापार समझौते (Trade Deal) पर भी बातचीत अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। एस. जयशंकर ने इस बात की पुष्टि की है कि दोनों देशों की वार्ताकार टीमें शेष बचे मुद्दों को सुलझाने के लिए दिन-रात काम कर रही हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी पहले ही यह दावा कर चुके हैं कि भारत और अमेरिका एक व्यापक व्यापार समझौते के बेहद करीब हैं। हालांकि, जयशंकर ने कूटनीतिक संयम बरतते हुए यह भी चेताया कि जब तक समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। दोनों देशों के बीच पिछले एक साल से अधिक समय से बाजार तक पहुंच, आयात शुल्क, कृषि उत्पादों के नियम और औद्योगिक वस्तुओं के मानकों को लेकर गहन मंत्रणा चल रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के समझौतों के अंतिम चरणों में अक्सर तकनीकी और पेचीदा अड़चनें सामने आती हैं, जिन्हें दोनों देशों के कूटनीतिक कौशल से ही पार किया जा सकता है। ऐसे समय में जब देश के विदेश मंत्री वैश्विक मंचों पर भारत के हितों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा रहे हैं, घरेलू स्तर पर इस तरह के अनर्गल राजनीतिक विवाद केवल राष्ट्रीय ऊर्जा को क्षीण करने का काम करते हैं।

वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती मुखरता

एस. जयशंकर के कार्यकाल में भारत की विदेश नीति में एक स्पष्ट परिवर्तन देखा गया है। आज का भारत किसी भी वैश्विक महाशक्ति के दबाव में काम करने के बजाय अपनी शर्तों पर स्वतंत्र और संतुलित निर्णय लेता है। चाहे वह रूस से तेल आयात का मामला हो या पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक और रक्षा साझेदारी को मजबूत करना हो, भारत ने हमेशा ‘प्रिंसिपल्ड न्यूट्रलिटी’ (सिद्धांत आधारित तटस्थता) और ‘नेशनल फर्स्ट’ (राष्ट्र सर्वोपरि) के सिद्धांत को अपनाया है।

मार्को रूबियो की यह यात्रा इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा थी, जिसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को सुरक्षित बनाना और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश शामिल था। रूबियो ने अपनी यात्रा के दौरान यह भी स्पष्ट किया था कि अमेरिका-पाकिस्तान के संबंध कभी भी भारत की कीमत पर आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे, जो कि भारत की कूटनीतिक जीत को दर्शाता है। ऐसे में, इन सफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए घरेलू राजनीति के तहत अनावश्यक विवाद पैदा करना देश की बाहरी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

निष्कर्ष: राष्ट्रीय हित बनाम संकुचित राजनीतिक एजेंडा

निष्कर्ष तौर पर यह कहा जा सकता है कि एस. जयशंकर द्वारा कांग्रेस को दिया गया जवाब केवल एक राजनीतिक पलटवार नहीं था, बल्कि यह भारतीय विदेश नीति के ऐतिहासिक और व्यावहारिक पक्षों का एक सटीक दस्तावेज था। इंदिरा गांधी के समय के उदाहरणों को सामने लाकर जयशंकर ने यह साबित कर दिया कि कूटनीतिक यात्राओं और बैठकों के स्थान का चयन हमेशा राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुसार होता है, न कि किसी राजनीतिक दल की सुविधा के आधार पर।

आज जब भारत वैश्विक स्तर पर आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है और अमेरिका जैसे देशों के साथ ऐतिहासिक व्यापार समझौतों को अंतिम रूप दे रहा है, तो राजनीतिक दलों को संकुचित दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में एकजुट होना चाहिए। विदेश नीति के मुद्दों पर अनावश्यक राजनीति करने से देश का वैश्विक कद नहीं बढ़ता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गलत संदेश जाता है। भारत के नागरिकों और राजनीतिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि कूटनीति के अखाड़े में देश की जीत ही सर्वोपरि होनी चाहिए।

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