उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन की अपील: पुराने कानून खत्म करें राज्य

कानूनी सुधार सम्मेलन में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने औपनिवेशिक काल के अप्रासंगिक कानूनों को निरस्त करने और राज्यों से सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।

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  • उपराष्ट्रपति ने राज्यों से पुराने कानूनों को निरस्त करने की अपील की।
  • 12 वर्षों में 1700 से अधिक अप्रासंगिक कानून निरस्त किए गए।
  • ‘टीम इंडिया’ भावना के साथ कानूनी सुधारों में समन्वय पर जोर।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 24 अक्तूबर: भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने देश की न्याय प्रणाली और कानूनी ढांचे को अधिक आधुनिक, पारदर्शी तथा नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक बड़ा आह्वान किया है। नई दिल्ली में आयोजित कानूनी सुधार सम्मेलन को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने देश के सभी राज्यों और राज्य विधि आयोगों से अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्राधिकार में मौजूद औपनिवेशिक काल के और अप्रासंगिक हो चुके पुराने कानूनों की पहचान करें तथा उन्हें निरस्त करने या उनमें आवश्यक संशोधन करने के लिए त्वरित सिफारिशें भेजें। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि एक प्रगतिशील और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए न्याय व्यवस्था को समय के अनुकूल बनाना अत्यंत आवश्यक है।

12 वर्षों में 1,700 से अधिक अप्रासंगिक कानून निरस्त

अपने संबोधन के दौरान उपराष्ट्रपति ने पिछले एक दशक के दौरान केंद्र सरकार द्वारा कानूनी क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक सुधारों का उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि पिछले 12 वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने औपनिवेशिक दौर के 1,700 से अधिक ऐसे पुराने और निष्प्रयोज्य कानूनों को समाप्त किया है जो वर्तमान समय में अप्रासंगिक हो चुके थे और केवल प्रशासनिक जटिलताएं पैदा कर रहे थे।

इसके अलावा, उन्होंने तीन अंग्रेजों के जमाने के आपराधिक कानूनों—भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम—के स्थान पर नए और आधुनिक कानूनों को लागू करने के ऐतिहासिक कदम की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इन बदलावों से देश में ‘ईज ऑफ लिविंग’ (Ease of Living) को बढ़ावा मिला है और आम नागरिकों को अनावश्यक कानूनी मुकदमों और लालफीताशाही से राहत मिली है।

केंद्र और राज्यों के बीच ‘टीम इंडिया’ भावना पर जोर

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने इस बात पर विशेष बल दिया कि कानूनी सुधारों के इस वृहद कार्य को केवल केंद्र सरकार अकेले पूरा नहीं कर सकती। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच ‘टीम इंडिया’ की भावना से बेहतर समन्वय और सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का अर्थ यह नहीं है कि हर विषय पर पूरी तरह से एकरूपता हो, बल्कि राज्यों को अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।

उन्होंने सुझाव दिया कि भारत के विधि आयोग (Law Commission of India), राज्य विधि आयोगों और राज्यों के कानून विभागों के बीच एक स्थायी और घनिष्ठ जुड़ाव होना चाहिए। अंतर-राज्यीय परामर्श और सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) को साझा करने से कानूनों को अधिक उत्तरदायी और सुलभ बनाया जा सकता है।

सेंगोल और तिरुवल्लुवर के संदेश से सुशासन की प्रेरणा

संविधान और भारतीय संस्कृति के गहन संबंधों पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने संसद भवन में स्थापित पवित्र ‘सेंगोल’ का संदर्भ दिया। उन्होंने सेंगोल को न्यायसंगत अधिकार, नैतिक शासन और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक बताया। इसके साथ ही, उन्होंने महान तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर की शिक्षाओं और विचारों का स्मरण कराते हुए कहा कि केवल शक्ति का प्रयोग ही नहीं, बल्कि सुशासन और कानून का शासन (Rule of Law) ही किसी देश की स्थायी समृद्धि और सफलता की सच्ची नींव होता है।

सम्मेलन में दिग्गजों की मौजूदगी और भावी रूपरेखा

इस अवसर पर केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अर्जुन राम मेघवाल, भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, सदस्य सचिव अंजू राठी राणा और सदस्य डी.पी. वर्मा सहित कानूनी जगत के कई प्रमुख विशेषज्ञ, न्यायविद और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि इस उच्चस्तरीय सम्मेलन के निष्कर्ष और विचार-विमर्श राज्य सरकारों को अपने कानूनी ढांचे की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करेंगे, जिससे आने वाले समय में देश के नागरिकों को एक अधिक कुशल, पारदर्शी और संवेदनशील कानूनी प्रणाली का लाभ मिल सकेगा।

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